chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १९०
भीष्म उवाच:
चकार यत्नं द्रुपदः सर्वस्मिन्स्वजने महत् |
१ क
भीष्म उवाच:
ततो लेख्यादिषु तथा शिल्पेषु च परं गता |
१ ख
भीष्म उवाच:
इष्वस्त्रे चैव राजेन्द्र द्रोणशिष्यो वभूव ह ||
१ ग
भीष्म उवाच:
तस्य माता महाराज राजानं वरवर्णिनी |
२ क
भीष्म उवाच:
चोदय़ामास भार्यार्थं कन्याय़ाः पुत्रवत्तदा ||
२ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तां पार्षतो दृष्ट्वा कन्यां सम्प्राप्तय़ौवनाम् |
३ क
भीष्म उवाच:
स्त्रिय़ं मत्वा तदा चिन्तां प्रपेदे सह भार्यया ||
३ ख
द्रुपद उवाच:
कन्या ममेय़ं सम्प्राप्ता यौवनं शोकवर्धिनी |
४ क
द्रुपद उवाच:
मय़ा प्रच्छादिता चेय़ं वचनाच्छूलपाणिनः ||
४ ख
द्रुपद उवाच:
न तन्मिथ्या महाराज्ञि भविष्यति कथञ्चन |
५ क
द्रुपद उवाच:
त्रैलोक्यकर्ता कस्माद्धि तन्मृषा कर्तुमर्हति ||
५ ख
भार्यो उवाच:
यदि ते रोचते राजन्वक्ष्यामि शृणु मे वचः |
६ क
भार्यो उवाच:
श्रुत्वेदानीं प्रपद्येथाः स्वकार्यं पृषतात्मज ||
६ ख
भार्यो उवाच:
क्रिय़तामस्य नृपते विधिवद्दारसङ्ग्रहः |
७ क
भार्यो उवाच:
सत्यं भवति तद्वाक्यमिति मे निश्चिता मतिः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तौ निश्चय़ं कृत्वा तस्मिन्कार्येऽथ दम्पती |
८ क
भीष्म उवाच:
वरय़ां चक्रतुः कन्यां दशार्णाधिपतेः सुताम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततो राजा द्रुपदो राजसिंहः; सर्वान्राज्ञः कुलतः संनिशाम्य |
९ क
भीष्म उवाच:
दाशार्णकस्य नृपतेस्तनूजां; शिखण्डिने वरय़ामास दारान् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
हिरण्यवर्मेति नृपो योऽसौ दाशार्णकः स्मृतः |
१० क
भीष्म उवाच:
स च प्रादान्महीपालः कन्यां तस्मै शिखण्डिने ||
१० ख
भीष्म उवाच:
स च राजा दशार्णेषु महानासीन्महीपतिः |
११ क
भीष्म उवाच:
हिरण्यवर्मा दुर्धर्षो महासेनो महामनाः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
कृते विवाहे तु तदा सा कन्या राजसत्तम |
१२ क
भीष्म उवाच:
यौवनं समनुप्राप्ता सा च कन्या शिखण्डिनी ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
कृतदारः शिखण्डी तु काम्पिल्यं पुनरागमत् |
१३ क
भीष्म उवाच:
न च सा वेद तां कन्यां कञ्चित्कालं स्त्रिय़ं किल ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
हिरण्यवर्मणः कन्या ज्ञात्वा तां तु शिखण्डिनीम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
धात्रीणां च सखीनां च व्रीडमाना न्यवेदय़त् |
१४ ख
भीष्म उवाच:
कन्यां पञ्चालराजस्य सुतां तां वै शिखण्डिनीम् ||
१४ ग
भीष्म उवाच:
ततस्ता राजशार्दूल धात्र्यो दाशार्णिकास्तदा |
१५ क
भीष्म उवाच:
जग्मुरार्तिं परां दुःखात्प्रेषय़ामासुरेव च ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ततो दशार्णाधिपतेः प्रेष्याः सर्वं न्यवेदय़न् |
१६ क
भीष्म उवाच:
विप्रलम्भं यथावृत्तं स च चुक्रोध पार्थिवः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
शिखण्ड्यपि महाराज पुंवद्राजकुले तदा |
१७ क
भीष्म उवाच:
विजहार मुदा युक्तः स्त्रीत्वं नैवातिरोचय़न् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
ततः कतिपय़ाहस्य तच्छ्रुत्वा भरतर्षभ |
१८ क
भीष्म उवाच:
हिरण्यवर्मा राजेन्द्र रोषादार्तिं जगाम ह ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततो दाशार्णको राजा तीव्रकोपसमन्वितः |
१९ क
भीष्म उवाच:
दूतं प्रस्थापय़ामास द्रुपदस्य निवेशने ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ततो द्रुपदमासाद्य दूतः काञ्चनवर्मणः |
२० क
भीष्म उवाच:
एक एकान्तमुत्सार्य रहो वचनमव्रवीत् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
दशार्णराजो राजंस्त्वामिदं वचनमव्रवीत् |
२१ क
भीष्म उवाच:
अभिषङ्गात्प्रकुपितो विप्रलव्धस्त्वय़ानघ ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
अवमन्यसे मां नृपते नूनं दुर्मन्त्रितं तव |
२२ क
भीष्म उवाच:
यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे मोहाद्याचितवानसि ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
तस्याद्य विप्रलम्भस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते |
२३ क
भीष्म उवाच:
एष त्वां सजनामात्यमुद्धरामि स्थिरो भव ||
२३ ख