chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १९१
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्य दूतेन द्रुपदस्य तदा नृप |
१ क
भीष्म उवाच:
चोरस्येव गृहीतस्य न प्रावर्तत भारती ||
१ ख
भीष्म उवाच:
स यत्नमकरोत्तीव्रं सम्वन्धैरनुसान्त्वनैः |
२ क
भीष्म उवाच:
दूतैर्मधुरसम्भाषैर्नैतदस्तीति सन्दिशन् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
स राजा भूय़ एवाथ कृत्वा तत्त्वत आगमम् |
३ क
भीष्म उवाच:
कन्येति पाञ्चालसुतां त्वरमाणोऽभिनिर्ययौ ||
३ ख
भीष्म उवाच:
ततः सम्प्रेषय़ामास मित्राणाममितौजसाम् |
४ क
भीष्म उवाच:
दुहितुर्विप्रलम्भं तं धात्रीणां वचनात्तदा ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततः समुदय़ं कृत्वा वलानां राजसत्तमः |
५ क
भीष्म उवाच:
अभिय़ाने मतिं चक्रे द्रुपदं प्रति भारत ||
५ ख
भीष्म उवाच:
ततः संमन्त्रय़ामास मित्रैः सह महीपतिः |
६ क
भीष्म उवाच:
हिरण्यवर्मा राजेन्द्र पाञ्चाल्यं पार्थिवं प्रति ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तत्र वै निश्चितं तेषामभूद्राज्ञां महात्मनाम् |
७ क
भीष्म उवाच:
तथ्यं चेद्भवति ह्येतत्कन्या राजञ्शिखण्डिनी |
७ ख
भीष्म उवाच:
वद्ध्वा पाञ्चालराजानमानय़िष्यामहे गृहान् ||
७ ग
भीष्म उवाच:
अन्यं राजानमाधाय़ पाञ्चालेषु नरेश्वरम् |
८ क
भीष्म उवाच:
घातय़िष्याम नृपतिं द्रुपदं सशिखण्डिनम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स तदा दूतमाज्ञाय़ पुनः क्षत्तारमीश्वरः |
९ क
भीष्म उवाच:
प्रास्थापय़त्पार्षताय़ हन्मीति त्वां स्थिरो भव ||
९ ख
भीष्म उवाच:
स प्रकृत्या च वै भीरुः किल्विषी च नराधिपः |
१० क
भीष्म उवाच:
भय़ं तीव्रमनुप्राप्तो द्रुपदः पृथिवीपतिः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
विसृज्य दूतं दाशार्णं द्रुपदः शोककर्शितः |
११ क
भीष्म उवाच:
समेत्य भार्यां रहिते वाक्यमाह नराधिपः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
भय़ेन महताविष्टो हृदि शोकेन चाहतः |
१२ क
भीष्म उवाच:
पाञ्चालराजो दय़ितां मातरं वै शिखण्डिनः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अभिय़ास्यति मां कोपात्सम्वन्धी सुमहावलः |
१३ क
भीष्म उवाच:
हिरण्यवर्मा नृपतिः कर्षमाणो वरूथिनीम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
किमिदानीं करिष्यामि मूढः कन्यामिमां प्रति |
१४ क
भीष्म उवाच:
शिखण्डी किल पुत्रस्ते कन्येति परिशङ्कितः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
इति निश्चित्य तत्त्वेन समित्रः सवलानुगः |
१५ क
भीष्म उवाच:
वञ्चितोऽस्मीति मन्वानो मां किलोद्धर्तुमिच्छति ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
किमत्र तथ्यं सुश्रोणि किं मिथ्या व्रूहि शोभने |
१६ क
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा त्वत्तः शुभे वाक्यं संविधास्याम्यहं तथा ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अहं हि संशय़ं प्राप्तो वाला चेय़ं शिखण्डिनी |
१७ क
भीष्म उवाच:
त्वं च राज्ञि महत्कृच्छ्रं सम्प्राप्ता वरवर्णिनि ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
सा त्वं सर्वविमोक्षाय़ तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः |
१८ क
भीष्म उवाच:
तथा विदध्यां सुश्रोणि कृत्यस्यास्य शुचिस्मिते |
१८ ख
भीष्म उवाच:
शिखण्डिनि च मा भैस्त्वं विधास्ये तत्र तत्त्वतः ||
१८ ग
भीष्म उवाच:
क्रिय़याहं वरारोहे वञ्चितः पुत्रधर्मतः |
१९ क
भीष्म उवाच:
मय़ा दाशार्णको राजा वञ्चितश्च महीपतिः |
१९ ख
भीष्म उवाच:
तदाचक्ष्व महाभागे विधास्ये तत्र यद्धितम् ||
१९ ग
भीष्म उवाच:
जानतापि नरेन्द्रेण ख्यापनार्थं परस्य वै |
२० क
भीष्म उवाच:
प्रकाशं चोदिता देवी प्रत्युवाच महीपतिम् ||
२० ख