chevron_left उद्योग पर्व अध्याय १९३
भीष्म उवाच:
शिखण्डिवाक्यं श्रुत्वाथ स यक्षो भरतर्षभ |
१ क
भीष्म उवाच:
प्रोवाच मनसा चिन्त्य दैवेनोपनिपीडितः |
१ ख
भीष्म उवाच:
भवितव्यं तथा तद्धि मम दुःखाय़ कौरव ||
१ ग
भीष्म उवाच:
भद्रे कामं करिष्यामि समय़ं तु निवोध मे |
२ क
भीष्म उवाच:
किञ्चित्कालान्तरं दास्ये पुंलिङ्गं स्वमिदं तव |
२ ख
भीष्म उवाच:
आगन्तव्यं त्वय़ा काले सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२ ग
भीष्म उवाच:
प्रभुः सङ्कल्पसिद्धोऽस्मि कामरूपी विहङ्गमः |
३ क
भीष्म उवाच:
मत्प्रसादात्पुरं चैव त्राहि वन्धूंश्च केवलान् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीलिङ्गं धारय़िष्यामि त्वदीय़ं पार्थिवात्मजे |
४ क
भीष्म उवाच:
सत्यं मे प्रतिजानीहि करिष्यामि प्रिय़ं तव ||
४ ख
शिखण्ड्यु उवाच:
प्रतिदास्यामि भगवँल्लिङ्गं पुनरिदं तव |
५ क
शिखण्ड्यु उवाच:
किञ्चित्कालान्तरं स्त्रीत्वं धारय़स्व निशाचर ||
५ ख
शिखण्ड्यु उवाच:
प्रतिप्रय़ाते दाशार्णे पार्थिवे हेमवर्मणि |
६ क
शिखण्ड्यु उवाच:
कन्यैवाहं भविष्यामि पुरुषस्त्वं भविष्यसि ||
६ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्त्वा समय़ं तत्र चक्राते तावुभौ नृप |
७ क
भीष्म उवाच:
अन्योन्यस्यानभिद्रोहे तौ सङ्क्रामय़तां ततः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीलिङ्गं धारय़ामास स्थूणो यक्षो नराधिप |
८ क
भीष्म उवाच:
यक्षरूपं च तद्दीप्तं शिखण्डी प्रत्यपद्यत ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ततः शिखण्डी पाञ्चाल्यः पुंस्त्वमासाद्य पार्थिव |
९ क
भीष्म उवाच:
विवेश नगरं हृष्टः पितरं च समासदत् |
९ ख
भीष्म उवाच:
यथावृत्तं तु तत्सर्वमाचख्यौ द्रुपदस्य च ||
९ ग
भीष्म उवाच:
द्रुपदस्तस्य तच्छ्रुत्वा हर्षमाहारय़त्परम् |
१० क
भीष्म उवाच:
सभार्यस्तच्च सस्मार महेश्वरवचस्तदा ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ततः सम्प्रेषय़ामास दशार्णाधिपतेर्नृप |
११ क
भीष्म उवाच:
पुरुषोऽय़ं मम सुतः श्रद्धत्तां मे भवानिति ||
११ ख
भीष्म उवाच:
अथ दाशार्णको राजा सहसाभ्यागमत्तदा |
१२ क
भीष्म उवाच:
पाञ्चालराजं द्रुपदं दुःखामर्षसमन्वितः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ततः काम्पिल्यमासाद्य दशार्णाधिपतिस्तदा |
१३ क
भीष्म उवाच:
प्रेषय़ामास सत्कृत्य दूतं व्रह्मविदां वरम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
व्रूहि मद्वचनाद्दूत पाञ्चाल्यं तं नृपाधमम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
यद्वै कन्यां स्वकन्यार्थे वृतवानसि दुर्मते |
१४ ख
भीष्म उवाच:
फलं तस्यावलेपस्य द्रक्ष्यस्यद्य न संशय़ः ||
१४ ग
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्तु तेनासौ व्राह्मणो राजसत्तम |
१५ क
भीष्म उवाच:
दूतः प्रय़ातो नगरं दाशार्णनृपचोदितः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
तत आसादय़ामास पुरोधा द्रुपदं पुरे |
