chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १८६
भीष्म उवाच:
ततो हलहलाशव्दो दिवि राजन्महानभूत् |
१ क
भीष्म उवाच:
प्रस्वापं भीष्म मा स्राक्षीरिति कौरवनन्दन ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अय़ुञ्जमेव चैवाहं तदस्त्रं भृगुनन्दने |
२ क
भीष्म उवाच:
प्रस्वापं मां प्रय़ुञ्जानं नारदो वाक्यमव्रवीत् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
एते विय़ति कौरव्य दिवि देवगणाः स्थिताः |
३ क
भीष्म उवाच:
ते त्वां निवारय़न्त्यद्य प्रस्वापं मा प्रय़ोजय़ ||
३ ख
भीष्म उवाच:
रामस्तपस्वी व्रह्मण्यो व्राह्मणश्च गुरुश्च ते |
४ क
भीष्म उवाच:
तस्यावमानं कौरव्य मा स्म कार्षीः कथञ्चन ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽपश्यं दिविष्ठान्वै तानष्टौ व्रह्मवादिनः |
५ क
भीष्म उवाच:
ते मां स्मय़न्तो राजेन्द्र शनकैरिदमव्रुवन् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
यथाह भरतश्रेष्ठ नारदस्तत्तथा कुरु |
६ क
भीष्म उवाच:
एतद्धि परमं श्रेय़ो लोकानां भरतर्षभ ||
६ ख
भीष्म उवाच:
ततश्च प्रतिसंहृत्य तदस्त्रं स्वापनं मृधे |
७ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मास्त्रं दीपय़ां चक्रे तस्मिन्युधि यथाविधि ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततो रामो रुषितो राजपुत्र; दृष्ट्वा तदस्त्रं विनिवर्तितं वै |
८ क
भीष्म उवाच:
जितोऽस्मि भीष्मेण सुमन्दवुद्धि; रित्येव वाक्यं सहसा व्यमुञ्चत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽपश्यत्पितरं जामदग्न्यः; पितुस्तथा पितरं तस्य चान्यम् |
९ क
भीष्म उवाच:
त एवैनं सम्परिवार्य तस्थु; रूचुश्चैनं सान्त्वपूर्वं तदानीम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
मा स्मैवं साहसं वत्स पुनः कार्षीः कथञ्चन |
१० क
भीष्म उवाच:
भीष्मेण संय़ुगं गन्तुं क्षत्रिय़ेण विशेषतः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़स्य तु धर्मोऽय़ं यद्युद्धं भृगुनन्दन |
११ क
भीष्म उवाच:
स्वाध्याय़ो व्रतचर्या च व्राह्मणानां परं धनम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
इदं निमित्ते कस्मिंश्चिदस्माभिरुपमन्त्रितम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
शस्त्रधारणमत्युग्रं तच्च कार्यं कृतं त्वय़ा ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
वत्स पर्याप्तमेतावद्भीष्मेण सह संय़ुगे |
१३ क
भीष्म उवाच:
विमर्दस्ते महावाहो व्यपय़ाहि रणादितः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
पर्याप्तमेतद्भद्रं ते तव कार्मुकधारणम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
विसर्जय़ैतद्दुर्धर्ष तपस्तप्यस्व भार्गव ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
एष भीष्मः शान्तनवो देवैः सर्वैर्निवारितः |
१५ क
भीष्म उवाच:
निवर्तस्व रणादस्मादिति चैव प्रचोदितः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
रामेण सह मा योत्सीर्गुरुणेति पुनः पुनः |
१६ क
भीष्म उवाच:
न हि रामो रणे जेतुं त्वय़ा न्याय़्यः कुरूद्वह |
१६ ख
भीष्म उवाच:
मानं कुरुष्व गाङ्गेय़ व्राह्मणस्य रणाजिरे ||
१६ ग
भीष्म उवाच:
वय़ं तु गुरवस्तुभ्यं ततस्त्वां वारय़ामहे |
१७ क
भीष्म उवाच:
भीष्मो वसूनामन्यतमो दिष्ट्या जीवसि पुत्रक ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
गाङ्गेय़ः शन्तनोः पुत्रो वसुरेष महाय़शाः |
१८ क
भीष्म उवाच:
