chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १७२
भीष्म उवाच:
ततोऽहं समनुज्ञाप्य कालीं सत्यवतीं तदा |
१ क
भीष्म उवाच:
मन्त्रिणश्च द्विजांश्चैव तथैव च पुरोहितान् |
१ ख
भीष्म उवाच:
समनुज्ञासिषं कन्यां ज्येष्ठामम्वां नराधिप ||
१ ग
भीष्म उवाच:
अनुज्ञाता यय़ौ सा तु कन्या शाल्वपतेः पुरम् |
२ क
भीष्म उवाच:
वृद्धैर्द्विजातिभिर्गुप्ता धात्र्या चानुगता तदा |
२ ख
भीष्म उवाच:
अतीत्य च तमध्वानमाससाद नराधिपम् ||
२ ग
भीष्म उवाच:
सा तमासाद्य राजानं शाल्वं वचनमव्रवीत् |
३ क
भीष्म उवाच:
आगताहं महावाहो त्वामुद्दिश्य महाद्युते ||
३ ख
भीष्म उवाच:
तामव्रवीच्छाल्वपतिः स्मय़न्निव विशां पते |
४ क
भीष्म उवाच:
त्वय़ान्यपूर्वय़ा नाहं भार्यार्थी वरवर्णिनि ||
४ ख
भीष्म उवाच:
गच्छ भद्रे पुनस्तत्र सकाशं भारतस्य वै |
५ क
भीष्म उवाच:
नाहमिच्छामि भीष्मेण गृहीतां त्वां प्रसह्य वै ||
५ ख
भीष्म उवाच:
त्वं हि निर्जित्य भीष्मेण नीता प्रीतिमती तदा |
६ क
भीष्म उवाच:
परामृश्य महाय़ुद्धे निर्जित्य पृथिवीपतीन् |
६ ख
भीष्म उवाच:
नाहं त्वय़्यन्यपूर्वाय़ां भार्यार्थी वरवर्णिनि ||
६ ग
भीष्म उवाच:
कथमस्मद्विधो राजा परपूर्वां प्रवेशय़ेत् |
७ क
भीष्म उवाच:
नारीं विदितविज्ञानः परेषां धर्ममादिशन् |
७ ख
भीष्म उवाच:
यथेष्टं गम्यतां भद्रे मा ते कालोऽत्यगादय़म् ||
७ ग
भीष्म उवाच:
अम्वा तमव्रवीद्राजन्ननङ्गशरपीडिता |
८ क
भीष्म उवाच:
मैवं वद महीपाल नैतदेवं कथञ्चन ||
८ ख
भीष्म उवाच:
नास्मि प्रीतिमती नीता भीष्मेणामित्रकर्शन |
९ क
भीष्म उवाच:
वलान्नीतास्मि रुदती विद्राव्य पृथिवीपतीन् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
भजस्व मां शाल्वपते भक्तां वालामनागसम् |
१० क
भीष्म उवाच:
भक्तानां हि परित्यागो न धर्मेषु प्रशस्यते ||
१० ख
भीष्म उवाच:
साहमामन्त्र्य गाङ्गेय़ं समरेष्वनिवर्तिनम् |
११ क
भीष्म उवाच:
अनुज्ञाता च तेनैव तवैव गृहमागता ||
११ ख
भीष्म उवाच:
न स भीष्मो महावाहुर्मामिच्छति विशां पते |
१२ क
भीष्म उवाच:
भ्रातृहेतोः समारम्भो भीष्मस्येति श्रुतं मय़ा ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
भगिन्यौ मम ये नीते अम्विकाम्वालिके नृप |
१३ क
भीष्म उवाच:
प्रादाद्विचित्रवीर्याय़ गाङ्गेय़ो हि यवीय़से ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यथा शाल्वपते नान्यं नरं ध्यामि कथञ्चन |
१४ क
भीष्म उवाच:
त्वामृते पुरुषव्याघ्र तथा मूर्धानमालभे ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
न चान्यपूर्वा राजेन्द्र त्वामहं समुपस्थिता |
१५ क
भीष्म उवाच:
सत्यं व्रवीमि शाल्वैतत्सत्येनात्मानमालभे ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
भजस्व मां विशालाक्ष स्वय़ं कन्यामुपस्थिताम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
अनन्यपूर्वां राजेन्द्र त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणीम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
तामेवं भाषमाणां तु शाल्वः काशिपतेः सुताम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
अत्यजद्भरतश्रेष्ठ त्वचं जीर्णामिवोरगः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
एवं वहुविधैर्वाक्यैर्याच्यमानस्तय़ानघ |
१८ क
भीष्म उवाच:
नाश्रद्दधच्छाल्वपतिः कन्याय़ा भरतर्षभ ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततः सा मन्युनाविष्टा ज्येष्ठा काशिपतेः सुता |
१९ क
भीष्म उवाच:
अव्रवीत्साश्रुनय़ना वाष्पविह्वलय़ा गिरा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
त्वय़ा त्यक्ता गमिष्यामि यत्र यत्र विशां पते |
२० क
भीष्म उवाच:
तत्र मे सन्तु गतय़ः सन्तः सत्यं यथाव्रुवम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एवं सम्भाषमाणां तु नृशंसः शाल्वराट्तदा |
२१ क
भीष्म उवाच:
पर्यत्यजत कौरव्य करुणं परिदेवतीम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
गच्छ गच्छेति तां शाल्वः पुनः पुनरभाषत |
२२ क
भीष्म उवाच:
विभेमि भीष्मात्सुश्रोणि त्वं च भीष्मपरिग्रहः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्ता तु सा तेन शाल्वेनादीर्घदर्शिना |
२३ क
भीष्म उवाच:
निश्चक्राम पुराद्दीना रुदती कुररी यथा ||
२३ ख