युधिष्ठिर उवाच:
अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह चिन्त्यते |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
यदध्यात्मं यतश्चैतत्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अध्यात्ममिति मां पार्थ यदेतदनुपृच्छसि |
२ क
भीष्म उवाच:
तद्व्याख्यास्यामि ते तात श्रेय़स्करतरं सुखम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विन्दति |
३ क
भीष्म उवाच:
फललाभश्च सद्यः स्यात्सर्वभूतहितं च तत् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
४ क
भीष्म उवाच:
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततः सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति पुनः पुनः |
५ क
भीष्म उवाच:
महाभूतानि भूतेषु सागरस्योर्मय़ो यथा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
प्रसार्य च यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः |
६ क
भीष्म उवाच:
तद्वद्भूतानि भूतात्मा सृष्ट्वा संहरते पुनः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् |
७ क
भीष्म उवाच:
अकरोत्तेषु वैषम्यं तत्तु जीवोऽनु पश्यति ||
७ ख
भीष्म उवाच:
शव्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रय़माकाशय़ोनिजम् |
८ क
भीष्म उवाच:
वाय़ोस्त्वक्स्पर्शचेष्टाश्च वागित्येतच्चतुष्टय़म् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
रूपं चक्षुस्तथा पक्तिस्त्रिविधं तेज उच्यते |
९ क
भीष्म उवाच:
रसः क्लेदश्च जिह्वा च त्रय़ो जलगुणाः स्मृताः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
घ्रेय़ं घ्राणं शरीरं च ते तु भूमिगुणास्त्रय़ः |
१० क
भीष्म उवाच:
महाभूतानि पञ्चैव षष्ठं तु मन उच्यते ||
१० ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ाणि मनश्चैव विज्ञानान्यस्य भारत |
११ क
भीष्म उवाच:
सप्तमी वुद्धिरित्याहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
चक्षुरालोकनाय़ैव संशय़ं कुरुते मनः |
१२ क
भीष्म उवाच:
वुद्धिरध्यवसाय़ाय़ क्षेत्रज्ञः साक्षिवत्स्थितः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ऊर्ध्वं पादतलाभ्यां यदर्वागूर्ध्वं च पश्यति |
१३ क
भीष्म उवाच:
एतेन सर्वमेवेदं विद्ध्यभिव्याप्तमन्तरम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
पुरुषे चेन्द्रिय़ाणीह वेदितव्यानि कृत्स्नशः |
१४ क
भीष्म उवाच:
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि भावांस्तदाश्रय़ान् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
एतां वुद्ध्वा नरो वुद्ध्या भूतानामागतिं गतिम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
समवेक्ष्य शनैश्चैव लभते शममुत्तमम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
गुणान्नेनीय़ते वुद्धिर्वुद्धिरेवेन्द्रिय़ाण्यपि |
१६ क
भीष्म उवाच:
मनःषष्ठानि सर्वाणि वुद्ध्यभावे कुतो गुणाः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
इति तन्मय़मेवैतत्सर्वं स्थावरजङ्गमम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
प्रलीय़ते चोद्भवति तस्मान्निर्दिश्यते तथा ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते |
१८ क
भीष्म उवाच:
जिघ्रति घ्राणमित्याहू रसं जानाति जिह्वय़ा ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
त्वचा स्पृशति च स्पर्शान्वुद्धिर्विक्रिय़तेऽसकृत् |
१९ क
भीष्म उवाच:
येन सङ्कल्पय़त्यर्थं किञ्चिद्भवति तन्मनः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अधिष्ठानानि वुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा |
२० क
भीष्म उवाच:
पञ्चेन्द्रिय़ाणि यान्याहुस्तान्यदृश्योऽधितिष्ठति ||
२० ख
भीष्म उवाच:
पुरुषाधिष्ठिता वुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते |
२१ क
भीष्म उवाच:
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदनुशोचति ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते |
२२ क
भीष्म उवाच:
एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
सेय़ं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतान्नातिवर्तते |
२३ क
भीष्म उवाच:
सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अतिभावगता वुद्धिर्भावे मनसि वर्तते |
२४ क
भीष्म उवाच:
