सूत उवाच:
पर्व सानत्सुजातं च गुह्यमध्यात्मदर्शनम् |
५१ क
सूत उवाच:
यानसन्धिस्ततः पर्व भगवद्यानमेव च ||
५१ ख
सूत उवाच:
ज्ञेय़ं विवादपर्वात्र कर्णस्यापि महात्मनः |
५२ क
सूत उवाच:
निर्याणं पर्व च ततः कुरुपाण्डवसेनय़ोः ||
५२ ख
सूत उवाच:
रथातिरथसङ्ख्या च पर्वोक्तं तदनन्तरम् |
५३ क
सूत उवाच:
उलूकदूतागमनं पर्वामर्षविवर्धनम् ||
५३ ख
सूत उवाच:
अम्वोपाख्यानमपि च पर्व ज्ञेय़मतः परम् |
५४ क
सूत उवाच:
भीष्माभिषेचनं पर्व ज्ञेय़मद्भुतकारणम् ||
५४ ख
सूत उवाच:
जम्वूखण्डविनिर्माणं पर्वोक्तं तदनन्तरम् |
५५ क
सूत उवाच:
भूमिपर्व ततो ज्ञेय़ं द्वीपविस्तरकीर्तनम् ||
५५ ख
सूत उवाच:
पर्वोक्तं भगवद्गीता पर्व भीष्मवधस्ततः |
५६ क
सूत उवाच:
द्रोणाभिषेकः पर्वोक्तं संशप्तकवधस्ततः ||
५६ ख
सूत उवाच:
अभिमन्युवधः पर्व प्रतिज्ञापर्व चोच्यते |
५७ क
सूत उवाच:
जय़द्रथवधः पर्व घटोत्कचवधस्ततः ||
५७ ख
सूत उवाच:
ततो द्रोणवधः पर्व विज्ञेय़ं लोमहर्षणम् |
५८ क
सूत उवाच:
मोक्षो नाराय़णास्त्रस्य पर्वानन्तरमुच्यते ||
५८ ख
सूत उवाच:
कर्णपर्व ततो ज्ञेय़ं शल्यपर्व ततः परम् |
५९ क
सूत उवाच:
ह्रदप्रवेशनं पर्व गदाय़ुद्धमतः परम् ||
५९ ख
सूत उवाच:
सारस्वतं ततः पर्व तीर्थवंशगुणान्वितम् |
६० क
सूत उवाच:
अत ऊर्ध्वं तु वीभत्सं पर्व सौप्तिकमुच्यते ||
६० ख
सूत उवाच:
ऐषीकं पर्व निर्दिष्टमत ऊर्ध्वं सुदारुणम् |
६१ क
सूत उवाच:
जलप्रदानिकं पर्व स्त्रीपर्व च ततः परम् ||
६१ ख
सूत उवाच:
श्राद्धपर्व ततो ज्ञेय़ं कुरूणामौर्ध्वदेहिकम् |
६२ क
सूत उवाच:
आभिषेचनिकं पर्व धर्मराजस्य धीमतः ||
६२ ख
सूत उवाच:
चार्वाकनिग्रहः पर्व रक्षसो व्रह्मरूपिणः |
६३ क
सूत उवाच:
प्रविभागो गृहाणां च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ||
६३ ख
सूत उवाच:
शान्तिपर्व ततो यत्र राजधर्मानुकीर्तनम् |
६४ क
सूत उवाच:
आपद्धर्मश्च पर्वोक्तं मोक्षधर्मस्ततः परम् ||
६४ ख
सूत उवाच:
ततः पर्व परिज्ञेय़मानुशासनिकं परम् |
६५ क
सूत उवाच:
स्वर्गारोहणिकं पर्व ततो भीष्मस्य धीमतः ||
६५ ख
सूत उवाच:
ततोऽश्वमेधिकं पर्व सर्वपापप्रणाशनम् |
६६ क
सूत उवाच:
अनुगीता ततः पर्व ज्ञेय़मध्यात्मवाचकम् ||
६६ ख
सूत उवाच:
पर्व चाश्रमवासाख्यं पुत्रदर्शनमेव च |
६७ क
सूत उवाच:
नारदागमनं पर्व ततः परमिहोच्यते ||
६७ ख
सूत उवाच:
मौसलं पर्व च ततो घोरं समनुवर्ण्यते |
