भीष्म उवाच:
तमहं स्मय़न्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् |
१ क
भीष्म उवाच:
भूमिष्ठं नोत्सहे योद्धुं भवन्तं रथमास्थितः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
आरोह स्यन्दनं वीर कवचं च महाभुज |
२ क
भीष्म उवाच:
वधान समरे राम यदि योद्धुं मय़ेच्छसि ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ततो मामव्रवीद्रामः स्मय़मानो रणाजिरे |
३ क
भीष्म उवाच:
रथो मे मेदिनी भीष्म वाहा वेदाः सदश्ववत् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सूतो मे मातरिश्वा वै कवचं वेदमातरः |
४ क
भीष्म उवाच:
सुसंवीतो रणे ताभिर्योत्स्येऽहं कुरुनन्दन ||
४ ख
भीष्म उवाच:
एवं व्रुवाणो गान्धारे रामो मां सत्यविक्रमः |
५ क
भीष्म उवाच:
शरव्रातेन महता सर्वतः पर्यवारय़त् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽपश्यं जामदग्न्यं रथे दिव्ये व्यवस्थितम् |
६ क
भीष्म उवाच:
सर्वाय़ुधधरे श्रीमत्यद्भुतोपमदर्शने ||
६ ख
भीष्म उवाच:
मनसा विहिते पुण्ये विस्तीर्णे नगरोपमे |
७ क
भीष्म उवाच:
दिव्याश्वय़ुजि संनद्धे काञ्चनेन विभूषिते ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ध्वजेन च महावाहो सोमालङ्कृतलक्ष्मणा |
८ क
भीष्म उवाच:
धनुर्धरो वद्धतूणो वद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
सारथ्यं कृतवांस्तत्र युय़ुत्सोरकृतव्रणः |
९ क
भीष्म उवाच:
सखा वेदविदत्यन्तं दय़ितो भार्गवस्य ह ||
९ ख
भीष्म उवाच:
आह्वय़ानः स मां युद्धे मनो हर्षय़तीव मे |
१० क
भीष्म उवाच:
पुनः पुनरभिक्रोशन्नभिय़ाहीति भार्गवः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
तमादित्यमिवोद्यन्तमनाधृष्यं महावलम् |
११ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़ान्तकरं राममेकमेकः समासदम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं वाणपातेषु त्रिषु वाहान्निगृह्य वै |
१२ क
भीष्म उवाच:
अवतीर्य धनुर्न्यस्य पदातिरृषिसत्तमम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अभ्यगच्छं तदा राममर्चिष्यन्द्विजसत्तमम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
अभिवाद्य चैनं विधिवदव्रुवं वाक्यमुत्तमम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
योत्स्ये त्वय़ा रणे राम विशिष्टेनाधिकेन च |
१४ क
भीष्म उवाच:
गुरुणा धर्मशीलेन जय़माशास्स्व मे विभो ||
१४ ख
राम उवाच:
एवमेतत्कुरुश्रेष्ठ कर्तव्यं भूतिमिच्छता |
१५ क
राम उवाच:
धर्मो ह्येष महावाहो विशिष्टैः सह युध्यताम् ||
१५ ख
राम उवाच:
शपेय़ं त्वां न चेदेवमागच्छेथा विशां पते |
१६ क
राम उवाच:
युध्यस्व त्वं रणे यत्तो धैर्यमालम्व्य कौरव ||
१६ ख
राम उवाच:
न तु ते जय़माशासे त्वां हि जेतुमहं स्थितः |
१७ क
राम उवाच:
गच्छ युध्यस्व धर्मेण प्रीतोऽस्मि चरितेन ते ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं तं नमस्कृत्य रथमारुह्य सत्वरः |
१८ क
भीष्म उवाच:
प्राध्मापय़ं रणे शङ्खं पुनर्हेमविभूषितम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततो युद्धं समभवन्मम तस्य च भारत |
१९ क
भीष्म उवाच:
दिवसान्सुवहून्राजन्परस्परजिगीषय़ा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
स मे तस्मिन्रणे पूर्वं प्राहरत्कङ्कपत्रिभिः |
२० क
भीष्म उवाच:
षष्ट्या शतैश्च नवभिः शराणामग्निवर्चसाम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
