कर्ण उवाच:
दुर्योधन तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः |
१ क
कर्ण उवाच:
न ह्युपाय़ेन ते शक्याः पाण्डवाः कुरुनन्दन ||
१ ख
कर्ण उवाच:
पूर्वमेव हि ते सूक्ष्मैरुपाय़ैर्यतितास्त्वय़ा |
२ क
कर्ण उवाच:
निग्रहीतुं यदा वीर शकिता न तदा त्वय़ा ||
२ ख
कर्ण उवाच:
इहैव वर्तमानास्ते समीपे तव पार्थिव |
३ क
कर्ण उवाच:
अजातपक्षाः शिशवः शकिता नैव वाधितुम् ||
३ ख
कर्ण उवाच:
जातपक्षा विदेशस्था विवृद्धाः सर्वशोऽद्य ते |
४ क
कर्ण उवाच:
नोपाय़साध्याः कौन्तेय़ा ममैषा मतिरच्युत ||
४ ख
कर्ण उवाच:
न च ते व्यसनैर्योक्तुं शक्या दिष्टकृता हि ते |
५ क
कर्ण उवाच:
शङ्किताश्चेप्सवश्चैव पितृपैतामहं पदम् ||
५ ख
कर्ण उवाच:
परस्परेण भेदश्च नाधातुं तेषु शक्यते |
६ क
कर्ण उवाच:
एकस्यां ये रताः पत्न्यां न भिद्यन्ते परस्परम् ||
६ ख
कर्ण उवाच:
न चापि कृष्णा शक्येत तेभ्यो भेदय़ितुं परैः |
७ क
कर्ण उवाच:
परिद्यूनान्वृतवती किमुताद्य मृजावतः ||
७ ख
कर्ण उवाच:
ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या वहुभर्तृता |
८ क
कर्ण उवाच:
तं च प्राप्तवती कृष्णा न सा भेदय़ितुं सुखम् ||
८ ख
कर्ण उवाच:
आर्यवृत्तश्च पाञ्चाल्यो न स राजा धनप्रिय़ः |
९ क
कर्ण उवाच:
न सन्त्यक्ष्यति कौन्तेय़ान्राज्यदानैरपि ध्रुवम् ||
९ ख
कर्ण उवाच:
तथास्य पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान् |
१० क
कर्ण उवाच:
तस्मान्नोपाय़साध्यांस्तानहं मन्ये कथञ्चन ||
१० ख
कर्ण उवाच:
इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ |
११ क
कर्ण उवाच:
यावन्न कृतमूलास्ते पाण्डवेय़ा विशां पते |
११ ख
कर्ण उवाच:
तावत्प्रहरणीय़ास्ते रोचतां तव विक्रमः ||
११ ग
कर्ण उवाच:
अस्मत्पक्षो महान्यावद्यावत्पाञ्चालको लघुः |
१२ क
कर्ण उवाच:
तावत्प्रहरणं तेषां क्रिय़तां मा विचारय़ ||
१२ ख
कर्ण उवाच:
वाहनानि प्रभूतानि मित्राणि वहुलानि च |
१३ क
कर्ण उवाच:
यावन्न तेषां गान्धारे तावदेवाशु विक्रम ||
१३ ख
कर्ण उवाच:
यावच्च राजा पाञ्चाल्यो नोद्यमे कुरुते मनः |
१४ क
कर्ण उवाच:
सह पुत्रैर्महावीर्यैस्तावदेवाशु विक्रम ||
१४ ख
कर्ण उवाच:
यावन्नाय़ाति वार्ष्णेय़ः कर्षन्यादववाहिनीम् |
१५ क
कर्ण उवाच:
राज्यार्थे पाण्डवेय़ानां तावदेवाशु विक्रम ||
१५ ख
कर्ण उवाच:
वसूनि विविधान्भोगान्राज्यमेव च केवलम् |
१६ क
कर्ण उवाच:
नात्याज्यमस्ति कृष्णस्य पाण्डवार्थे महीपते ||
१६ ख
कर्ण उवाच:
विक्रमेण मही प्राप्ता भरतेन महात्मना |
१७ क
कर्ण उवाच:
विक्रमेण च लोकांस्त्रीञ्जितवान्पाकशासनः ||
१७ ख
कर्ण उवाच:
विक्रमं च प्रशंसन्ति क्षत्रिय़स्य विशां पते |
१८ क
कर्ण उवाच:
स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ ||
१८ ख
कर्ण उवाच:
ते वलेन वय़ं राजन्महता चतुरङ्गिणा |
१९ क
कर्ण उवाच:
प्रमथ्य द्रुपदं शीघ्रमानय़ामेह पाण्डवान् ||
१९ ख
कर्ण उवाच:
न हि साम्ना न दानेन न भेदेन च पाण्डवाः |
२० क
कर्ण उवाच:
शक्याः साधय़ितुं तस्माद्विक्रमेणैव ताञ्जहि ||
२० ख
कर्ण उवाच:
तान्विक्रमेण जित्वेमामखिलां भुङ्क्ष्व मेदिनीम् |
२१ क
कर्ण उवाच:
नान्यमत्र प्रपश्यामि कार्योपाय़ं जनाधिप ||
२१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
श्रुत्वा तु राधेय़वचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् |
२२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमव्रवीत् ||
२२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
उपपन्नं महाप्राज्ञे कृतास्त्रे सूतनन्दने |
२३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
त्वय़ि विक्रमसम्पन्नमिदं वचनमीदृशम् ||
२३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
भूय़ एव तु भीष्मश्च द्रोणो विदुर एव च |
२४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
युवां च कुरुतां वुद्धिं भवेद्या नः सुखोदय़ा ||
२४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तत आनाय़्य तान्सर्वान्मन्त्रिणः सुमहाय़शाः |
२५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धृतराष्ट्रो महाराज मन्त्रय़ामास वै तदा ||
२५ ख