भीष्म उवाच:
प्रय़यौ सह तैः सर्वैर्निमेषान्तरचारिभिः ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
स्थूणस्तु शापं सम्प्राप्य तत्रैव न्यवसत्तदा |
४८ क
भीष्म उवाच:
समय़े चागमत्तं वै शिखण्डी स क्षपाचरम् ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
सोऽभिगम्याव्रवीद्वाक्यं प्राप्तोऽस्मि भगवन्निति |
४९ क
भीष्म उवाच:
तमव्रवीत्ततः स्थूणः प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
आर्जवेनागतं दृष्ट्वा राजपुत्रं शिखण्डिनम् |
५० क
भीष्म उवाच:
सर्वमेव यथावृत्तमाचचक्षे शिखण्डिने ||
५० ख
यक्ष उवाच:
शप्तो वैश्रवणेनास्मि त्वत्कृते पार्थिवात्मज |
५१ क
यक्ष उवाच:
गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान्यथासुखम् ||
५१ ख
यक्ष उवाच:
दिष्टमेतत्पुरा मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् |
५२ क
यक्ष उवाच:
गमनं तव चेतो हि पौलस्त्यस्य च दर्शनम् ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तः शिखण्डी तु स्थूणय़क्षेण भारत |
५३ क
भीष्म उवाच:
प्रत्याजगाम नगरं हर्षेण महतान्वितः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
पूजय़ामास विविधैर्गन्धमाल्यैर्महाधनैः |
५४ क
भीष्म उवाच:
द्विजातीन्देवताश्चापि चैत्यानथ चतुष्पथान् ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
द्रुपदः सह पुत्रेण सिद्धार्थेन शिखण्डिना |
५५ क
भीष्म उवाच:
मुदं च परमां लेभे पाञ्चाल्यः सह वान्धवैः ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
शिष्यार्थं प्रददौ चापि द्रोणाय़ कुरुपुङ्गव |
५६ क
भीष्म उवाच:
शिखण्डिनं महाराज पुत्रं स्त्रीपूर्विणं तथा ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिपेदे चतुष्पादं धनुर्वेदं नृपात्मजः |
५७ क
भीष्म उवाच:
शिखण्डी सह युष्माभिर्धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
मम त्वेतच्चरास्तात यथावत्प्रत्यवेदय़न् |
५८ क
भीष्म उवाच:
जडान्धवधिराकारा ये युक्ता द्रुपदे मय़ा ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
एवमेष महाराज स्त्रीपुमान्द्रुपदात्मजः |
५९ क
भीष्म उवाच:
सम्भूतः कौरवश्रेष्ठ शिखण्डी रथसत्तमः ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
ज्येष्ठा काशिपतेः कन्या अम्वा नामेति विश्रुता |
६० क
भीष्म उवाच:
द्रुपदस्य कुले जाता शिखण्डी भरतर्षभ ||
६० ख
भीष्म उवाच:
नाहमेनं धनुष्पाणिं युय़ुत्सुं समुपस्थितम् |
६१ क
भीष्म उवाच:
मुहूर्तमपि पश्येय़ं प्रहरेय़ं न चाप्युत ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
व्रतमेतन्मम सदा पृथिव्यामपि विश्रुतम् |
६२ क
भीष्म उवाच:
स्त्रिय़ां स्त्रीपूर्वके चापि स्त्रीनाम्नि स्त्रीस्वरूपिणि ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
न मुञ्चेय़महं वाणानिति कौरवनन्दन |
६३ क
भीष्म उवाच:
न हन्यामहमेतेन कारणेन शिखण्डिनम् ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
एतत्तत्त्वमहं वेद जन्म तात शिखण्डिनः |
६४ क
भीष्म उवाच:
ततो नैनं हनिष्यामि समरेष्वातताय़िनम् ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
यदि भीष्मः स्त्रिय़ं हन्याद्धन्यादात्मानमप्युत |
६५ क
भीष्म उवाच:
नैनं तस्माद्धनिष्यामि दृष्ट्वापि समरे स्थितम् ||
६५ ख
सञ्जय़ उवाच:
एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यो राजा दुर्योधनस्तदा |
६६ क
सञ्जय़ उवाच:
मुहूर्तमिव स ध्यात्वा भीष्मे युक्तममन्यत ||
६६ ख