मार्कण्डेय़ उवाच:
धुन्धुर्नाम महातेजास्तय़ोः पुत्रो महाद्युतिः |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तपोऽतप्यत महन्महावीर्यपराक्रमः ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसन्ततः |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मै व्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभो ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवदानवय़क्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम् |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवध्योऽहं भवेय़ं वै वर एष वृतो मय़ा ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं भवतु गच्छेति तमुवाच पितामहः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स एवमुक्तस्तत्पादौ मूर्ध्ना स्पृश्य जगाम ह ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तु धुन्धुर्वरं लव्ध्वा महावीर्यपराक्रमः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अनुस्मरन्पितृवधं ततो विष्णुमुपाद्रवत् ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तु देवान्सगन्धर्वाञ्जित्वा धुन्धुरमर्षणः |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ववाध सर्वानसकृद्देवान्विष्णुं च वै भृशम् ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
समुद्रो वालुकापूर्ण उज्जानक इति स्मृतः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आगम्य च स दुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ |
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वाधते स्म परं शक्त्या तमुत्तङ्काश्रमं प्रभो ||
७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तर्भूमिगतस्तत्र वालुकान्तर्हितस्तदा |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मधुकैटभय़ोः पुत्रो धुन्धुर्भीमपराक्रमः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शेते लोकविनाशाय़ तपोवलसमाश्रितः |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्तङ्कस्याश्रमाभ्याशे निःश्वसन्पावकार्चिषः ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतस्मिन्नेव काले तु सभृत्यवलवाहनः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो वलशालिनाम् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सहस्रैरेकविंशत्या पुत्राणामरिमर्दनः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राय़ादुत्तङ्कसहितो धुन्धोस्तस्य निवेशनम् ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमाविशत्ततो विष्णुर्भगवांस्तेजसा प्रभुः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्तङ्कस्य निय़ोगेन लोकानां हितकाम्यया ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मिन्प्रय़ाते दुर्धर्षे दिवि शव्दो महानभूत् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
एष श्रीमान्नृपसुतो धुन्धुमारो भविष्यति ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवाः समन्तात्पर्यवाकिरन् |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवदुन्दुभय़श्चैव नेदुः स्वय़मुदीरिताः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शीतश्च वाय़ुः प्रववौ प्रय़ाणे तस्य धीमतः |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विपांसुलां महीं कुर्वन्ववर्ष च सुरेश्वरः ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तरिक्षे विमानानि देवतानां युधिष्ठिर |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्रैव समदृश्यन्त धुन्धुर्यत्र महासुरः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुवलाश्वस्य धुन्धोश्च युद्धकौतूहलान्विताः |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन्महर्षय़ः ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नाराय़णेन कौरव्य तेजसाप्याय़ितस्तदा |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स गतो नृपतिः क्षिप्रं पुत्रैस्तैः सर्वतोदिशम् ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अर्णवं खानय़ामास कुवलाश्वो महीपतिः |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु तस्मिन्वै वालुकार्णवे ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सप्तभिर्दिवसैः खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महावलः |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आसीद्घोरं वपुस्तस्य वालुकान्तर्हितं महत् |
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ ||
२० ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो धुन्धुर्महाराज दिशमाश्रित्य पश्चिमाम् |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुप्तोऽभूद्राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुवलाश्वस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारितः |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिद्रुतः शरैस्तीक्ष्णैर्गदाभिर्मुसलैरपि |
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पट्टिशैः परिघैः प्रासैः खड्गैश्च विमलैः शितैः ||
२२ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
स वध्यमानः सङ्क्रुद्धः समुत्तस्थौ महावलः |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्रुद्धश्चाभक्षय़त्तेषां शस्त्राणि विविधानि च ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आस्याद्वमन्पावकं स संवर्तकसमं तदा |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तान्सर्वान्नृपतेः पुत्रानदहत्स्वेन तेजसा ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्वर्तय़न्निव |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः |
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सगरस्यात्मजान्क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
२५ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं प्रवुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् |
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आससाद महातेजाः कुवलाश्वो महीपतिः ||
२६ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य वारि महाराज सुस्राव वहु देहतः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तदापीय़त तत्तेजो राजा वारिमय़ं नृप |
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
योगी योगेन वह्निं च शमय़ामास वारिणा ||
२७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्रह्मास्त्रेण तदा राजा दैत्यं क्रूरपराक्रमम् |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकाभय़ाय़ वै ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽस्त्रेण दग्ध्वा राजर्षिः कुवलाश्वो महासुरम् |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुरशत्रुममित्रघ्नस्त्रिलोकेश इवापरः |
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्ना समभवत्ततः ||
२९ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रीतैश्च त्रिदशैः सर्वैर्महर्षिसहितैस्तदा |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वरं वृणीष्वेत्युक्तः स प्राञ्जलिः प्रणतस्तदा |
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
३० ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जय़ः |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सख्यं च विष्णुना मे स्याद्भूतेष्वद्रोह एव च |
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
धर्मे रतिश्च सततं स्वर्गे वासस्तथाक्षय़ः ||
३१ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथास्त्विति ततो देवैः प्रीतैरुक्तः स पार्थिवः |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऋषिभिश्च सगन्धर्वैरुत्तङ्केन च धीमता ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सभाज्य चैनं विविधैराशीर्वादैस्ततो नृपम् |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवा महर्षय़श्चैव स्वानि स्थानानि भेजिरे ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य पुत्रास्त्रय़ः शिष्टा युधिष्ठिर तदाभवन् |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृढाश्वः कपिलाश्वश्च चन्द्राश्वश्चैव भारत |
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेभ्यः परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ||
३४ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं स निहतस्तेन कुवलाश्वेन सत्तम |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धुन्धुर्दैत्यो महावीर्यो मधुकैटभय़ोः सुतः ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुवलाश्वस्तु नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृतः |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नाम्ना च गुणसंय़ुक्तस्तदा प्रभृति सोऽभवत् ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धौन्धुमारमुपाख्यानं प्रथितं यस्य कर्मणा ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णोः समनुकीर्तनम् |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शृणुय़ाद्यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नरः ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आय़ुष्मान्धृतिमांश्चैव श्रुत्वा भवति पर्वसु |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न च व्याधिभय़ं किञ्चित्प्राप्नोति विगतज्वरः ||
३९ ख