chevron_left द्रोण पर्व अध्याय १७३
व्यास उवाच:
यन्निर्दहति यत्तीक्ष्णो यदुग्रो यत्प्रतापवान् |
९८ क
व्यास उवाच:
मांसशोणितमज्जादो यत्ततो रुद्र उच्यते ||
९८ ख
व्यास उवाच:
एष देवो महादेवो योऽसौ पार्थ तवाग्रतः |
९९ क
व्यास उवाच:
सङ्ग्रामे शात्रवान्निघ्नंस्त्वय़ा दृष्टः पिनाकधृक् ||
९९ ख
व्यास उवाच:
एष वै भगवान्देवः सङ्ग्रामे याति तेऽग्रतः |
१०० क
व्यास उवाच:
येन दत्तानि तेऽस्त्राणि यैस्त्वय़ा दानवा हताः ||
१०० ख
व्यास उवाच:
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यं पुण्यं वेदैश्च सञ्ज्ञितम् |
१०१ क
व्यास उवाच:
देवदेवस्य ते पार्थ व्याख्यातं शतरुद्रिय़म् ||
१०१ ख
व्यास उवाच:
सर्वार्थसाधकं पुण्यं सर्वकिल्विषनाशनम् |
१०२ क
व्यास उवाच:
सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभय़ापहम् ||
१०२ ख
व्यास उवाच:
चतुर्विधमिदं स्तोत्रं यः शृणोति नरः सदा |
१०३ क
व्यास उवाच:
विजित्य सर्वाञ्शत्रून्स रुद्रलोके महीय़ते ||
१०३ ख
व्यास उवाच:
चरितं महात्मनो दिव्यं साङ्ग्रामिकमिदं शुभम् |
१०४ क
व्यास उवाच:
पठन्वै शतरुद्रीय़ं शृण्वंश्च सततोत्थितः ||
१०४ ख
व्यास उवाच:
भक्तो विश्वेश्वरं देवं मानुषेषु तु यः सदा |
१०५ क
व्यास उवाच:
वरान्स कामाँल्लभते प्रसन्ने त्र्यम्वके नरः ||
१०५ ख
व्यास उवाच:
गच्छ युध्यस्व कौन्तेय़ न तवास्ति पराजय़ः |
१०६ क
व्यास उवाच:
यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वतस्ते जनार्दनः ||
१०६ ख
सञ्जय़ उवाच:
एवमुक्त्वार्जुनं सङ्ख्ये पराशरसुतस्तदा |
१०७ क
सञ्जय़ उवाच:
जगाम भरतश्रेष्ठ यथागतमरिन्दम ||
१०७ ख