chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १७२
युधिष्ठिर उवाच:
केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वीतशोकश्चरेन्महीम् |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
किं च कुर्वन्नरो लोके प्राप्नोति परमां गतिम् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
२ क
भीष्म उवाच:
प्रह्रादस्य च संवादं मुनेराजगरस्य च ||
२ ख
भीष्म उवाच:
चरन्तं व्राह्मणं कञ्चित्कल्यचित्तमनामय़म् |
३ क
भीष्म उवाच:
पप्रच्छ राजन्प्रह्रादो वुद्धिमान्प्राज्ञसंमतः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स्वस्थः शक्तो मृदुर्दान्तो निर्विवित्सोऽनसूय़कः |
४ क
भीष्म उवाच:
सुवाग्वहुमतो लोके प्राज्ञश्चरसि वालवत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
नैव प्रार्थय़से लाभं नालाभेष्वनुशोचसि |
५ क
भीष्म उवाच:
नित्यतृप्त इव व्रह्मन्न किञ्चिदवमन्यसे ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स्रोतसा ह्रिय़माणासु प्रजास्वविमना इव |
६ क
भीष्म उवाच:
धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थ इव लक्ष्यसे ||
६ ख
भीष्म उवाच:
नानुतिष्ठसि धर्मार्थौ न कामे चापि वर्तसे |
७ क
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
का नु प्रज्ञा श्रुतं वा किं वृत्तिर्वा का नु ते मुने |
८ क
भीष्म उवाच:
क्षिप्रमाचक्ष्व मे व्रह्मञ्श्रेय़ो यदिह मन्यसे ||
८ ख
भीष्म उवाच:
अनुय़ुक्तः स मेधावी लोकधर्मविधानवित् |
९ क
भीष्म उवाच:
उवाच श्लक्ष्णय़ा वाचा प्रह्रादमनपार्थय़ा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
पश्यन्प्रह्राद भूतानामुत्पत्तिमनिमित्ततः |
१० क
भीष्म उवाच:
ह्रासं वृद्धिं विनाशं च न प्रहृष्ये न च व्यथे ||
१० ख
भीष्म उवाच:
स्वभावादेव सन्दृश्य वर्तमानाः प्रवृत्तय़ः |
११ क
भीष्म उवाच:
स्वभावनिरताः सर्वाः परितप्ये न केनचित् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
पश्यन्प्रह्राद संय़ोगान्विप्रय़ोगपराय़णान् |
१२ क
भीष्म उवाच:
सञ्चय़ांश्च विनाशान्तान्न क्वचिद्विदधे मनः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अन्तवन्ति च भूतानि गुणय़ुक्तानि पश्यतः |
१३ क
भीष्म उवाच:
उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
जलजानामपि ह्यन्तं पर्याय़ेणोपलक्षय़े |
१४ क
भीष्म उवाच:
महतामपि काय़ानां सूक्ष्माणां च महोदधौ ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
जङ्गमस्थावराणां च भूतानामसुराधिप |
१५ क
भीष्म उवाच:
पार्थिवानामपि व्यक्तं मृत्युं पश्यामि सर्वशः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
अन्तरिक्षचराणां च दानवोत्तम पक्षिणाम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
उत्तिष्ठति यथाकालं मृत्युर्वलवतामपि ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
दिवि सञ्चरमाणानि ह्रस्वानि च महान्ति च |
१७ क
भीष्म उवाच:
ज्योतींषि च यथाकालं पतमानानि लक्षय़े ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
इति भूतानि सम्पश्यन्ननुषक्तानि मृत्युना |
१८ क
भीष्म उवाच:
सर्वसामान्यतो विद्वान्कृतकृत्यः सुखं स्वपे ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
सुमहान्तमपि ग्रासं ग्रसे लव्धं यदृच्छय़ा |
१९ क
भीष्म उवाच:
शय़े पुनरभुञ्जानो दिवसानि वहून्यपि ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
आस्रवत्यपि मामन्नं पुनर्वहुगुणं वहु |
२० क
भीष्म उवाच:
