chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १८८
भीष्म उवाच:
ततस्ते तापसाः सर्वे तपसे धृतनिश्चय़ाम् |
१ क
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा न्यवर्तय़ंस्तात किं कार्यमिति चाव्रुवन् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
तानुवाच ततः कन्या तपोवृद्धानृषींस्तदा |
२ क
भीष्म उवाच:
निराकृतास्मि भीष्मेण भ्रंशिता पतिधर्मतः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
वधार्थं तस्य दीक्षा मे न लोकार्थं तपोधनाः |
३ क
भीष्म उवाच:
निहत्य भीष्मं गच्छेय़ं शान्तिमित्येव निश्चय़ः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
यत्कृते दुःखवसतिमिमां प्राप्तास्मि शाश्वतीम् |
४ क
भीष्म उवाच:
पतिलोकाद्विहीना च नैव स्त्री न पुमानिह ||
४ ख
भीष्म उवाच:
नाहत्वा युधि गाङ्गेय़ं निवर्तेय़ं तपोधनाः |
५ क
भीष्म उवाच:
एष मे हृदि सङ्कल्पो यदर्थमिदमुद्यतम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीभावे परिनिर्विण्णा पुंस्त्वार्थे कृतनिश्चय़ा |
६ क
भीष्म उवाच:
भीष्मे प्रतिचिकीर्षामि नास्मि वार्येति वै पुनः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तां देवो दर्शय़ामास शूलपाणिरुमापतिः |
७ क
भीष्म उवाच:
मध्ये तेषां महर्षीणां स्वेन रूपेण भामिनीम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
छन्द्यमाना वरेणाथ सा वव्रे मत्पराजय़म् |
८ क
भीष्म उवाच:
वधिष्यसीति तां देवः प्रत्युवाच मनस्विनीम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततः सा पुनरेवाथ कन्या रुद्रमुवाच ह |
९ क
भीष्म उवाच:
उपपद्येत्कथं देव स्त्रिय़ो मम जय़ो युधि |
९ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीभावेन च मे गाढं मनः शान्तमुमापते ||
९ ग
भीष्म उवाच:
प्रतिश्रुतश्च भूतेश त्वय़ा भीष्मपराजय़ः |
१० क
भीष्म उवाच:
यथा स सत्यो भवति तथा कुरु वृषध्वज |
१० ख
भीष्म उवाच:
यथा हन्यां समागम्य भीष्मं शान्तनवं युधि ||
१० ग
भीष्म उवाच:
तामुवाच महादेवः कन्यां किल वृषध्वजः |
११ क
भीष्म उवाच:
न मे वागनृतं भद्रे प्राह सत्यं भविष्यति ||
११ ख
भीष्म उवाच:
वधिष्यसि रणे भीष्मं पुरुषत्वं च लप्स्यसे |
१२ क
भीष्म उवाच:
स्मरिष्यसि च तत्सर्वं देहमन्यं गता सती ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
द्रुपदस्य कुले जाता भविष्यसि महारथः |
१३ क
भीष्म उवाच:
शीघ्रास्त्रश्चित्रय़ोधी च भविष्यसि सुसंमतः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यथोक्तमेव कल्याणि सर्वमेतद्भविष्यति |
१४ क
भीष्म उवाच:
भविष्यसि पुमान्पश्चात्कस्माच्चित्कालपर्ययात् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा महातेजाः कपर्दी वृषभध्वजः |
१५ क
भीष्म उवाच:
पश्यतामेव विप्राणां तत्रैवान्तरधीय़त ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ततः सा पश्यतां तेषां महर्षीणामनिन्दिता |
१६ क
भीष्म उवाच:
समाहृत्य वनात्तस्मात्काष्ठानि वरवर्णिनी ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
चितां कृत्वा सुमहतीं प्रदाय़ च हुताशनम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
प्रदीप्तेऽग्नौ महाराज रोषदीप्तेन चेतसा ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
उक्त्वा भीष्मवधाय़ेति प्रविवेश हुताशनम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
ज्येष्ठा काशिसुता राजन्यमुनामभितो नदीम् ||
१८ ख