६८ क
सूत उवाच:
महाप्रस्थानिकं पर्व स्वर्गारोहणिकं ततः ||
६८ ख
सूत उवाच:
हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसञ्ज्ञितम् |
६९ क
सूत उवाच:
भविष्यत्पर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत् ||
६९ ख
सूत उवाच:
एतत्पर्वशतं पूर्णं व्यासेनोक्तं महात्मना |
७० क
सूत उवाच:
यथावत्सूतपुत्रेण लोमहर्षणिना पुनः ||
७० ख
सूत उवाच:
कथितं नैमिषारण्ये पर्वाण्यष्टादशैव तु |
७१ क
सूत उवाच:
समासो भारतस्याय़ं तत्रोक्तः पर्वसङ्ग्रहः ||
७१ ख
सूत उवाच:
पौष्ये पर्वणि माहात्म्यमुत्तङ्कस्योपवर्णितम् |
७२ क
सूत उवाच:
पौलोमे भृगुवंशस्य विस्तारः परिकीर्तितः ||
७२ ख
सूत उवाच:
आस्तीके सर्वनागानां गरुडस्य च सम्भवः |
७३ क
सूत उवाच:
क्षीरोदमथनं चैव जन्मोच्छैःश्रवसस्तथा ||
७३ ख
सूत उवाच:
यजतः सर्पसत्रेण राज्ञः पारिक्षितस्य च |
७४ क
सूत उवाच:
कथेय़मभिनिर्वृत्ता भारतानां महात्मनाम् ||
७४ ख
सूत उवाच:
विविधाः सम्भवा राज्ञामुक्ताः सम्भवपर्वणि |
७५ क
सूत उवाच:
अन्येषां चैव विप्राणामृषेर्द्वैपाय़नस्य च ||
७५ ख
सूत उवाच:
अंशावतरणं चात्र देवानां परिकीर्तितम् |
७६ क
सूत उवाच:
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणां च महौजसाम् ||
७६ ख
सूत उवाच:
नागानामथ सर्पाणां गन्धर्वाणां पतत्रिणाम् |
७७ क
सूत उवाच:
अन्येषां चैव भूतानां विविधानां समुद्भवः ||
७७ ख
सूत उवाच:
वसूनां पुनरुत्पत्तिर्भागीरथ्यां महात्मनाम् |
७८ क
सूत उवाच:
शन्तनोर्वेश्मनि पुनस्तेषां चारोहणं दिवि ||
७८ ख
सूत उवाच:
तेजोंशानां च सङ्घाताद्भीष्मस्याप्यत्र सम्भवः |
७९ क
सूत उवाच:
राज्यान्निवर्तनं चैव व्रह्मचर्यव्रते स्थितिः ||
७९ ख
सूत उवाच:
प्रतिज्ञापालनं चैव रक्षा चित्राङ्गदस्य च |
८० क
सूत उवाच:
हते चित्राङ्गदे चैव रक्षा भ्रातुर्यवीय़सः ||
८० ख
सूत उवाच:
विचित्रवीर्यस्य तथा राज्ये सम्प्रतिपादनम् |
८१ क
सूत उवाच:
धर्मस्य नृषु सम्भूतिरणीमाण्डव्यशापजा ||
८१ ख
सूत उवाच:
कृष्णद्वैपाय़नाच्चैव प्रसूतिर्वरदानजा |
८२ क
सूत उवाच:
धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानां च सम्भवः ||
८२ ख
सूत उवाच:
वारणावतय़ात्रा च मन्त्रो दुर्योधनस्य च |
८३ क
सूत उवाच:
विदुरस्य च वाक्येन सुरुङ्गोपक्रमक्रिय़ा ||
८३ ख
सूत उवाच:
पाण्डवानां वने घोरे हिडिम्वाय़ाश्च दर्शनम् |
८४ क