चत्वारस्तेन मे वाहाः सूतश्चैव विशां पते |
२१ क
भीष्म उवाच:
प्रतिरुद्धास्तथैवाहं समरे दंशितः स्थितः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
नमस्कृत्य च देवेभ्यो व्राह्मणेभ्यश्च भारत |
२२ क
भीष्म उवाच:
तमहं स्मय़न्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
आचार्यता मानिता मे निर्मर्यादे ह्यपि त्वय़ि |
२३ क
भीष्म उवाच:
भूय़स्तु शृणु मे व्रह्मन्सम्पदं धर्मसङ्ग्रहे ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
ये ते वेदाः शरीरस्था व्राह्मण्यं यच्च ते महत् |
२४ क
भीष्म उवाच:
तपश्च सुमहत्तप्तं न तेभ्यः प्रहराम्यहम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
प्रहरे क्षत्रधर्मस्य यं त्वं राम समास्थितः |
२५ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणः क्षत्रिय़त्वं हि याति शस्त्रसमुद्यमात् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
पश्य मे धनुषो वीर्यं पश्य वाह्वोर्वलं च मे |
२६ क
भीष्म उवाच:
एष ते कार्मुकं वीर द्विधा कुर्मि ससाय़कम् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तस्याहं निशितं भल्लं प्राहिण्वं भरतर्षभ |
२७ क
भीष्म उवाच:
तेनास्य धनुषः कोटिश्छिन्ना भूमिमथागमत् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
नव चापि पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् |
२८ क
भीष्म उवाच:
प्राहिण्वं कङ्कपत्राणां जामदग्न्यरथं प्रति ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
काय़े विषक्तास्तु तदा वाय़ुनाभिसमीरिताः |
२९ क
भीष्म उवाच:
चेलुः क्षरन्तो रुधिरं नागा इव च ते शराः ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
क्षतजोक्षितसर्वाङ्गः क्षरन्स रुधिरं व्रणैः |
३० क
भीष्म उवाच:
वभौ रामस्तदा राजन्मेरुर्धातूनिवोत्सृजन् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
हेमन्तान्तेऽशोक इव रक्तस्तवकमण्डितः |
३१ क
भीष्म उवाच:
वभौ रामस्तदा राजन्क्वचित्किंशुकसंनिभः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽन्यद्धनुरादाय़ रामः क्रोधसमन्वितः |
३२ क
भीष्म उवाच:
हेमपुङ्खान्सुनिशिताञ्शरांस्तान्हि ववर्ष सः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
ते समासाद्य मां रौद्रा वहुधा मर्मभेदिनः |
३३ क
भीष्म उवाच:
अकम्पय़न्महावेगाः सर्पानलविषोपमाः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं समवष्टभ्य पुनरात्मानमाहवे |
३४ क
भीष्म उवाच:
शतसङ्ख्यैः शरैः क्रुद्धस्तदा राममवाकिरम् ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
स तैरग्न्यर्कसङ्काशैः शरैराशीविषोपमैः |
३५ क
भीष्म उवाच:
शितैरभ्यर्दितो रामो मन्दचेता इवाभवत् ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं कृपय़ाविष्टो विनिन्द्यात्मानमात्मना |
३६ क
भीष्म उवाच:
धिग्धिगित्यव्रुवं युद्धं क्षत्रं च भरतर्षभ ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
असकृच्चाव्रुवं राजञ्शोकवेगपरिप्लुतः |
३७ क
भीष्म उवाच:
अहो वत कृतं पापं मय़ेदं क्षत्रकर्मणा ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
गुरुर्द्विजातिर्धर्मात्मा यदेवं पीडितः शरैः |
३८ क
भीष्म उवाच:
ततो न प्राहरं भूय़ो जामदग्न्याय़ भारत ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
अथावताप्य पृथिवीं पूषा दिवससङ्क्षय़े |
३९ क
भीष्म उवाच:
जगामास्तं सहस्रांशुस्ततो युद्धमुपारमत् ||
३९ ख