कथं त्वय़ा रणे जेतुं राम शक्यो निवर्त वै ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अर्जुनः पाण्डवश्रेष्ठः पुरन्दरसुतो वली |
१९ क
भीष्म उवाच:
नरः प्रजापतिर्वीरः पूर्वदेवः सनातनः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
सव्यसाचीति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् |
२० क
भीष्म उवाच:
भीष्ममृत्युर्यथाकालं विहितो वै स्वय़म्भुवा ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तः स पितृभिः पितॄन्रामोऽव्रवीदिदम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
नाहं युधि निवर्तेय़मिति मे व्रतमाहितम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
न निवर्तितपूर्वं च कदाचिद्रणमूर्धनि |
२२ क
भीष्म उवाच:
निवर्त्यतामापगेय़ः कामं युद्धात्पितामहाः |
२२ ख
भीष्म उवाच:
न त्वहं विनिवर्तिष्ये युद्धादस्मात्कथञ्चन ||
२२ ग
भीष्म उवाच:
ततस्ते मुनय़ो राजन्नृचीकप्रमुखास्तदा |
२३ क
भीष्म उवाच:
नारदेनैव सहिताः समागम्येदमव्रुवन् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
निवर्तस्व रणात्तात मानय़स्व द्विजोत्तमान् |
२४ क
भीष्म उवाच:
नेत्यवोचमहं तांश्च क्षत्रधर्मव्यपेक्षय़ा ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
मम व्रतमिदं लोके नाहं युद्धात्कथञ्चन |
२५ क
भीष्म उवाच:
विमुखो विनिवर्तेय़ं पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
नाहं लोभान्न कार्पण्यान्न भय़ान्नार्थकारणात् |
२६ क
भीष्म उवाच:
त्यजेय़ं शाश्वतं धर्ममिति मे निश्चिता मतिः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते मुनय़ः सर्वे नारदप्रमुखा नृप |
२७ क
भीष्म उवाच:
भागीरथी च मे माता रणमध्यं प्रपेदिरे ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
तथैवात्तशरो धन्वी तथैव दृढनिश्चय़ः |
२८ क
भीष्म उवाच:
स्थितोऽहमाहवे योद्धुं ततस्ते राममव्रुवन् |
२८ ख
भीष्म उवाच:
समेत्य सहिता भूय़ः समरे भृगुनन्दनम् ||
२८ ग
भीष्म उवाच:
नावनीतं हि हृदय़ं विप्राणां शाम्य भार्गव |
२९ क
भीष्म उवाच:
राम राम निवर्तस्व युद्धादस्माद्द्विजोत्तम |
२९ ख
भीष्म उवाच:
अवध्यो हि त्वय़ा भीष्मस्त्वं च भीष्मस्य भार्गव ||
२९ ग
भीष्म उवाच:
एवं व्रुवन्तस्ते सर्वे प्रतिरुध्य रणाजिरम् |
३० क
भीष्म उवाच:
न्यासय़ां चक्रिरे शस्त्रं पितरो भृगुनन्दनम् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं पुनरेवाथ तानष्टौ व्रह्मवादिनः |
३१ क
भीष्म उवाच:
अद्राक्षं दीप्यमानान्वै ग्रहानष्टाविवोदितान् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
ते मां सप्रणय़ं वाक्यमव्रुवन्समरे स्थितम् |
३२ क
भीष्म उवाच:
प्रैहि रामं महावाहो गुरुं लोकहितं कुरु ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा निवर्तितं रामं सुहृद्वाक्येन तेन वै |
३३ क
भीष्म उवाच:
लोकानां च हितं कुर्वन्नहमप्याददे वचः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं राममासाद्य ववन्दे भृशविक्षतः |
३४ क
भीष्म उवाच:
रामश्चाभ्युत्स्मय़न्प्रेम्णा मामुवाच महातपाः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन्क्षत्रिय़ः पृथिवीचरः |
३५ क
भीष्म उवाच:
गम्यतां भीष्म युद्धेऽस्मिंस्तोषितोऽहं भृशं त्वय़ा ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
मम चैव समक्षं तां कन्यामाहूय़ भार्गवः |
३६ क
भीष्म उवाच:
उवाच दीनय़ा वाचा मध्ये तेषां तपस्विनाम् ||
३६ ख