पुनरल्पगुणं स्तोकं पुनर्नैवोपपद्यते ||
२० ख
भीष्म उवाच:
कणान्कदाचित्खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे |
२१ क
भीष्म उवाच:
भक्षय़े शालिमांसानि भक्षांश्चोच्चावचान्पुनः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
शय़े कदाचित्पर्यङ्के भूमावपि पुनः शय़े |
२२ क
भीष्म उवाच:
प्रासादेऽपि च मे शय़्या कदाचिदुपपद्यते ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
धारय़ामि च चीराणि शाणीं क्षौमाजिनानि च |
२३ क
भीष्म उवाच:
महार्हाणि च वासांसि धारय़ाम्यहमेकदा ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
न संनिपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छय़ा |
२४ क
भीष्म उवाच:
प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुध्ये सुदुर्लभम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
अचलमनिधनं शिवं विशोकं; शुचिमतुलं विदुषां मते निविष्टम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
अनभिमतमसेवितं च मूढै; र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अचलितमतिरच्युतः स्वधर्मा; त्परिमितसंसरणः परावरज्ञः |
२६ क
भीष्म उवाच:
विगतभय़कषाय़लोभमोहो; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
अनिय़तफलभक्ष्यभोज्यपेय़ं; विधिपरिणामविभक्तदेशकालम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
हृदय़सुखमसेवितं कदर्यै; र्व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
इदमिदमिति तृष्णय़ाभिभूतं; जनमनवाप्तधनं विषीदमानम् |
२८ क
भीष्म उवाच:
निपुणमनुनिशाम्य तत्त्ववुद्ध्या; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
वहुविधमनुदृश्य चार्थहेतोः; कृपणमिहार्यमनार्यमाश्रय़न्तम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
उपशमरुचिरात्मवान्प्रशान्तो; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
सुखमसुखमनर्थमर्थलाभं; रतिमरतिं मरणं च जीवितं च |
३० क
भीष्म उवाच:
विधिनिय़तमवेक्ष्य तत्त्वतोऽहं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३० ख
भीष्म उवाच:
अपगतभय़रागमोहदर्पो; धृतिमतिवुद्धिसमन्वितः प्रशान्तः |
३१ क
भीष्म उवाच:
उपगतफलभोगिनो निशाम्य; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
अनिय़तशय़नासनः प्रकृत्या; दमनिय़मव्रतसत्यशौचय़ुक्तः |
३२ क
भीष्म उवाच:
अपगतफलसञ्चय़ः प्रहृष्टो; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
अभिगतमसुखार्थमीहनार्थै; रुपगतवुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थः |
३३ क
भीष्म उवाच:
तृषितमनिय़तं मनो निय़न्तुं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
न हृदय़मनुरुध्यते मनो वा; प्रिय़सुखदुर्लभतामनित्यतां च |
३४ क
भीष्म उवाच:
तदुभय़मुपलक्षय़न्निवाहं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
वहु कथितमिदं हि वुद्धिमद्भिः; कविभिरभिप्रथय़द्भिरात्मकीर्तिम् |
३५ क
भीष्म उवाच:
इदमिदमिति तत्र तत्र तत्त; त्स्वपरमतैर्गहनं प्रतर्कय़द्भिः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
तदहमनुनिशाम्य विप्रय़ातं; पृथगभिपन्नमिहावुधैर्मनुष्यैः |
३६ क
भीष्म उवाच:
अनवसितमनन्तदोषपारं; नृषु विहरामि विनीतरोषतृष्णः ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
अजगरचरितं व्रतं महात्मा; य इह नरोऽनुचरेद्विनीतरागः |
३७ क
भीष्म उवाच:
अपगतभय़मन्युलोभमोहः; स खलु सुखी विहरेदिमं विहारम् ||
३७ ख