chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १७९
भीष्म उवाच:
ततो मामव्रवीद्रामः प्रहसन्निव भारत |
१ क
भीष्म उवाच:
दिष्ट्या भीष्म मय़ा सार्धं योद्धुमिच्छसि सङ्गरे ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अय़ं गच्छामि कौरव्य कुरुक्षेत्रं त्वय़ा सह |
२ क
भीष्म उवाच:
भाषितं तत्करिष्यामि तत्रागच्छेः परन्तप ||
२ ख
भीष्म उवाच:
तत्र त्वां निहतं माता मय़ा शरशताचितम् |
३ क
भीष्म उवाच:
जाह्नवी पश्यतां भीष्म गृध्रकङ्कवडाशनम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
कृपणं त्वामभिप्रेक्ष्य सिद्धचारणसेविता |
४ क
भीष्म उवाच:
मय़ा विनिहतं देवी रोदतामद्य पार्थिव ||
४ ख
भीष्म उवाच:
अतदर्हा महाभागा भगीरथसुता नदी |
५ क
भीष्म उवाच:
या त्वामजीजनन्मन्दं युद्धकामुकमातुरम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
एहि गच्छ मय़ा भीष्म युद्धमद्यैव वर्तताम् |
६ क
भीष्म उवाच:
गृहाण सर्वं कौरव्य रथादि भरतर्षभ ||
६ ख
भीष्म उवाच:
इति व्रुवाणं तमहं रामं परपुरञ्जय़म् |
७ क
भीष्म उवाच:
प्रणम्य शिरसा राजन्नेवमस्त्वित्यथाव्रुवम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा यय़ौ रामः कुरुक्षेत्रं युय़ुत्सय़ा |
८ क
भीष्म उवाच:
प्रविश्य नगरं चाहं सत्यवत्यै न्यवेदय़म् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततः कृतस्वस्त्ययनो मात्रा प्रत्यभिनन्दितः |
९ क
भीष्म उवाच:
द्विजातीन्वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
रथमास्थाय़ रुचिरं राजतं पाण्डुरैर्हय़ैः |
१० क
भीष्म उवाच:
सूपस्करं स्वधिष्ठानं वैय़ाघ्रपरिवारणम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
उपपन्नं महाशस्त्रैः सर्वोपकरणान्वितम् |
११ क
भीष्म उवाच:
तत्कुलीनेन वीरेण हय़शास्त्रविदा नृप ||
११ ख
भीष्म उवाच:
युक्तं सूतेन शिष्टेन वहुशो दृष्टकर्मणा |
१२ क
भीष्म उवाच:
दंशितः पाण्डुरेणाहं कवचेन वपुष्मता ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
पाण्डुरं कार्मुकं गृह्य प्राय़ां भरतसत्तम |
१३ क
भीष्म उवाच:
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रिय़माणेन मूर्धनि ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
पाण्डुरैश्चामरैश्चापि वीज्यमानो नराधिप |
१४ क
भीष्म उवाच:
शुक्लवासाः सितोष्णीषः सर्वशुक्लविभूषणः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
स्तूय़मानो जय़ाशीर्भिर्निष्क्रम्य गजसाह्वय़ात् |
१५ क
भीष्म उवाच:
कुरुक्षेत्रं रणक्षेत्रमुपाय़ां भरतर्षभ ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ते हय़ाश्चोदितास्तेन सूतेन परमाहवे |
१६ क
भीष्म उवाच:
अवहन्मां भृशं राजन्मनोमारुतरंहसः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
गत्वाहं तत्कुरुक्षेत्रं स च रामः प्रतापवान् |
१७ क
भीष्म उवाच:
युद्धाय़ सहसा राजन्पराक्रान्तौ परस्परम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
ततः सन्दर्शनेऽतिष्ठं रामस्यातितपस्विनः |
१८ क
भीष्म उवाच:
प्रगृह्य शङ्खप्रवरं ततः प्राधममुत्तमम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तत्र द्विजा राजंस्तापसाश्च वनौकसः |
१९ क
भीष्म उवाच:
अपश्यन्त रणं दिव्यं देवाः सर्षिगणास्तदा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ततो दिव्यानि माल्यानि प्रादुरासन्मुहुर्मुहुः |
२० क
भीष्म उवाच:
वादित्राणि च दिव्यानि मेघवृन्दानि चैव ह ||
२० ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते तापसाः सर्वे भार्गवस्यानुय़ाय़िनः |
२१ क
भीष्म उवाच:
प्रेक्षकाः समपद्यन्त परिवार्य रणाजिरम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
ततो मामव्रवीद्देवी सर्वभूतहितैषिणी |
२२ क
भीष्म उवाच:
माता स्वरूपिणी राजन्किमिदं ते चिकीर्षितम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
गत्वाहं जामदग्न्यं तं प्रय़ाचिष्ये कुरूद्वह |
२३ क
भीष्म उवाच:
भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति पुनः पुनः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
मा मैवं पुत्र निर्वन्धं कुरु विप्रेण पार्थिव |
२४ क
भीष्म उवाच:
जामदग्न्येन समरे योद्धुमित्यवभर्त्सय़त् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
किं न वै क्षत्रिय़हरो हरतुल्यपराक्रमः |
२५ क
भीष्म उवाच:
विदितः पुत्र रामस्ते यतस्त्वं योद्धुमिच्छसि ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहमव्रुवं देवीमभिवाद्य कृताञ्जलिः |
२६ क
भीष्म उवाच:
सर्वं तद्भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वय़ंवरे ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
यथा च रामो राजेन्द्र मय़ा पूर्वं प्रसादितः |
२७ क
भीष्म उवाच:
काशिराजसुताय़ाश्च यथा कामः पुरातनः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
ततः सा राममभ्येत्य जननी मे महानदी |
२८ क
भीष्म उवाच:
मदर्थं तमृषिं देवी क्षमय़ामास भार्गवम् |
२८ ख
भीष्म उवाच:
भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति वचोऽव्रवीत् ||
२८ ग
भीष्म उवाच:
स च तामाह याचन्तीं भीष्ममेव निवर्तय़ |
२९ क
भीष्म उवाच:
न हि मे कुरुते काममित्यहं तमुपागमम् ||
२९ ख
सञ्जय़ उवाच:
ततो गङ्गा सुतस्नेहाद्भीष्मं पुनरुपागमत् |
३० क
सञ्जय़ उवाच:
न चास्याः सोऽकरोद्वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षणः ||
३० ख
सञ्जय़ उवाच:
अथादृश्यत धर्मात्मा भृगुश्रेष्ठो महातपाः |
३१ क
सञ्जय़ उवाच:
आह्वय़ामास च पुनर्युद्धाय़ द्विजसत्तमः ||
३१ ख