chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १७३
भीष्म उवाच:
समवैक्षत तं विप्रो ज्ञानदीर्घेण चक्षुषा |
५१ क
भीष्म उवाच:
ददर्श चैनं देवानामिन्द्रं देवं शचीपतिम् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
ततः सम्पूजय़ामास काश्यपो हरिवाहनम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
अनुज्ञातश्च तेनाथ प्रविवेश स्वमाश्रमम् ||
५२ ख