१६ क
भीष्म उवाच:
तस्मै पाञ्चालको राजा गामर्घ्यं च सुसत्कृतम् |
१६ ख
भीष्म उवाच:
प्रापय़ामास राजेन्द्र सह तेन शिखण्डिना ||
१६ ग
भीष्म उवाच:
तां पूजां नाभ्यनन्दत्स वाक्यं चेदमुवाच ह |
१७ क
भीष्म उवाच:
यदुक्तं तेन वीरेण राज्ञा काञ्चनवर्मणा ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
यत्तेऽहमधमाचार दुहित्रर्थेऽस्मि वञ्चितः |
१८ क
भीष्म उवाच:
तस्य पापस्य करणात्फलं प्राप्नुहि दुर्मते ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
देहि युद्धं नरपते ममाद्य रणमूर्धनि |
१९ क
भीष्म उवाच:
उद्धरिष्यामि ते सद्यः सामात्यसुतवान्धवम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
तदुपालम्भसंय़ुक्तं श्रावितः किल पार्थिवः |
२० क
भीष्म उवाच:
दशार्णपतिदूतेन मन्त्रिमध्ये पुरोधसा ||
२० ख
भीष्म उवाच:
अव्रवीद्भरतश्रेष्ठ द्रुपदः प्रणय़ानतः |
२१ क
भीष्म उवाच:
यदाह मां भवान्व्रह्मन्सम्वन्धिवचनाद्वचः |
२१ ख
भीष्म उवाच:
तस्योत्तरं प्रतिवचो दूत एव वदिष्यति ||
२१ ग
भीष्म उवाच:
ततः सम्प्रेषय़ामास द्रुपदोऽपि महात्मने |
२२ क
भीष्म उवाच:
हिरण्यवर्मणे दूतं व्राह्मणं वेदपारगम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
समागम्य तु राज्ञा स दशार्णपतिना तदा |
२३ क
भीष्म उवाच:
तद्वाक्यमाददे राजन्यदुक्तं द्रुपदेन ह ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
आगमः क्रिय़तां व्यक्तं कुमारो वै सुतो मम |
२४ क
भीष्म उवाच:
मिथ्यैतदुक्तं केनापि तन्न श्रद्धेय़मित्युत ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
ततः स राजा द्रुपदस्य श्रुत्वा; विमर्शय़ुक्तो युवतीर्वरिष्ठाः |
२५ क
भीष्म उवाच:
सम्प्रेषय़ामास सुचारुरूपाः; शिखण्डिनं स्त्री पुमान्वेति वेत्तुम् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
ताः प्रेषितास्तत्त्वभावं विदित्वा; प्रीत्या राज्ञे तच्छशंसुर्हि सर्वम् |
२६ क
भीष्म उवाच:
शिखण्डिनं पुरुषं कौरवेन्द्र; दशार्णराजाय़ महानुभावम् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ततः कृत्वा तु राजा स आगमं प्रीतिमानथ |
२७ क
भीष्म उवाच:
सम्वन्धिना समागम्य हृष्टो वासमुवास ह ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
शिखण्डिने च मुदितः प्रादाद्वित्तं जनेश्वरः |
२८ क
भीष्म उवाच:
हस्तिनोऽश्वांश्च गाश्चैव दास्यो वहुशतास्तथा |
२८ ख
भीष्म उवाच:
पूजितश्च प्रतिय़यौ निवर्त्य तनय़ां किल ||
२८ ग
भीष्म उवाच:
विनीतकिल्विषे प्रीते हेमवर्मणि पार्थिवे |
२९ क
भीष्म उवाच:
प्रतिय़ाते तु दाशार्णे हृष्टरूपा शिखण्डिनी ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
कस्यचित्त्वथ कालस्य कुवेरो नरवाहनः |
३० क
भीष्म उवाच:
लोकानुय़ात्रां कुर्वाणः स्थूणस्यागान्निवेशनम् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
स तद्गृहस्योपरि वर्तमान; आलोकय़ामास धनाधिगोप्ता |
३१ क
भीष्म उवाच:
