मार्कण्डेय़ उवाच:
स एवमुक्तो राजर्षिरुत्तङ्केनापराजितः |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्तङ्कं कौरवश्रेष्ठ कृताञ्जलिरथाव्रवीत् ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न तेऽभिगमनं व्रह्मन्मोघमेतद्भविष्यति |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुत्रो ममाय़ं भगवन्कुवलाश्व इति स्मृतः ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
धृतिमान्क्षिप्रकारी च वीर्येणाप्रतिमो भुवि |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रिय़ं वै सर्वमेतत्ते करिष्यति न संशय़ः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुत्रैः परिवृतः सर्वैः शूरैः परिघवाहुभिः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विसर्जय़स्व मां व्रह्मन्न्यस्तशस्त्रोऽस्मि साम्प्रतम् ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथास्त्विति च तेनोक्तो मुनिनामिततेजसा |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तमादिश्य तनय़मुत्तङ्काय़ महात्मने |
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्रिय़तामिति राजर्षिर्जगाम वनमुत्तमम् ||
५ ग
युधिष्ठिर उवाच:
क एष भगवन्दैत्यो महावीर्यस्तपोधन |
६ क
युधिष्ठिर उवाच:
कस्य पुत्रोऽथ नप्ता वा एतदिच्छामि वेदितुम् ||
६ ख
युधिष्ठिर उवाच:
एवं महावलो दैत्यो न श्रुतो मे तपोधन |
७ क
युधिष्ठिर उवाच:
एतदिच्छामि भगवन्याथातथ्येन वेदितुम् |
७ ख
युधिष्ठिर उवाच:
सर्वमेव महाप्राज्ञ विस्तरेण तपोधन ||
७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
एकार्णवे तदा घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे |
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रनष्टेषु च भूतेषु सर्वेषु भरतर्षभ ||
८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रभवः सर्वभूतानां शाश्वतः पुरुषोऽव्ययः |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुष्वाप भगवान्विष्णुरप्शय़्यामेक एव ह |
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ||
९ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोककर्ता महाभाग भगवानच्युतो हरिः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वपतस्तस्य देवस्य पद्मं सूर्यसमप्रभम् |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नाभ्यां विनिःसृतं तत्र यत्रोत्पन्नः पितामहः |
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
साक्षाल्लोकगुरुर्व्रह्मा पद्मे सूर्येन्दुसप्रभे ||
११ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्तथैव च चतुर्मुखः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वप्रभावाद्दुराधर्षो महावलपराक्रमः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कस्यचित्त्वथ कालस्य दानवौ वीर्यवत्तरौ |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मधुश्च कैटभश्चैव दृष्टवन्तौ हरिं प्रभुम् ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शय़ानं शय़ने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वहुय़ोजनविस्तीर्णे वहुय़ोजनमाय़ते ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
किरीटकौस्तुभधरं पीतकौशेय़वाससम् |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दीप्यमानं श्रिय़ा राजंस्तेजसा वपुषा तथा |
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सहस्रसूर्यप्रतिममद्भुतोपमदर्शनम् ||
१५ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
विस्मय़ः सुमहानासीन्मधुकैटभय़ोस्तदा |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्ट्वा पितामहं चैव पद्मे पद्मनिभेक्षणम् ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वित्रासय़ेतामथ तौ व्रह्माणममितौजसम् |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वित्रास्यमानो वहुशो व्रह्मा ताभ्यां महाय़शाः |
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अकम्पय़त्पद्मनालं ततोऽवुध्यत केशवः ||
१७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथापश्यत गोविन्दो दानवौ वीर्यवत्तरौ |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्ट्वा तावव्रवीद्देवः स्वागतं वां महावलौ |
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददानि वां वरं श्रेष्ठं प्रीतिर्हि मम जाय़ते ||
१८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तौ प्रहस्य हृषीकेशं महावीर्यौ महासुरौ |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रत्यव्रूतां महाराज सहितौ मधुसूदनम् ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आवां वरय़ देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद्व्रवीह्यविचारय़न् ||
२० ख
भगवानु उवाच:
प्रतिगृह्णे वरं वीरावीप्सितश्च वरो मम |
२१ क
भगवानु उवाच:
युवां हि वीर्यसम्पन्नौ न वामस्ति समः पुमान् ||
२१ ख
भगवानु उवाच:
वध्यत्वमुपगच्छेतां मम सत्यपराक्रमौ |
२२ क
भगवानु उवाच:
एतदिच्छाम्यहं कामं प्राप्तुं लोकहिताय़ वै ||
२२ ख
मधुकैटभावू ऊचतुः:
अनृतं नोक्तपूर्वं नौ स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा |
२३ क
मधुकैटभावू ऊचतुः:
सत्ये धर्मे च निरतौ विद्ध्यावां पुरुषोत्तम ||
२३ ख
मधुकैटभावू ऊचतुः:
वले रूपे च वीर्ये च शमे च न समोऽस्ति नौ |
२४ क
मधुकैटभावू ऊचतुः:
धर्मे तपसि दाने च शीलसत्त्वदमेषु च ||
२४ ख
मधुकैटभावू ऊचतुः:
उपप्लवो महानस्मानुपावर्तत केशव |
२५ क
मधुकैटभावू ऊचतुः:
उक्तं प्रतिकुरुष्व त्वं कालो हि दुरतिक्रमः ||
२५ ख
मधुकैटभावू ऊचतुः:
आवामिच्छावहे देव कृतमेकं त्वय़ा विभो |
२६ क
मधुकैटभावू ऊचतुः:
अनावृतेऽस्मिन्नाकाशे वधं सुरवरोत्तम ||
२६ ख
मधुकैटभावू ऊचतुः:
पुत्रत्वमभिगच्छाव तव चैव सुलोचन |
२७ क
मधुकैटभावू ऊचतुः:
वर एष वृतो देव तद्विद्धि सुरसत्तम ||
२७ ख
भगवानु उवाच:
वाढमेवं करिष्यामि सर्वमेतद्भविष्यति |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचिन्त्य त्वथ गोविन्दो नापश्यद्यदनावृतम् |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवकाशं पृथिव्यां वा दिवि वा मधुसूदनः ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वकावनावृतावूरू दृष्ट्वा देववरस्तदा |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मधुकैटभय़ो राजञ्शिरसी मधुसूदनः |
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
चक्रेण शितधारेण न्यकृन्तत महाय़शाः ||
३० ग