chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १७८
भीष्म उवाच:
ततस्तृतीय़े दिवसे समे देशे व्यवस्थितः |
१ क
भीष्म उवाच:
प्रेषय़ामास मे राजन्प्राप्तोऽस्मीति महाव्रतः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तमागतमहं श्रुत्वा विषय़ान्तं महावलम् |
२ क
भीष्म उवाच:
अभ्यगच्छं जवेनाशु प्रीत्या तेजोनिधिं प्रभुम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र व्राह्मणैः परिवारितः |
३ क
भीष्म उवाच:
ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च तथैव च पुरोहितैः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स मामभिगतं दृष्ट्वा जामदग्न्यः प्रतापवान् |
४ क
भीष्म उवाच:
प्रतिजग्राह तां पूजां वचनं चेदमव्रवीत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
भीष्म कां वुद्धिमास्थाय़ काशिराजसुता त्वय़ा |
५ क
भीष्म उवाच:
अकामेय़मिहानीता पुनश्चैव विसर्जिता ||
५ ख
भीष्म उवाच:
विभ्रंशिता त्वय़ा हीय़ं धर्मावाप्तेः परावरात् |
६ क
भीष्म उवाच:
परामृष्टां त्वय़ा हीमां को हि गन्तुमिहार्हति ||
६ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्याख्याता हि शाल्वेन त्वय़ा नीतेति भारत |
७ क
भीष्म उवाच:
तस्मादिमां मन्निय़ोगात्प्रतिगृह्णीष्व भारत ||
७ ख
भीष्म उवाच:
स्वधर्मं पुरुषव्याघ्र राजपुत्री लभत्विय़म् |
८ क
भीष्म उवाच:
न युक्तमवमानोऽय़ं कर्तुं राज्ञा त्वय़ानघ ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तं नातिमनसं समुदीक्ष्याहमव्रुवम् |
९ क
भीष्म उवाच:
नाहमेनां पुनर्दद्यां भ्रात्रे व्रह्मन्कथञ्चन ||
९ ख
भीष्म उवाच:
शाल्वस्याहमिति प्राह पुरा मामिह भार्गव |
१० क
भीष्म उवाच:
मय़ा चैवाभ्यनुज्ञाता गता सौभपुरं प्रति ||
१० ख
भीष्म उवाच:
न भय़ान्नाप्यनुक्रोशान्न लोभान्नार्थकाम्यया |
११ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रधर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अथ मामव्रवीद्रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः |
१२ क
भीष्म उवाच:
न करिष्यसि चेदेतद्वाक्यं मे कुरुपुङ्गव ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
हनिष्यामि सहामात्यं त्वामद्येति पुनः पुनः |
१३ क
भीष्म उवाच:
संरम्भादव्रवीद्रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तमहं गीर्भिरिष्टाभिः पुनः पुनररिन्दमम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
अय़ाचं भृगुशार्दूलं न चैव प्रशशाम सः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तमहं प्रणम्य शिरसा भूय़ो व्राह्मणसत्तमम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
अव्रुवं कारणं किं तद्यत्त्वं योद्धुमिहेच्छसि ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
इष्वस्त्रं मम वालस्य भवतैव चतुर्विधम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
उपदिष्टं महावाहो शिष्योऽस्मि तव भार्गव ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ततो मामव्रवीद्रामः क्रोधसंरक्तलोचनः |
१७ क
भीष्म उवाच:
जानीषे मां गुरुं भीष्म न चेमां प्रतिगृह्णसे |
१७ ख
भीष्म उवाच:
सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रिय़ार्थं महीपते ||
१७ ग
भीष्म उवाच:
न हि ते विद्यते शान्तिरन्यथा कुरुनन्दन |
१८ क
भीष्म उवाच:
गृहाणेमां महावाहो रक्षस्व कुलमात्मनः |
१८ ख
भीष्म उवाच:
त्वय़ा विभ्रंशिता हीय़ं भर्तारं नाभिगच्छति ||
१८ ग
भीष्म उवाच:
तथा व्रुवन्तं तमहं रामं परपुरञ्जय़म् |
१९ क
भीष्म उवाच:
नैतदेवं पुनर्भावि व्रह्मर्षे किं श्रमेण ते ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
