chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १८७
राम उवाच:
प्रत्यक्षमेतल्लोकानां सर्वेषामेव भामिनि |
१ क
राम उवाच:
यथा मय़ा परं शक्त्या कृतं वै पौरुषं महत् ||
१ ख
राम उवाच:
न चैव युधि शक्नोमि भीष्मं शस्त्रभृतां वरम् |
२ क
राम उवाच:
विशेषय़ितुमत्यर्थमुत्तमास्त्राणि दर्शय़न् ||
२ ख
राम उवाच:
एषा मे परमा शक्तिरेतन्मे परमं वलम् |
३ क
राम उवाच:
यथेष्टं गम्यतां भद्रे किमन्यद्वा करोमि ते ||
३ ख
राम उवाच:
भीष्ममेव प्रपद्यस्व न तेऽन्या विद्यते गतिः |
४ क
राम उवाच:
निर्जितो ह्यस्मि भीष्मेण महास्त्राणि प्रमुञ्चता ||
४ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा ततो रामो विनिःश्वस्य महामनाः |
५ क
भीष्म उवाच:
तूष्णीमासीत्तदा कन्या प्रोवाच भृगुनन्दनम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
भगवन्नेवमेवैतद्यथाह भगवांस्तथा |
६ क
भीष्म उवाच:
अजेय़ो युधि भीष्मोऽय़मपि देवैरुदारधीः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
यथाशक्ति यथोत्साहं मम कार्यं कृतं त्वय़ा |
७ क
भीष्म उवाच:
अनिधाय़ रणे वीर्यमस्त्राणि विविधानि च ||
७ ख
भीष्म उवाच:
न चैष शक्यते युद्धे विशेषय़ितुमन्ततः |
८ क
भीष्म उवाच:
न चाहमेनं यास्यामि पुनर्भीष्मं कथञ्चन ||
८ ख
भीष्म उवाच:
गमिष्यामि तु तत्राहं यत्र भीष्मं तपोधन |
९ क
भीष्म उवाच:
समरे पातय़िष्यामि स्वय़मेव भृगूद्वह ||
९ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा यय़ौ कन्या रोषव्याकुललोचना |
१० क
भीष्म उवाच:
तपसे धृतसङ्कल्पा मम चिन्तय़ती वधम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ततो महेन्द्रं सह तैर्मुनिभिर्भृगुसत्तमः |
११ क
भीष्म उवाच:
यथागतं यय़ौ रामो मामुपामन्त्र्य भारत ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽहं रथमारुह्य स्तूय़मानो द्विजातिभिः |
१२ क
भीष्म उवाच:
प्रविश्य नगरं मात्रे सत्यवत्यै न्यवेदय़म् |
१२ ख
भीष्म उवाच:
यथावृत्तं महाराज सा च मां प्रत्यनन्दत ||
१२ ग
भीष्म उवाच:
पुरुषांश्चादिशं प्राज्ञान्कन्यावृत्तान्तकर्मणि |
१३ क
भीष्म उवाच:
दिवसे दिवसे ह्यस्या गतजल्पितचेष्टितम् |
१३ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्याहरंश्च मे युक्ताः स्थिताः प्रिय़हिते मम ||
१३ ग
भीष्म उवाच:
यदैव हि वनं प्राय़ात्कन्या सा तपसे धृता |
१४ क
भीष्म उवाच:
तदैव व्यथितो दीनो गतचेता इवाभवम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
न हि मां क्षत्रिय़ः कश्चिद्वीर्येण विजय़ेद्युधि |
१५ क
भीष्म उवाच:
ऋते व्रह्मविदस्तात तपसा संशितव्रतात् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
अपि चैतन्मय़ा राजन्नारदेऽपि निवेदितम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
व्यासे चैव भय़ात्कार्यं तौ चोभौ मामवोचताम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
न विषादस्त्वय़ा कार्यो भीष्म काशिसुतां प्रति |
१७ क
भीष्म उवाच:
दैवं पुरुषकारेण को निवर्तितुमुत्सहेत् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
सा तु कन्या महाराज प्रविश्याश्रममण्डलम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
यमुनातीरमाश्रित्य तपस्तेपेऽतिमानुषम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
निराहारा कृशा रूक्षा जटिला मलपङ्किनी |
१९ क
भीष्म उवाच:
षण्मासान्वाय़ुभक्षा च स्थाणुभूता तपोधना ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
यमुनातीरमासाद्य संवत्सरमथापरम् |
२० क
भीष्म उवाच:
उदवासं निराहारा पारय़ामास भामिनी ||
२० ख
भीष्म उवाच:
