भीष्म उवाच:
आत्मनस्तु ततः सूतो हय़ानां च विशां पते |
१ क
भीष्म उवाच:
मम चापनय़ामास शल्यान्कुशलसंमतः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
स्नातोपवृत्तैस्तुरगैर्लव्धतोय़ैरविह्वलैः |
२ क
भीष्म उवाच:
प्रभात उदिते सूर्ये ततो युद्धमवर्तत ||
२ ख
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा मां तूर्णमाय़ान्तं दंशितं स्यन्दने स्थितम् |
३ क
भीष्म उवाच:
अकरोद्रथमत्यर्थं रामः सज्जं प्रतापवान् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं राममाय़ान्तं दृष्ट्वा समरकाङ्क्षिणम् |
४ क
भीष्म उवाच:
धनुःश्रेष्ठं समुत्सृज्य सहसावतरं रथात् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
अभिवाद्य तथैवाहं रथमारुह्य भारत |
५ क
भीष्म उवाच:
युय़ुत्सुर्जामदग्न्यस्य प्रमुखे वीतभीः स्थितः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
ततो मां शरवर्षेण महता समवाकिरत् |
६ क
भीष्म उवाच:
अहं च शरवर्षेण वर्षन्तं समवाकिरम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
सङ्क्रुद्धो जामदग्न्यस्तु पुनरेव पतत्रिणः |
७ क
भीष्म उवाच:
प्रेषय़ामास मे राजन्दीप्तास्यानुरगानिव ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तानहं निशितैर्भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः |
८ क
भीष्म उवाच:
अच्छिदं सहसा राजन्नन्तरिक्षे पुनः पुनः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततस्त्वस्त्राणि दिव्यानि जामदग्न्यः प्रतापवान् |
९ क
भीष्म उवाच:
मय़ि प्रचोदय़ामास तान्यहं प्रत्यषेधय़म् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अस्त्रैरेव महावाहो चिकीर्षन्नधिकां क्रिय़ाम् |
१० क
भीष्म उवाच:
ततो दिवि महान्नादः प्रादुरासीत्समन्ततः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहमस्त्रं वाय़व्यं जामदग्न्ये प्रय़ुक्तवान् |
११ क
भीष्म उवाच:
प्रत्याजघ्ने च तद्रामो गुह्यकास्त्रेण भारत ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽस्त्रमहमाग्नेय़मनुमन्त्र्य प्रय़ुक्तवान् |
१२ क
भीष्म उवाच:
वारुणेनैव रामस्तद्वारय़ामास मे विभुः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
एवमस्त्राणि दिव्यानि रामस्याहमवारय़म् |
१३ क
भीष्म उवाच:
रामश्च मम तेजस्वी दिव्यास्त्रविदरिन्दमः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
ततो मां सव्यतो राजन्रामः कुर्वन्द्विजोत्तमः |
१४ क
भीष्म उवाच:
उरस्यविध्यत्सङ्क्रुद्धो जामदग्न्यो महावलः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ संन्यषीदं रथोत्तमे |
१५ क
भीष्म उवाच:
अथ मां कश्मलाविष्टं सूतस्तूर्णमपावहत् |
१५ ख
भीष्म उवाच:
गोरुतं भरतश्रेष्ठ रामवाणप्रपीडितम् ||
१५ ग
भीष्म उवाच:
ततो मामपय़ातं वै भृशं विद्धमचेतसम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
रामस्यानुचरा हृष्टाः सर्वे दृष्ट्वा प्रचुक्रुशुः |
१६ ख
भीष्म उवाच:
अकृतव्रणप्रभृतय़ः काशिकन्या च भारत ||
१६ ग
भीष्म उवाच:
ततस्तु लव्धसञ्ज्ञोऽहं ज्ञात्वा सूतमथाव्रुवम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
याहि सूत यतो रामः सज्जोऽहं गतवेदनः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
ततो मामवहत्सूतो हय़ैः परमशोभितैः |
१८ क
भीष्म उवाच:
नृत्यद्भिरिव कौरव्य मारुतप्रतिमैर्गतौ ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं राममासाद्य वाणजालेन कौरव |
१९ क
भीष्म उवाच:
अवाकिरं सुसंरव्धः संरव्धं विजिगीषय़ा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
तानापतत एवासौ रामो वाणानजिह्मगान् |
२० क
भीष्म उवाच:
वाणैरेवाच्छिनत्तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे ||
२० ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते मृदिताः सर्वे मम वाणाः सुसंशिताः |
२१ क
भीष्म उवाच:
रामवाणैर्द्विधा छिन्नाः शतशोऽथ महाहवे ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसंमितम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
असृजं जामदग्न्याय़ रामाय़ाहं जिघांसय़ा ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
तेन त्वभिहतो गाढं वाणच्छेदवशं गतः |
२३ क
भीष्म उवाच:
मुमोह सहसा रामो भूमौ च निपपात ह ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
ततो हाहाकृतं सर्वं रामे भूतलमाश्रिते |
२४ क
भीष्म उवाच:
जगद्भारत संविग्नं यथार्कपतनेऽभवत् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
तत एनं सुसंविग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः |
२५ क
भीष्म उवाच:
तपोधनास्ते सहसा काश्या च भृगुनन्दनम् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
त एनं सम्परिष्वज्य शनैराश्वासय़ंस्तदा |
२६ क
भीष्म उवाच:
पाणिभिर्जलशीतैश्च जय़ाशीर्भिश्च कौरव ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ततः स विह्वलो वाक्यं राम उत्थाय़ माव्रवीत् |
२७ क
भीष्म उवाच:
तिष्ठ भीष्म हतोऽसीति वाणं सन्धाय़ कार्मुके ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
स मुक्तो न्यपतत्तूर्णं पार्श्वे सव्ये महाहवे |
२८ क
भीष्म उवाच:
येनाहं भृशसंविग्नो व्याघूर्णित इव द्रुमः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
हत्वा हय़ांस्ततो राजञ्शीघ्रास्त्रेण महाहवे |
२९ क
भीष्म उवाच:
अवाकिरन्मां विश्रव्धो वाणैस्तैर्लोमवाहिभिः ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहमपि शीघ्रास्त्रं समरेऽप्रतिवारणम् |
३० क
भीष्म उवाच:
अवासृजं महावाहो तेऽन्तराधिष्ठिताः शराः |
३० ख
भीष्म उवाच:
रामस्य मम चैवाशु व्योमावृत्य समन्ततः ||
३० ग
भीष्म उवाच:
न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः |
३१ क
भीष्म उवाच:
मातरिश्वान्तरे तस्मिन्मेघरुद्ध इवानदत् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
ततो वाय़ोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च मरीचिभिः |
३२ क
भीष्म उवाच:
अभितापात्स्वभावाच्च पावकः समजाय़त ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना |
३३ क
भीष्म उवाच:
भूमौ सर्वे तदा राजन्भस्मभूताः प्रपेदिरे ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
तदा शतसहस्राणि प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |
३४ क
भीष्म उवाच:
अय़ुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव |
३४ ख
भीष्म उवाच:
रामः शराणां सङ्क्रुद्धो मय़ि तूर्णमपातय़त् ||
३४ ग
भीष्म उवाच:
ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः |
३५ क
भीष्म उवाच:
सञ्छिद्य भूमौ नृपतेऽपातय़ं पन्नगानिव ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
एवं तदभवद्युद्धं तदा भरतसत्तम |
३६ क
भीष्म उवाच:
सन्ध्याकाले व्यतीते तु व्यपाय़ात्स च मे गुरुः ||
३६ ख