गुरुत्वं त्वय़ि सम्प्रेक्ष्य जामदग्न्य पुरातनम् |
२० क
भीष्म उवाच:
प्रसादय़े त्वां भगवंस्त्यक्तैषा हि पुरा मय़ा ||
२० ख
भीष्म उवाच:
को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
वासय़ेत गृहे जानन्स्त्रीणां दोषान्महात्ययान् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
न भय़ाद्वासवस्यापि धर्मं जह्यां महाद्युते |
२२ क
भीष्म उवाच:
प्रसीद मा वा यद्वा ते कार्यं तत्कुरु माचिरम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
अय़ं चापि विशुद्धात्मन्पुराणे श्रूय़ते विभो |
२३ क
भीष्म उवाच:
मरुत्तेन महावुद्धे गीतः श्लोको महात्मना ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः |
२४ क
भीष्म उवाच:
उत्पथप्रतिपन्नस्य कार्यं भवति शासनम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
स त्वं गुरुरिति प्रेम्णा मय़ा संमानितो भृशम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
गुरुवृत्तं न जानीषे तस्माद्योत्स्याम्यहं त्वय़ा ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
गुरुं न हन्यां समरे व्राह्मणं च विशेषतः |
२६ क
भीष्म उवाच:
विशेषतस्तपोवृद्धमेवं क्षान्तं मय़ा तव ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा व्राह्मणं क्षत्रवन्धुवत् |
२७ क
भीष्म उवाच:
यो हन्यात्समरे क्रुद्धो युध्यन्तमपलाय़िनम् |
२७ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चय़ः ||
२७ ग
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़ाणां स्थितो धर्मे क्षत्रिय़ोऽस्मि तपोधन |
२८ क
भीष्म उवाच:
यो यथा वर्तते यस्मिंस्तथा तस्मिन्प्रवर्तय़न् |
२८ ख
भीष्म उवाच:
नाधर्मं समवाप्नोति नरः श्रेय़श्च विन्दति ||
२८ ग
भीष्म उवाच:
अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् |
२९ क
भीष्म उवाच:
अनर्थसंशय़ापन्नः श्रेय़ान्निःसंशय़ेन च ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
यस्मात्संशय़ितेऽर्थेऽस्मिन्यथान्याय़ं प्रवर्तसे |
३० क
भीष्म उवाच:
तस्माद्योत्स्यामि सहितस्त्वय़ा राम महाहवे |
३० ख
भीष्म उवाच:
पश्य मे वाहुवीर्यं च विक्रमं चातिमानुषम् ||
३० ग
भीष्म उवाच:
एवं गतेऽपि तु मय़ा यच्छक्यं भृगुनन्दन |
३१ क
भीष्म उवाच:
तत्करिष्ये कुरुक्षेत्रे योत्स्ये विप्र त्वय़ा सह |
३१ ख
भीष्म उवाच:
द्वन्द्वे राम यथेष्टं ते सज्जो भव महामुने ||
३१ ग
भीष्म उवाच:
तत्र त्वं निहतो राम मय़ा शरशताचितः |
३२ क
भीष्म उवाच:
लप्स्यसे निर्जिताँल्लोकाञ्शस्त्रपूतो महारणे ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
स गच्छ विनिवर्तस्व कुरुक्षेत्रं रणप्रिय़ |
३३ क
भीष्म उवाच:
तत्रैष्यामि महावाहो युद्धाय़ त्वां तपोधन ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
अपि यत्र त्वय़ा राम कृतं शौचं पुरा पितुः |
३४ क
भीष्म उवाच:
तत्राहमपि हत्वा त्वां शौचं कर्तास्मि भार्गव ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
तत्र गच्छस्व राम त्वं त्वरितं युद्धदुर्मद |
३५ क
भीष्म उवाच:
व्यपनेष्यामि ते दर्पं पौराणं व्राह्मणव्रुव ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
यच्चापि कत्थसे राम वहुशः परिषत्सु वै |
३६ क
भीष्म उवाच:
निर्जिताः क्षत्रिय़ा लोके मय़ैकेनेति तच्छृणु ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
न तदा जाय़ते भीष्मो मद्विधः क्षत्रिय़ोऽपि वा |
३७ क
भीष्म उवाच:
यस्ते युद्धमय़ं दर्पं कामं च व्यपनाशय़ेत् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
सोऽहं जातो महावाहो भीष्मः परपुरञ्जय़ः |
३८ क
भीष्म उवाच:
व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशय़ः ||
३८ ख