chevron_left आदि पर्व अध्याय १९
सूत उवाच:
ततो रजन्यां व्युष्टाय़ां प्रभात उदिते रवौ |
१ क
सूत उवाच:
कद्रूश्च विनता चैव भगिन्यौ ते तपोधन ||
१ ख
सूत उवाच:
अमर्षिते सुसंरव्धे दास्ये कृतपणे तदा |
२ क
सूत उवाच:
जग्मतुस्तुरगं द्रष्टुमुच्छैःश्रवसमन्तिकात् ||
२ ख
सूत उवाच:
ददृशाते तदा तत्र समुद्रं निधिमम्भसाम् |
३ क
सूत उवाच:
तिमिङ्गिलझषाकीर्णं मकरैरावृतं तथा ||
३ ख
सूत उवाच:
सत्त्वैश्च वहुसाहस्रैर्नानारूपैः समावृतम् |
४ क
सूत उवाच:
उग्रैर्नित्यमनाधृष्यं कूर्मग्राहसमाकुलम् ||
४ ख
सूत उवाच:
आकरं सर्वरत्नानामालय़ं वरुणस्य च |
५ क
सूत उवाच:
नागानामालय़ं रम्यमुत्तमं सरितां पतिम् ||
५ ख
सूत उवाच:
पातालज्वलनावासमसुराणां च वन्धनम् |
६ क
सूत उवाच:
भय़ङ्करं च सत्त्वानां पय़सां निधिमर्णवम् ||
६ ख
सूत उवाच:
शुभं दिव्यममर्त्यानाममृतस्याकरं परम् |
७ क
सूत उवाच:
अप्रमेय़मचिन्त्यं च सुपुण्यजलमद्भुतम् ||
७ ख
सूत उवाच:
घोरं जलचरारावरौद्रं भैरवनिस्वनम् |
८ क
सूत उवाच:
गम्भीरावर्तकलिलं सर्वभूतभय़ङ्करम् ||
८ ख
सूत उवाच:
वेलादोलानिलचलं क्षोभोद्वेगसमुत्थितम् |
९ क
सूत उवाच:
वीचीहस्तैः प्रचलितैर्नृत्यन्तमिव सर्वशः ||
९ ख
सूत उवाच:
चन्द्रवृद्धिक्षय़वशादुद्वृत्तोर्मिदुरासदम् |
१० क
सूत उवाच:
पाञ्चजन्यस्य जननं रत्नाकरमनुत्तमम् ||
१० ख
सूत उवाच:
गां विन्दता भगवता गोविन्देनामितौजसा |
११ क
सूत उवाच:
वराहरूपिणा चान्तर्विक्षोभितजलाविलम् ||
११ ख
सूत उवाच:
व्रह्मर्षिणा च तपता वर्षाणां शतमत्रिणा |
१२ क
सूत उवाच:
अनासादितगाधं च पातालतलमव्ययम् ||
१२ ख
सूत उवाच:
अध्यात्मय़ोगनिद्रां च पद्मनाभस्य सेवतः |
१३ क
सूत उवाच:
युगादिकालशय़नं विष्णोरमिततेजसः ||
१३ ख
सूत उवाच:
वडवामुखदीप्ताग्नेस्तोय़हव्यप्रदं शुभम् |
१४ क
सूत उवाच:
अगाधपारं विस्तीर्णमप्रमेय़ं सरित्पतिम् ||
१४ ख
सूत उवाच:
महानदीभिर्वह्वीभिः स्पर्धय़ेव सहस्रशः |
१५ क
सूत उवाच:
अभिसार्यमाणमनिशं ददृशाते महार्णवम् ||
१५ ख
सूत उवाच:
गम्भीरं तिमिमकरोग्रसङ्कुलं तं; गर्जन्तं जलचररावरौद्रनादैः |
१६ क
सूत उवाच:
विस्तीर्णं ददृशतुरम्वरप्रकाशं; तेऽगाधं निधिमुरुमम्भसामनन्तम् ||
१६ ख
सूत उवाच:
इत्येवं झषमकरोर्मिसङ्कुलं तं; गम्भीरं विकसितमम्वरप्रकाशम् |
१७ क
सूत उवाच:
पातालज्वलनशिखाविदीपितं तं; पश्यन्त्यौ द्रुतमभिपेततुस्तदानीम् ||
१७ ख