प्रवर्तमानं हि रजस्तद्भावमनुवर्तते ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ाणि हि सर्वाणि प्रदर्शय़ति सा सदा |
२५ क
भीष्म उवाच:
प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमो मोहश्च ते त्रय़ः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
ये ये च भावा लोकेऽस्मिन्सर्वेष्वेतेषु ते त्रिषु |
२६ क
भीष्म उवाच:
इति वुद्धिगतिः सर्वा व्याख्याता तव भारत ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता |
२७ क
भीष्म उवाच:
सत्त्वं रजस्तमश्चैव प्राणिनां संश्रिताः सदा ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
त्रिविधा वेदना चैव सर्वसत्त्वेषु दृश्यते |
२८ क
भीष्म उवाच:
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति भारत ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः |
२९ क
भीष्म उवाच:
तमोगुणेन संय़ुक्तौ भवतोऽव्यावहारिकौ ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
तत्र यत्प्रीतिसंय़ुक्तं काय़े मनसि वा भवेत् |
३० क
भीष्म उवाच:
वर्तते सात्त्विको भाव इत्यवेक्षेत तत्तदा ||
३० ख
भीष्म उवाच:
अथ यद्दुःखसंय़ुक्तमतुष्टिकरमात्मनः |
३१ क
भीष्म उवाच:
प्रवृत्तं रज इत्येव तन्नसंरभ्य चिन्तय़ेत् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
अथ यन्मोहसंय़ुक्तमव्यक्तमिव यद्भवेत् |
३२ क
भीष्म उवाच:
अप्रतर्क्यमविज्ञेय़ं तमस्तदुपधारय़ेत् ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता |
३३ क
भीष्म उवाच:
कथञ्चिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणाः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा |
३४ क
भीष्म उवाच:
लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
अभिमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता |
३५ क
भीष्म उवाच:
कथञ्चिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
दूरगं वहुधागामि प्रार्थनासंशय़ात्मकम् |
३६ क
भीष्म उवाच:
मनः सुनिय़तं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोरेतदन्तरं पश्य सूक्ष्मय़ोः |
३७ क
भीष्म उवाच:
सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
मशकोदुम्वरौ चापि सम्प्रय़ुक्तौ यथा सदा |
३८ क
भीष्म उवाच:
अन्योन्यमन्यौ च यथा सम्प्रय़ोगस्तथा तय़ोः ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रय़ुक्तौ च सर्वदा |
३९ क
भीष्म उवाच:
यथा मत्स्यो जलं चैव सम्प्रय़ुक्तौ तथैव तौ ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
न गुणा विदुरात्मानं स गुणान्वेत्ति सर्वशः |
४० क
भीष्म उवाच:
परिद्रष्टा गुणानां च संस्रष्टा मन्यते सदा ||
४० ख
भीष्म उवाच:
इन्द्रिय़ैस्तु प्रदीपार्थं कुरुते वुद्धिसप्तमैः |
४१ क
भीष्म उवाच:
निर्विचेष्टैरजानद्भिः परमात्मा प्रदीपवत् ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
सृजते हि गुणान्सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति |
४२ क
भीष्म उवाच:
सम्प्रय़ोगस्तय़ोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञय़ोर्ध्रुवः ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
आश्रय़ो नास्ति सत्त्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्चन |
४३ क
भीष्म उवाच:
सत्त्वं मनः संसृजति न गुणान्वै कदाचन ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्निय़च्छति |
४४ क
भीष्म उवाच:
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनिः |
४५ क
भीष्म उवाच:
सर्वभूतात्मभूतः स्यात्स गच्छेत्परमां गतिम् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
यथा वारिचरः पक्षी लिप्यमानो न लिप्यते |
४६ क
भीष्म उवाच:
एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
एवंस्वभावमेवैतत्स्ववुद्ध्या विहरेन्नरः |
४७ क
भीष्म उवाच:
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च चरेद्विगतमत्सरः ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
स्वभावसिद्ध्या संसिद्धान्स नित्यं सृजते गुणान् |
४८ क
भीष्म उवाच:
ऊर्णनाभिर्यथा स्रष्टा विज्ञेय़ास्तन्तुवद्गुणाः ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते |
४९ क
भीष्म उवाच:
प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिध्यति ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे |
५० क
भीष्म उवाच:
उभय़ं सम्प्रधार्यैतदध्यवस्येद्यथामति ||
५० ख