स्थूणस्य यक्षस्य निशाम्य वेश्म; स्वलङ्कृतं माल्यगुणैर्विचित्रम् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
लाजैश्च गन्धैश्च तथा वितानै; रभ्यर्चितं धूपनधूपितं च |
३२ क
भीष्म उवाच:
ध्वजैः पताकाभिरलङ्कृतं च; भक्ष्यान्नपेय़ामिषदत्तहोमम् ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
तत्स्थानं तस्य दृष्ट्वा तु सर्वतः समलङ्कृतम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
अथाव्रवीद्यक्षपतिस्तान्यक्षाननुगांस्तदा ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
स्वलङ्कृतमिदं वेश्म स्थूणस्यामितविक्रमाः |
३४ क
भीष्म उवाच:
नोपसर्पति मां चापि कस्मादद्य सुमन्दधीः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
यस्माज्जानन्सुमन्दात्मा मामसौ नोपसर्पति |
३५ क
भीष्म उवाच:
तस्मात्तस्मै महादण्डो धार्यः स्यादिति मे मतिः ||
३५ ख
यक्षा ऊचुः:
द्रुपदस्य सुता राजन्राज्ञो जाता शिखण्डिनी |
३६ क
यक्षा ऊचुः:
तस्यै निमित्ते कस्मिंश्चित्प्रादात्पुरुषलक्षणम् ||
३६ ख
यक्षा ऊचुः:
अग्रहील्लक्षणं स्त्रीणां स्त्रीभूतस्तिष्ठते गृहे |
३७ क
यक्षा ऊचुः:
नोपसर्पति तेनासौ सव्रीडः स्त्रीस्वरूपवान् ||
३७ ख
यक्षा ऊचुः:
एतस्मात्कारणाद्राजन्स्थूणो न त्वाद्य पश्यति |
३८ क
यक्षा ऊचुः:
श्रुत्वा कुरु यथान्याय़ं विमानमिह तिष्ठताम् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
आनीय़तां स्थूण इति ततो यक्षाधिपोऽव्रवीत् |
३९ क
भीष्म उवाच:
कर्तास्मि निग्रहं तस्येत्युवाच स पुनः पुनः ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
सोऽभ्यगच्छत यक्षेन्द्रमाहूतः पृथिवीपते |
४० क
भीष्म उवाच:
स्त्रीस्वरूपो महाराज तस्थौ व्रीडासमन्वितः ||
४० ख
भीष्म उवाच:
तं शशाप सुसङ्क्रुद्धो धनदः कुरुनन्दन |
४१ क
भीष्म उवाच:
एवमेव भवत्वस्य स्त्रीत्वं पापस्य गुह्यकाः ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽव्रवीद्यक्षपतिर्महात्मा; यस्माददास्त्ववमन्येह यक्षान् |
४२ क
भीष्म उवाच:
शिखण्डिने लक्षणं पापवुद्धे; स्त्रीलक्षणं चाग्रहीः पापकर्मन् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
अप्रवृत्तं सुदुर्वुद्धे यस्मादेतत्कृतं त्वय़ा |
४३ क
भीष्म उवाच:
तस्मादद्य प्रभृत्येव त्वं स्त्री स पुरुषस्तथा ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रसादय़ामासुर्यक्षा वैश्रवणं किल |
४४ क
भीष्म उवाच:
स्थूणस्यार्थे कुरुष्वान्तं शापस्येति पुनः पुनः ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
ततो महात्मा यक्षेन्द्रः प्रत्युवाचानुगामिनः |
४५ क
भीष्म उवाच:
सर्वान्यक्षगणांस्तात शापस्यान्तचिकीर्षय़ा ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
हते शिखण्डिनि रणे स्वरूपं प्रतिपत्स्यते |
४६ क
भीष्म उवाच:
स्थूणो यक्षो निरुद्वेगो भवत्विति महामनाः ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्त्वा भगवान्देवो यक्षराक्षसपूजितः |
४७ क