chevron_left विराट पर्व अध्याय ४३
कर्ण उवाच:
सर्वानाय़ुष्मतो भीतान्सन्त्रस्तानिव लक्षय़े |
१ क
कर्ण उवाच:
अय़ुद्धमनसश्चैव सर्वांश्चैवानवस्थितान् ||
१ ख
कर्ण उवाच:
यद्येष राजा मत्स्यानां यदि वीभत्सुरागतः |
२ क
कर्ण उवाच:
अहमावारय़िष्यामि वेलेव मकरालय़म् ||
२ ख
कर्ण उवाच:
मम चापप्रमुक्तानां शराणां नतपर्वणाम् |
३ क
कर्ण उवाच:
नावृत्तिर्गच्छतामस्ति सर्पाणामिव सर्पताम् ||
३ ख
कर्ण उवाच:
रुक्मपुङ्खाः सुतीक्ष्णाग्रा मुक्ता हस्तवता मय़ा |
४ क
कर्ण उवाच:
छादय़न्तु शराः पार्थं शलभा इव पादपम् ||
४ ख
कर्ण उवाच:
शराणां पुङ्खसक्तानां मौर्व्याभिहतय़ा दृढम् |
५ क
कर्ण उवाच:
श्रूय़तां तलय़ोः शव्दो भेर्योराहतय़ोरिव ||
५ ख
कर्ण उवाच:
समाहितो हि वीभत्सुर्वर्षाण्यष्टौ च पञ्च च |
६ क
कर्ण उवाच:
जातस्नेहश्च युद्धस्य मय़ि सम्प्रहरिष्यति ||
६ ख
कर्ण उवाच:
पात्रीभूतश्च कौन्तेय़ो व्राह्मणो गुणवानिव |
७ क
कर्ण उवाच:
शरौघान्प्रतिगृह्णातु मय़ा मुक्तान्सहस्रशः ||
७ ख
कर्ण उवाच:
एष चैव महेष्वासस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |
८ क
कर्ण उवाच:
अहं चापि कुरुश्रेष्ठा अर्जुनान्नावरः क्वचित् ||
८ ख
कर्ण उवाच:
इतश्चेतश्च निर्मुक्तैः काञ्चनैर्गार्ध्रवाजितैः |
९ क
कर्ण उवाच:
दृश्यतामद्य वै व्योम खद्योतैरिव संवृतम् ||
९ ख
कर्ण उवाच:
अद्याहमृणमक्षय़्यं पुरा वाचा प्रतिश्रुतम् |
१० क
कर्ण उवाच:
धार्तराष्ट्रस्य दास्यामि निहत्य समरेऽर्जुनम् ||
१० ख
कर्ण उवाच:
अन्तरा छिद्यमानानां पुङ्खानां व्यतिशीर्यताम् |
११ क
कर्ण उवाच:
शलभानामिवाकाशे प्रचारः सम्प्रदृश्यताम् ||
११ ख
कर्ण उवाच:
इन्द्राशनिसमस्पर्शं महेन्द्रसमतेजसम् |
१२ क
कर्ण उवाच:
अर्दय़िष्याम्यहं पार्थमुल्काभिरिव कुञ्जरम् ||
१२ ख
कर्ण उवाच:
तमग्निमिव दुर्धर्षमसिशक्तिशरेन्धनम् |
१३ क
कर्ण उवाच:
पाण्डवाग्निमहं दीप्तं प्रदहन्तमिवाहितान् ||
१३ ख
कर्ण उवाच:
अश्ववेगपुरोवातो रथौघस्तनय़ित्नुमान् |
१४ क
कर्ण उवाच:
शरधारो महामेघः शमय़िष्यामि पाण्डवम् ||
१४ ख
कर्ण उवाच:
मत्कार्मुकविनिर्मुक्ताः पार्थमाशीविषोपमाः |
१५ क
कर्ण उवाच:
शराः समभिसर्पन्तु वल्मीकमिव पन्नगाः ||
१५ ख
कर्ण उवाच:
जामदग्न्यान्मय़ा ह्यस्त्रं यत्प्राप्तमृषिसत्तमात् |
१६ क
कर्ण उवाच:
तदुपाश्रित्य वीर्यं च युध्येय़मपि वासवम् ||
१६ ख
कर्ण उवाच:
ध्वजाग्रे वानरस्तिष्ठन्भल्लेन निहतो मय़ा |
१७ क
कर्ण उवाच:
अद्यैव पततां भूमौ विनदन्भैरवान्रवान् ||
१७ ख
कर्ण उवाच:
शत्रोर्मय़ाभिपन्नानां भूतानां ध्वजवासिनाम् |
१८ क
कर्ण उवाच:
दिशः प्रतिष्ठमानानामस्तु शव्दो दिवं गतः ||
१८ ख
कर्ण उवाच:
अद्य दुर्योधनस्याहं शल्यं हृदि चिरस्थितम् |
१९ क
कर्ण उवाच:
समूलमुद्धरिष्यामि वीभत्सुं पातय़न्रथात् ||
१९ ख
कर्ण उवाच:
हताश्वं विरथं पार्थं पौरुषे पर्यवस्थितम् |
२० क
कर्ण उवाच:
निःश्वसन्तं यथा नागमद्य पश्यन्तु कौरवाः ||
२० ख
कर्ण उवाच:
कामं गच्छन्तु कुरवो धनमादाय़ केवलम् |
२१ क
कर्ण उवाच:
रथेषु वापि तिष्ठन्तो युद्धं पश्यन्तु मामकम् ||
२१ ख