भीष्म उवाच:
ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रणम्य शिरसा तदा |
१ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणानां पितॄणां च देवतानां च सर्वशः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
नक्तञ्चराणां भूतानां रजन्याश्च विशां पते |
२ क
भीष्म उवाच:
शय़नं प्राप्य रहिते मनसा समचिन्तय़म् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
जामदग्न्येन मे युद्धमिदं परमदारुणम् |
३ क
भीष्म उवाच:
अहानि सुवहून्यद्य वर्तते सुमहात्ययम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
न च रामं महावीर्यं शक्नोमि रणमूर्धनि |
४ क
भीष्म उवाच:
विजेतुं समरे विप्रं जामदग्न्यं महावलम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
यदि शक्यो मय़ा जेतुं जामदग्न्यः प्रतापवान् |
५ क
भीष्म उवाच:
दैवतानि प्रसन्नानि दर्शय़न्तु निशां मम ||
५ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं निशि राजेन्द्र प्रसुप्तः शरविक्षतः |
६ क
भीष्म उवाच:
दक्षिणेनैव पार्श्वेन प्रभातसमय़े इव ||
६ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं विप्रमुख्यैस्तैर्यैरस्मि पतितो रथात् |
७ क
भीष्म उवाच:
उत्थापितो धृतश्चैव मा भैरिति च सान्त्वितः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
त एव मां महाराज स्वप्नदर्शनमेत्य वै |
८ क
भीष्म उवाच:
परिवार्याव्रुवन्वाक्यं तन्निवोध कुरूद्वह ||
८ ख
भीष्म उवाच:
उत्तिष्ठ मा भैर्गाङ्गेय़ भय़ं ते नास्ति किञ्चन |
९ क
भीष्म उवाच:
रक्षामहे नरव्याघ्र स्वशरीरं हि नो भवान् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
न त्वां रामो रणे जेता जामदग्न्यः कथञ्चन |
१० क
भीष्म उवाच:
त्वमेव समरे रामं विजेता भरतर्षभ ||
१० ख
भीष्म उवाच:
इदमस्त्रं सुदय़ितं प्रत्यभिज्ञास्यते भवान् |
११ क
भीष्म उवाच:
विदितं हि तवाप्येतत्पूर्वस्मिन्देहधारणे ||
११ ख
भीष्म उवाच:
प्राजापत्यं विश्वकृतं प्रस्वापं नाम भारत |
१२ क
भीष्म उवाच:
न हीदं वेद रामोऽपि पृथिव्यां वा पुमान्क्वचित् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
तत्स्मरस्व महावाहो भृशं संय़ोजय़स्व च |
१३ क
भीष्म उवाच:
न च रामः क्षय़ं गन्ता तेनास्त्रेण नराधिप ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
एनसा च न योगं त्वं प्राप्स्यसे जातु मानद |
१४ क
भीष्म उवाच:
स्वप्स्यते जामदग्न्योऽसौ त्वद्वाणवलपीडितः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ततो जित्वा त्वमेवैनं पुनरुत्थापय़िष्यसि |
१५ क
भीष्म उवाच:
अस्त्रेण दय़ितेनाजौ भीष्म सम्वोधनेन वै ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
एवं कुरुष्व कौरव्य प्रभाते रथमास्थितः |
१६ क
भीष्म उवाच:
प्रसुप्तं वा मृतं वापि तुल्यं मन्यामहे वय़म् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
न च रामेण मर्तव्यं कदाचिदपि पार्थिव |
१७ क
भीष्म उवाच:
ततः समुत्पन्नमिदं प्रस्वापं युज्यतामिति ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्त्वान्तर्हिता राजन्सर्व एव द्विजोत्तमाः |
१८ क
भीष्म उवाच:
अष्टौ सदृशरूपास्ते सर्वे भास्वरमूर्तय़ः ||
१८ ख