भीष्म उवाच:
ततः प्रभाते राजेन्द्र सूर्ये विमल उद्गते |
१ क
भीष्म उवाच:
भार्गवस्य मय़ा सार्धं पुनर्युद्धमवर्तत ||
१ ख
भीष्म उवाच:
ततो भ्रान्ते रथे तिष्ठन्रामः प्रहरतां वरः |
२ क
भीष्म उवाच:
ववर्ष शरवर्षाणि मय़ि शक्र इवाचले ||
२ ख
भीष्म उवाच:
तेन सूतो मम सुहृच्छरवर्षेण ताडितः |
३ क
भीष्म उवाच:
निपपात रथोपस्थे मनो मम विषादय़न् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ततः सूतः स मेऽत्यर्थं कश्मलं प्राविशन्महत् |
४ क
भीष्म उवाच:
पृथिव्यां च शराघातान्निपपात मुमोह च ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततः सूतोऽजहात्प्राणान्रामवाणप्रपीडितः |
५ क
भीष्म उवाच:
मुहूर्तादिव राजेन्द्र मां च भीराविशत्तदा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
ततः सूते हते राजन्क्षिपतस्तस्य मे शरान् |
६ क
भीष्म उवाच:
प्रमत्तमनसो रामः प्राहिणोन्मृत्युसंमितान् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
ततः सूतव्यसनिनं विप्लुतं मां स भार्गवः |
७ क
भीष्म उवाच:
शरेणाभ्यहनद्गाढं विकृष्य वलवद्धनुः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
स मे जत्र्वन्तरे राजन्निपत्य रुधिराशनः |
८ क
भीष्म उवाच:
मय़ैव सह राजेन्द्र जगाम वसुधातलम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
मत्वा तु निहतं रामस्ततो मां भरतर्षभ |
९ क
भीष्म उवाच:
मेघवद्व्यनदच्चोच्चैर्जहृषे च पुनः पुनः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
तथा तु पतिते राजन्मय़ि रामो मुदा युतः |
१० क
भीष्म उवाच:
उदक्रोशन्महानादं सह तैरनुय़ाय़िभिः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
मम तत्राभवन्ये तु कौरवाः पार्श्वतः स्थिताः |
११ क
भीष्म उवाच:
आगता ये च युद्धं तज्जनास्तत्र दिदृक्षवः |
११ ख
भीष्म उवाच:
आर्तिं परमिकां जग्मुस्ते तदा मय़ि पातिते ||
११ ग
भीष्म उवाच:
ततोऽपश्यं पातितो राजसिंह; द्विजानष्टौ सूर्यहुताशनाभान् |
१२ क
भीष्म उवाच:
ते मां समन्तात्परिवार्य तस्थुः; स्ववाहुभिः परिगृह्याजिमध्ये ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
रक्ष्यमाणश्च तैर्विप्रैर्नाहं भूमिमुपास्पृशम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
अन्तरिक्षे स्थितो ह्यस्मि तैर्विप्रैर्वान्धवैरिव |
१३ ख
भीष्म उवाच:
स्वपन्निवान्तरिक्षे च जलविन्दुभिरुक्षितः ||
१३ ग
भीष्म उवाच:
ततस्ते व्राह्मणा राजन्नव्रुवन्परिगृह्य माम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
मा भैरिति समं सर्वे स्वस्ति तेऽस्त्विति चासकृत् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तेषामहं वाग्भिस्तर्पितः सहसोत्थितः |
१५ क
भीष्म उवाच:
मातरं सरितां श्रेष्ठामपश्यं रथमास्थिताम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
हय़ाश्च मे सङ्गृहीतास्तय़ा वै; महानद्या संय़ति कौरवेन्द्र |
१६ क
भीष्म उवाच:
पादौ जनन्याः प्रतिपूज्य चाहं; तथार्ष्टिषेणं रथमभ्यरोहम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ररक्ष सा मम रथं हय़ांश्चोपस्कराणि च |
१७ क
भीष्म उवाच:
तामहं प्राञ्जलिर्भूत्वा पुनरेव व्यसर्जय़म् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं स्वय़मुद्यम्य हय़ांस्तान्वातरंहसः |
१८ क
भीष्म उवाच:
अय़ुध्यं जामदग्न्येन निवृत्तेऽहनि भारत ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ वेगवन्तं महावलम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
अमुञ्चं समरे वाणं रामाय़ हृदय़च्छिदम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ततो जगाम वसुधां वाणवेगप्रपीडितः |
२० क
भीष्म उवाच:
जानुभ्यां धनुरुत्सृज्य रामो मोहवशं गतः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
ततस्तस्मिन्निपतिते रामे भूरिसहस्रदे |
२१ क
भीष्म उवाच:
आवव्रुर्जलदा व्योम क्षरन्तो रुधिरं वहु ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
उल्काश्च शतशः पेतुः सनिर्घाताः सकम्पनाः |
२२ क
भीष्म उवाच:
अर्कं च सहसा दीप्तं स्वर्भानुरभिसंवृणोत् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
ववुश्च वाताः परुषाश्चलिता च वसुन्धरा |
२३ क
भीष्म उवाच:
गृध्रा वडाश्च कङ्काश्च परिपेतुर्मुदा युताः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
दीप्ताय़ां दिशि गोमाय़ुर्दारुणं मुहुरुन्नदत् |
२४ क
भीष्म उवाच:
अनाहता दुन्दुभय़ो विनेदुर्भृशनिस्वनाः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
एतदौत्पातिकं घोरमासीद्भरतसत्तम |
२५ क
भीष्म उवाच:
विसञ्ज्ञकल्पे धरणीं गते रामे महात्मनि ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
ततो रविर्मन्दमरीचिमण्डलो; जगामास्तं पांसुपुञ्जावगाढः |
२६ क
भीष्म उवाच:
निशा व्यगाहत्सुखशीतमारुता; ततो युद्धं प्रत्यवहारय़ावः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
एवं राजन्नवहारो वभूव; ततः पुनर्विमलेऽभूत्सुघोरम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
काल्यं काल्यं विंशतिं वै दिनानि; तथैव चान्यानि दिनानि त्रीणि ||
२७ ख