chevron_left वन पर्व अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो निविशमानांस्तान्सैनिकान्रावणानुगाः |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिजग्मुर्गणानेके पिशाचक्षुद्ररक्षसाम् ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पर्वणः पूतनो जम्भः खरः क्रोधवशो हरिः |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्ररुजश्चारुजश्चैव प्रघसश्चैवमादय़ः ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽभिपततां तेषामदृश्यानां दुरात्मनाम् |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तर्धानवधं तज्ज्ञश्चकार स विभीषणः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ते दृश्यमाना हरिभिर्वलिभिर्दूरपातिभिः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निहताः सर्वशो राजन्महीं जग्मुर्गतासवः ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अमृष्यमाणः सवलो रावणो निर्ययावथ |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्यूह्य चौशनसं व्यूहं हरीन्सर्वानहारय़त् ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
राघवस्त्वभिनिर्याय़ व्यूढानीकं दशाननम् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वार्हस्पत्यं विधिं कृत्वा प्रत्यव्यूहन्निशाचरम् ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
समेत्य युय़ुधे तत्र ततो रामेण रावणः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
युय़ुधे लक्ष्मणश्चैव तथैवेन्द्रजिता सह ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विरूपाक्षेण सुग्रीवस्तारेण च निखर्वटः |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तुण्डेन च नलस्तत्र पटुशः पनसेन च ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विषह्यं यं हि यो मेने स स तेन समेय़िवान् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
युय़ुधे युद्धवेलाय़ां स्ववाहुवलमाश्रितः ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स सम्प्रहारो ववृधे भीरूणां भय़वर्धनः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोमसंहर्षणो घोरः पुरा देवासुरे यथा ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणो राममानर्छच्छक्तिशूलासिवृष्टिभिः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निशितैराय़सैस्तीक्ष्णै रावणं चापि राघवः ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथैवेन्द्रजितं यत्तं लक्ष्मणो मर्मभेदिभिः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इन्द्रजिच्चापि सौमित्रिं विभेद वहुभिः शरैः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विभीषणः प्रहस्तं च प्रहस्तश्च विभीषणम् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
खगपत्रैः शरैस्तीक्ष्णैरभ्यवर्षद्गतव्यथः ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेषां वलवतामासीन्महास्त्राणां समागमः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विव्यथुः सकला येन त्रय़ो लोकाश्चराचराः ||
१४ ख