chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १७३
भीष्म उवाच:
सा निष्क्रमन्ती नगराच्चिन्तय़ामास भारत |
१ क
भीष्म उवाच:
पृथिव्यां नास्ति युवतिर्विषमस्थतरा मय़ा |
१ ख
भीष्म उवाच:
वान्धवैर्विप्रहीनास्मि शाल्वेन च निराकृता ||
१ ग
भीष्म उवाच:
न च शक्यं पुनर्गन्तुं मय़ा वारणसाह्वय़म् |
२ क
भीष्म उवाच:
अनुज्ञातास्मि भीष्मेण शाल्वमुद्दिश्य कारणम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
किं नु गर्हाम्यथात्मानमथ भीष्मं दुरासदम् |
३ क
भीष्म उवाच:
आहो स्वित्पितरं मूढं यो मेऽकार्षीत्स्वय़ंवरम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ममाय़ं स्वकृतो दोषो याहं भीष्मरथात्तदा |
४ क
भीष्म उवाच:
प्रवृत्ते वैशसे युद्धे शाल्वार्थं नापतं पुरा |
४ ख
भीष्म उवाच:
तस्येय़ं फलनिर्वृत्तिर्यदापन्नास्मि मूढवत् ||
४ ग
भीष्म उवाच:
धिग्भीष्मं धिक्च मे मन्दं पितरं मूढचेतसम् |
५ क
भीष्म उवाच:
येनाहं वीर्यशुल्केन पण्यस्त्रीवत्प्रवेरिता ||
५ ख
भीष्म उवाच:
धिङ्मां धिक्षाल्वराजानं धिग्धातारमथापि च |
६ क
भीष्म उवाच:
येषां दुर्नीतभावेन प्राप्तास्म्यापदमुत्तमाम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
सर्वथा भागधेय़ानि स्वानि प्राप्नोति मानवः |
७ क
भीष्म उवाच:
अनय़स्यास्य तु मुखं भीष्मः शान्तनवो मम ||
७ ख
भीष्म उवाच:
सा भीष्मे प्रतिकर्तव्यमहं पश्यामि साम्प्रतम् |
८ क
भीष्म उवाच:
तपसा वा युधा वापि दुःखहेतुः स मे मतः |
८ ख
भीष्म उवाच:
को नु भीष्मं युधा जेतुमुत्सहेत महीपतिः ||
८ ग
भीष्म उवाच:
एवं सा परिनिश्चित्य जगाम नगराद्वहिः |
९ क
भीष्म उवाच:
आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् |
९ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तामवसद्रात्रिं तापसैः परिवारिता ||
९ ग
भीष्म उवाच:
आचख्यौ च यथा वृत्तं सर्वमात्मनि भारत |
१० क
भीष्म उवाच:
विस्तरेण महावाहो निखिलेन शुचिस्मिता |
१० ख
भीष्म उवाच:
हरणं च विसर्गं च शाल्वेन च विसर्जनम् ||
१० ग
भीष्म उवाच:
ततस्तत्र महानासीद्व्राह्मणः संशितव्रतः |
११ क
भीष्म उवाच:
शैखावत्यस्तपोवृद्धः शास्त्रे चारण्यके गुरुः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
आर्तां तामाह स मुनिः शैखावत्यो महातपाः |
१२ क
भीष्म उवाच:
निःश्वसन्तीं सतीं वालां दुःखशोकपराय़णाम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
एवं गते किं नु भद्रे शक्यं कर्तुं तपस्विभिः |
१३ क
भीष्म उवाच:
आश्रमस्थैर्महाभागैस्तपोनित्यैर्महात्मभिः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
सा त्वेनमव्रवीद्राजन्क्रिय़तां मदनुग्रहः |
१४ क
भीष्म उवाच:
प्रव्राजितुमिहेच्छामि तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
मय़ैवैतानि कर्माणि पूर्वदेहेषु मूढय़ा |
१५ क
भीष्म उवाच:
कृतानि नूनं पापानि तेषामेतत्फलं ध्रुवम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
नोत्सहेय़ं पुनर्गन्तुं स्वजनं प्रति तापसाः |
१६ क
भीष्म उवाच:
प्रत्याख्याता निरानन्दा शाल्वेन च निराकृता ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
उपदिष्टमिहेच्छामि तापस्यं वीतकल्मषाः |
१७ क
भीष्म उवाच:
युष्माभिर्देवसङ्काशाः कृपा भवतु वो मय़ि ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
स तामाश्वासय़त्कन्यां दृष्टान्तागमहेतुभिः |
१८ क
भीष्म उवाच:
सान्त्वय़ामास कार्यं च प्रतिजज्ञे द्विजैः सह ||
१८ ख