chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १७७
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्तदा रामो जहि भीष्ममिति प्रभो |
१ क
भीष्म उवाच:
उवाच रुदतीं कन्यां चोदय़न्तीं पुनः पुनः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
काश्ये कामं न गृह्णामि शस्त्रं वै वरवर्णिनि |
२ क
भीष्म उवाच:
ऋते व्रह्मविदां हेतोः किमन्यत्करवाणि ते ||
२ ख
भीष्म उवाच:
वाचा भीष्मश्च शाल्वश्च मम राज्ञि वशानुगौ |
३ क
भीष्म उवाच:
भविष्यतोऽनवद्याङ्गि तत्करिष्यामि मा शुचः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
न तु शस्त्रं ग्रहीष्यामि कथञ्चिदपि भामिनि |
४ क
भीष्म उवाच:
ऋते निय़ोगाद्विप्राणामेष मे समय़ः कृतः ||
४ ख
अम्वो उवाच:
मम दुःखं भगवता व्यपनेय़ं यतस्ततः |
५ क
अम्वो उवाच:
तत्तु भीष्मप्रसूतं मे तं जहीश्वर माचिरम् ||
५ ख
राम उवाच:
काशिकन्ये पुनर्व्रूहि भीष्मस्ते चरणावुभौ |
६ क
राम उवाच:
शिरसा वन्दनार्होऽपि ग्रहीष्यति गिरा मम ||
६ ख
अम्वो उवाच:
जहि भीष्मं रणे राम मम चेदिच्छसि प्रिय़म् |
७ क
अम्वो उवाच:
प्रतिश्रुतं च यदि तत्सत्यं कर्तुमिहार्हसि ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तय़ोः संवदतोरेवं राजन्रामाम्वय़ोस्तदा |
८ क
भीष्म उवाच:
अकृतव्रणो जामदग्न्यमिदं वचनमव्रवीत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
शरणागतां महावाहो कन्यां न त्यक्तुमर्हसि |
९ क
भीष्म उवाच:
जहि भीष्मं रणे राम गर्जन्तमसुरं यथा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
यदि भीष्मस्त्वय़ाहूतो रणे राम महामुने |
१० क
भीष्म उवाच:
निर्जितोऽस्मीति वा व्रूय़ात्कुर्याद्वा वचनं तव ||
१० ख
भीष्म उवाच:
कृतमस्या भवेत्कार्यं कन्याय़ा भृगुनन्दन |
११ क
भीष्म उवाच:
वाक्यं सत्यं च ते वीर भविष्यति कृतं विभो ||
११ ख
भीष्म उवाच:
इय़ं चापि प्रतिज्ञा ते तदा राम महामुने |
१२ क
भीष्म उवाच:
जित्वा वै क्षत्रिय़ान्सर्वान्व्राह्मणेषु प्रतिश्रुतम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणः क्षत्रिय़ो वैश्यः शूद्रश्चैव रणे यदि |
१३ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मद्विड्भविता तं वै हनिष्यामीति भार्गव ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
शरणं हि प्रपन्नानां भीतानां जीवितार्थिनाम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
न शक्ष्यामि परित्यागं कर्तुं जीवन्कथञ्चन ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
यश्च क्षत्रं रणे कृत्स्नं विजेष्यति समागतम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
दृप्तात्मानमहं तं च हनिष्यामीति भार्गव ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
स एवं विजय़ी राम भीष्मः कुरुकुलोद्वहः |
१६ क
भीष्म उवाच:
तेन युध्यस्व सङ्ग्रामे समेत्य भृगुनन्दन ||
१६ ख
राम उवाच:
स्मराम्यहं पूर्वकृतां प्रतिज्ञामृषिसत्तम |
१७ क
राम उवाच:
तथैव च करिष्यामि यथा साम्नैव लप्स्यते ||
१७ ख
राम उवाच:
कार्यमेतन्महद्व्रह्मन्काशिकन्यामनोगतम् |
१८ क
राम उवाच:
गमिष्यामि स्वय़ं तत्र कन्यामादाय़ यत्र सः ||
१८ ख
राम उवाच:
यदि भीष्मो रणश्लाघी न करिष्यति मे वचः |
१९ क
राम उवाच:
हनिष्याम्येनमुद्रिक्तमिति मे निश्चिता मतिः ||
१९ ख
राम उवाच:
न हि वाणा मय़ोत्सृष्टाः सज्जन्तीह शरीरिणाम् |
२० क
राम उवाच:
काय़ेषु विदितं तुभ्यं पुरा क्षत्रिय़सङ्गरे ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा ततो रामः सह तैर्व्रह्मवादिभिः |
२१ क
भीष्म उवाच:
प्रय़ाणाय़ मतिं कृत्वा समुत्तस्थौ महामनाः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते तामुषित्वा तु रजनीं तत्र तापसाः |
२२ क
भीष्म उवाच:
हुताग्नय़ो जप्तजप्याः प्रतस्थुर्मज्जिघांसय़ा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
अभ्यगच्छत्ततो रामः सह तैर्व्राह्मणर्षभैः |
२३ क
भीष्म उवाच:
कुरुक्षेत्रं महाराज कन्यया सह भारत ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
न्यविशन्त ततः सर्वे परिगृह्य सरस्वतीम् |
२४ क
भीष्म उवाच:
तापसास्ते महात्मानो भृगुश्रेष्ठपुरस्कृताः ||
२४ ख