chevron_left शान्ति पर्व अध्याय १७४
युधिष्ठिर उवाच:
यद्यस्ति दत्तमिष्टं वा तपस्तप्तं तथैव च |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
गुरूणां चापि शुश्रूषा तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
आत्मनानर्थय़ुक्तेन पापे निविशते मनः |
२ क
भीष्म उवाच:
स कर्म कलुषं कृत्वा क्लेशे महति धीय़ते ||
२ ख
भीष्म उवाच:
दुर्भिक्षादेव दुर्भिक्षं क्लेशात्क्लेशं भय़ाद्भय़म् |
३ क
भीष्म उवाच:
मृतेभ्यः प्रमृतं यान्ति दरिद्राः पापकारिणः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
उत्सवादुत्सवं यान्ति स्वर्गात्स्वर्गं सुखात्सुखम् |
४ क
भीष्म उवाच:
श्रद्दधानाश्च दान्ताश्च धनाढ्याः शुभकारिणः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
व्यालकुञ्जरदुर्गेषु सर्पचोरभय़ेषु च |
५ क
भीष्म उवाच:
हस्तावापेन गच्छन्ति नास्तिकाः किमतः परम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
प्रिय़देवातिथेय़ाश्च वदान्याः प्रिय़साधवः |
६ क
भीष्म उवाच:
क्षेम्यमात्मवतां मार्गमास्थिता हस्तदक्षिणम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
पुलाका इव धान्येषु पुत्तिका इव पक्षिषु |
७ क
भीष्म उवाच:
तद्विधास्ते मनुष्येषु येषां धर्मो न कारणम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति |
८ क
भीष्म उवाच:
शेते सह शय़ानेन येन येन यथा कृतम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
उपतिष्ठति तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति |
९ क
भीष्म उवाच:
करोति कुर्वतः कर्म छाय़ेवानुविधीय़ते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
येन येन यथा यद्यत्पुरा कर्म समाचितम् |
१० क
भीष्म उवाच:
तत्तदेव नरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ||
१० ख
भीष्म उवाच:
स्वकर्मफलविक्षिप्तं विधानपरिरक्षितम् |
११ क
भीष्म उवाच:
भूतग्राममिमं कालः समन्तात्परिकर्षति ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च |
१२ क
भीष्म उवाच:
स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
संमानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षय़ोदय़ौ |
१३ क
भीष्म उवाच:
प्रवृत्ता विनिवर्तन्ते विधानान्ते पुनः पुनः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
आत्मना विहितं दुःखमात्मना विहितं सुखम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
गर्भशय़्यामुपादाय़ भुज्यते पौर्वदेहिकम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
वालो युवा च वृद्धश्च यत्करोति शुभाशुभम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
तस्यां तस्यामवस्थाय़ां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
समुन्नमग्रतो वस्त्रं पश्चाच्छुध्यति कर्मणा |
१७ क
भीष्म उवाच:
उपवासैः प्रतप्तानां दीर्घं सुखमनन्तकम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
दीर्घकालेन तपसा सेवितेन तपोवने |
१८ क
भीष्म उवाच:
धर्मनिर्धूतपापानां संसिध्यन्ते मनोरथाः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
शकुनीनामिवाकाशे मत्स्यानामिव चोदके |
१९ क
भीष्म उवाच:
पदं यथा न दृश्येत तथा ज्ञानविदां गतिः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अलमन्यैरुपालम्भैः कीर्तितैश्च व्यतिक्रमैः |
२० क
भीष्म उवाच:
पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मनः ||
२० ख