सूत उवाच:
घटोत्कचस्य चोत्पत्तिरत्रैव परिकीर्तिता ||
८४ ख
सूत उवाच:
अज्ञातचर्या पाण्डूनां वासो व्राह्मणवेश्मनि |
८५ क
सूत उवाच:
वकस्य निधनं चैव नागराणां च विस्मय़ः ||
८५ ख
सूत उवाच:
अङ्गारपर्णं निर्जित्य गङ्गाकूलेऽर्जुनस्तदा |
८६ क
सूत उवाच:
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पाञ्चालानभितो यय़ौ ||
८६ ख
सूत उवाच:
तापत्यमथ वासिष्ठमौर्वं चाख्यानमुत्तमम् |
८७ क
सूत उवाच:
पञ्चेन्द्राणामुपाख्यानमत्रैवाद्भुतमुच्यते ||
८७ ख
सूत उवाच:
पञ्चानामेकपत्नीत्वे विमर्शो द्रुपदस्य च |
८८ क
सूत उवाच:
द्रौपद्या देवविहितो विवाहश्चाप्यमानुषः ||
८८ ख
सूत उवाच:
विदुरस्य च सम्प्राप्तिर्दर्शनं केशवस्य च |
८९ क
सूत उवाच:
खाण्डवप्रस्थवासश्च तथा राज्यार्धशासनम् ||
८९ ख
सूत उवाच:
नारदस्याज्ञय़ा चैव द्रौपद्याः समय़क्रिय़ा |
९० क
सूत उवाच:
सुन्दोपसुन्दय़ोस्तत्र उपाख्यानं प्रकीर्तितम् ||
९० ख
सूत उवाच:
पार्थस्य वनवासश्च उलूप्या पथि सङ्गमः |
९१ क
सूत उवाच:
पुण्यतीर्थानुसंय़ानं वभ्रुवाहनजन्म च ||
९१ ख
सूत उवाच:
द्वारकाय़ां सुभद्रा च कामय़ानेन कामिनी |
९२ क
सूत उवाच:
वासुदेवस्यानुमते प्राप्ता चैव किरीटिना ||
९२ ख
सूत उवाच:
हरणं गृह्य सम्प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने |
९३ क
सूत उवाच:
सम्प्राप्तिश्चक्रधनुषोः खाण्डवस्य च दाहनम् ||
९३ ख
सूत उवाच:
अभिमन्योः सुभद्राय़ां जन्म चोत्तमतेजसः |
९४ क
सूत उवाच:
मय़स्य मोक्षो ज्वलनाद्भुजङ्गस्य च मोक्षणम् |
९४ ख
सूत उवाच:
महर्षेर्मन्दपालस्य शार्ङ्ग्यं तनय़सम्भवः ||
९४ ग
सूत उवाच:
इत्येतदाधिपर्वोक्तं प्रथमं वहुविस्तरम् |
९५ क
सूत उवाच:
अध्याय़ानां शते द्वे तु सङ्ख्याते परमर्षिणा |
९५ ख
सूत उवाच:
अष्टादशैव चाध्याय़ा व्यासेनोत्तमतेजसा ||
९५ ग
सूत उवाच:
सप्त श्लोकसहस्राणि तथा नव शतानि च |
९६ क
सूत उवाच:
श्लोकाश्च चतुराशीतिर्दृष्टो ग्रन्थो महात्मना ||
९६ ख
सूत उवाच:
द्वितीय़ं तु सभापर्व वहुवृत्तान्तमुच्यते |
९७ क
सूत उवाच:
सभाक्रिय़ा पाण्डवानां किङ्कराणां च दर्शनम् ||
९७ ख
सूत उवाच:
लोकपालसभाख्यानं नारदाद्देवदर्शनात् |
९८ क
सूत उवाच:
राजसूय़स्य चारम्भो जरासन्धवधस्तथा ||
९८ ख
सूत उवाच:
गिरिव्रजे निरुद्धानां राज्ञां कृष्णेन मोक्षणम् |
९९ क
सूत उवाच:
राजसूय़ेऽर्घसंवादे शिशुपालवधस्तथा ||
९९ ख