शीर्णपर्णेन चैकेन पारय़ामास चापरम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
संवत्सरं तीव्रकोपा पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठिता ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
एवं द्वादश वर्षाणि तापय़ामास रोदसी |
२२ क
भीष्म उवाच:
निवर्त्यमानापि तु सा ज्ञातिभिर्नैव शक्यते ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽगमद्वत्सभूमिं सिद्धचारणसेविताम् |
२३ क
भीष्म उवाच:
आश्रमं पुण्यशीलानां तापसानां महात्मनाम् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
तत्र पुण्येषु देशेषु साप्लुताङ्गी दिवानिशम् |
२४ क
भीष्म उवाच:
व्यचरत्काशिकन्या सा यथाकामविचारिणी ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
नन्दाश्रमे महाराज ततोलूकाश्रमे शुभे |
२५ क
भीष्म उवाच:
च्यवनस्याश्रमे चैव व्रह्मणः स्थान एव च ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
प्रय़ागे देवय़जने देवारण्येषु चैव ह |
२६ क
भीष्म उवाच:
भोगवत्यां तथा राजन्कौशिकस्याश्रमे तथा ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
माण्डव्यस्याश्रमे राजन्दिलीपस्याश्रमे तथा |
२७ क
भीष्म उवाच:
रामह्रदे च कौरव्य पैलगार्ग्यस्य चाश्रमे ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
एतेषु तीर्थेषु तदा काशिकन्या विशां पते |
२८ क
भीष्म उवाच:
आप्लावय़त गात्राणि तीव्रमास्थाय़ वै तपः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
तामव्रवीत्कौरवेय़ मम माता जलोत्थिता |
२९ क
भीष्म उवाच:
किमर्थं क्लिश्यसे भद्रे तथ्यमेतद्व्रवीहि मे ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
सैनामथाव्रवीद्राजन्कृताञ्जलिरनिन्दिता |
३० क
भीष्म उवाच:
भीष्मो रामेण समरे न जितश्चारुलोचने ||
३० ख
भीष्म उवाच:
कोऽन्यस्तमुत्सहेज्जेतुमुद्यतेषुं महीपतिम् |
३१ क
भीष्म उवाच:
साहं भीष्मविनाशाय़ तपस्तप्स्ये सुदारुणम् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
चरामि पृथिवीं देवि यथा हन्यामहं नृपम् |
३२ क
भीष्म उवाच:
एतद्व्रतफलं देहे परस्मिन्स्याद्यथा हि मे ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽव्रवीत्सागरगा जिह्मं चरसि भामिनि |
३३ क
भीष्म उवाच:
नैष कामोऽनवद्याङ्गि शक्यः प्राप्तुं त्वय़ावले ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
यदि भीष्मविनाशाय़ काश्ये चरसि वै व्रतम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
व्रतस्था च शरीरं त्वं यदि नाम विमोक्ष्यसि |
३४ ख
भीष्म उवाच:
नदी भविष्यसि शुभे कुटिला वार्षिकोदका ||
३४ ग
भीष्म उवाच:
दुस्तीर्था चानभिज्ञेय़ा वार्षिकी नाष्टमासिकी |
३५ क
भीष्म उवाच:
भीमग्राहवती घोरा सर्वभूतभय़ङ्करी ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा ततो राजन्काशिकन्यां न्यवर्तत |
३६ क
भीष्म उवाच:
माता मम महाभागा स्मय़मानेव भामिनी ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
कदाचिदष्टमे मासि कदाचिद्दशमे तथा |
३७ क
भीष्म उवाच:
न प्राश्नीतोदकमपि पुनः सा वरवर्णिनी ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
सा वत्सभूमिं कौरव्य तीर्थलोभात्ततस्ततः |
३८ क
भीष्म उवाच:
पतिता परिधावन्ती पुनः काशिपतेः सुता ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
सा नदी वत्सभूम्यां तु प्रथिताम्वेति भारत |
३९ क
भीष्म उवाच:
वार्षिकी ग्राहवहुला दुस्तीर्था कुटिला तथा ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
सा कन्या तपसा तेन भागार्धेन व्यजाय़त |
४० क
भीष्म उवाच:
नदी च राजन्वत्सेषु कन्या चैवाभवत्तदा ||
४० ख