chevron_left वन पर्व अध्याय १९०
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्राह्मणेभ्यो मृगय़न्ती सूनृतानि; तथा व्रह्मन्पुण्यलोकं लभेय़म् ||
७९ ग
वामदेव उवाच:
त्वय़ा त्रातं राजकुलं शुभेक्षणे; वरं वृणीष्वाप्रतिमं ददानि ते |
८० क
वामदेव उवाच:
प्रशाधीमं स्वजनं राजपुत्रि; इक्ष्वाकुराज्यं सुमहच्चाप्यनिन्द्ये ||
८० ख
राजपुत्र्यु उवाच:
वरं वृणे भगवन्नेकमेव; विमुच्यतां किल्विषादद्य भर्ता |
८१ क
राजपुत्र्यु उवाच:
शिवेन चाध्याहि सपुत्रवान्धवं; वरो वृतो ह्येष मय़ा द्विजाग्र्य ||
८१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या; स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर |
८२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः स राजा मुदितो वभूव; वाम्यौ चास्मै सम्प्रददौ प्रणम्य ||
८२ ख