chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १९२
भीष्म उवाच:
ततः शिखण्डिनो माता यथातत्त्वं नराधिप |
१ क
भीष्म उवाच:
आचचक्षे महावाहो भर्त्रे कन्यां शिखण्डिनीम् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अपुत्रय़ा मय़ा राजन्सपत्नीनां भय़ादिदम् |
२ क
भीष्म उवाच:
कन्या शिखण्डिनी जाता पुरुषो वै निवेदितः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
त्वय़ा चैव नरश्रेष्ठ तन्मे प्रीत्यानुमोदितम् |
३ क
भीष्म उवाच:
पुत्रकर्म कृतं चैव कन्याय़ाः पार्थिवर्षभ |
३ ख
भीष्म उवाच:
भार्या चोढा त्वय़ा राजन्दशार्णाधिपतेः सुता ||
३ ग
भीष्म उवाच:
त्वय़ा च प्रागभिहितं देववाक्यार्थदर्शनात् |
४ क
भीष्म उवाच:
कन्या भूत्वा पुमान्भावीत्येवं चैतदुपेक्षितम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
एतच्छ्रुत्वा द्रुपदो यज्ञसेनः; सर्वं तत्त्वं मन्त्रविद्भ्यो निवेद्य |
५ क
भीष्म उवाच:
मन्त्रं राजा मन्त्रय़ामास राज; न्यद्यद्युक्तं रक्षणे वै प्रजानाम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
सम्वन्धकं चैव समर्थ्य तस्मि; न्दाशार्णके वै नृपतौ नरेन्द्र |
६ क
भीष्म उवाच:
स्वय़ं कृत्वा विप्रलम्भं यथाव; न्मन्त्रैकाग्रो निश्चय़ं वै जगाम ||
६ ख
भीष्म उवाच:
स्वभावगुप्तं नगरमापत्काले तु भारत |
७ क
भीष्म उवाच:
गोपय़ामास राजेन्द्र सर्वतः समलङ्कृतम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
आर्तिं च परमां राजा जगाम सह भार्यया |
८ क
भीष्म उवाच:
दशार्णपतिना सार्धं विरोधे भरतर्षभ ||
८ ख
भीष्म उवाच:
कथं सम्वन्धिना सार्धं न मे स्याद्विग्रहो महान् |
९ क
भीष्म उवाच:
इति सञ्चिन्त्य मनसा दैवतान्यर्चय़त्तदा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
तं तु दृष्ट्वा तदा राजन्देवी देवपरं तथा |
१० क
भीष्म उवाच:
अर्चां प्रय़ुञ्जानमथो भार्या वचनमव्रवीत् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
देवानां प्रतिपत्तिश्च सत्या साधुमता सदा |
११ क
भीष्म उवाच:
सा तु दुःखार्णवं प्राप्य नः स्यादर्चय़तां भृशम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
दैवतानि च सर्वाणि पूज्यन्तां भूरिदक्षिणैः |
१२ क
भीष्म उवाच:
अग्नय़श्चापि हूय़न्तां दाशार्णप्रतिषेधने ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अय़ुद्धेन निवृत्तिं च मनसा चिन्तय़ाभिभो |
१३ क
भीष्म उवाच:
देवतानां प्रसादेन सर्वमेतद्भविष्यति ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
मन्त्रिभिर्मन्त्रितं सार्धं त्वय़ा यत्पृथुलोचन |
१४ क
भीष्म उवाच:
पुरस्यास्याविनाशाय़ तच्च राजंस्तथा कुरु ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
दैवं हि मानुषोपेतं भृशं सिध्यति पार्थिव |
१५ क
भीष्म उवाच:
परस्परविरोधात्तु नानय़ोः सिद्धिरस्ति वै ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
तस्माद्विधाय़ नगरे विधानं सचिवैः सह |
१६ क
भीष्म उवाच:
अर्चय़स्व यथाकामं दैवतानि विशां पते ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
एवं सम्भाषमाणौ तौ दृष्ट्वा शोकपराय़णौ |
१७ क
भीष्म उवाच:
शिखण्डिनी तदा कन्या व्रीडितेव मनस्विनी ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
ततः सा चिन्तय़ामास मत्कृते दुःखितावुभौ |
१८ क
भीष्म उवाच:
इमाविति ततश्चक्रे मतिं प्राणविनाशने ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
एवं सा निश्चय़ं कृत्वा भृशं शोकपराय़णा |
१९ क
भीष्म उवाच:
जगाम भवनं त्यक्त्वा गहनं निर्जनं वनम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
यक्षेणर्द्धिमता राजन्स्थूणाकर्णेन पालितम् |
२० क
भीष्म उवाच:
तद्भय़ादेव च जनो विसर्जय़ति तद्वनम् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
तत्र स्थूणस्य भवनं सुधामृत्तिकलेपनम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
लाजोल्लापिकधूमाढ्यमुच्चप्राकारतोरणम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
तत्प्रविश्य शिखण्डी सा द्रुपदस्यात्मजा नृप |
२२ क
भीष्म उवाच:
अनश्नती वहुतिथं शरीरमुपशोषय़त् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
दर्शय़ामास तां यक्षः स्थूणो मध्वक्षसंय़ुतः |
२३ क
भीष्म उवाच:
किमर्थोऽय़ं तवारम्भः करिष्ये व्रूहि माचिरम् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अशक्यमिति सा यक्षं पुनः पुनरुवाच ह |
२४ क
भीष्म उवाच:
करिष्यामीति चैनां स प्रत्युवाचाथ गुह्यकः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
धनेश्वरस्यानुचरो वरदोऽस्मि नृपात्मजे |
२५ क
भीष्म उवाच:
अदेय़मपि दास्यामि व्रूहि यत्ते विवक्षितम् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
ततः शिखण्डी तत्सर्वमखिलेन न्यवेदय़त् |
२६ क
भीष्म उवाच:
तस्मै यक्षप्रधानाय़ स्थूणाकर्णाय़ भारत ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
आपन्नो मे पिता यक्ष नचिराद्विनशिष्यति |
२७ क
भीष्म उवाच:
अभिय़ास्यति सङ्क्रुद्धो दशार्णाधिपतिर्हि तम् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
महावलो महोत्साहः स हेमकवचो नृपः |
२८ क
भीष्म उवाच:
तस्माद्रक्षस्व मां यक्ष पितरं मातरं च मे ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिज्ञातो हि भवता दुःखप्रतिनय़ो मम |
२९ क
भीष्म उवाच:
भवेय़ं पुरुषो यक्ष त्वत्प्रसादादनिन्दितः ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
यावदेव स राजा वै नोपय़ाति पुरं मम |
३० क
भीष्म उवाच:
तावदेव महाय़क्ष प्रसादं कुरु गुह्यक ||
३० ख