भीष्म उवाच:
विधिना प्रतिजग्राह वेदोक्तेन विशां पते ||
५० ख
भीष्म उवाच:
आसनं चैव पाद्यं च तस्मै दत्त्वा द्विजातय़े |
५१ क
भीष्म उवाच:
प्रोवाचौघवती विप्रं केनार्थः किं ददामि ते ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
तामव्रवीत्ततो विप्रो राजपुत्रीं सुदर्शनाम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
त्वय़ा ममार्थः कल्याणि निर्विशङ्के तदाचर ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
यदि प्रमाणं धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसंमतः |
५३ क
भीष्म उवाच:
प्रदानेनात्मनो राज्ञि कर्तुमर्हसि मे प्रिय़म् ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
तथा सञ्छन्द्यमानोऽन्यैरीप्सितैर्नृपकन्यया |
५४ क
भीष्म उवाच:
नान्यमात्मप्रदानात्स तस्या वव्रे वरं द्विजः ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
सा तु राजसुता स्मृत्वा भर्तुर्वचनमादितः |
५५ क
भीष्म उवाच:
तथेति लज्जमाना सा तमुवाच द्विजर्षभम् ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
ततो रहः स विप्रर्षिः सा चैवोपविवेश ह |
५६ क
भीष्म उवाच:
संस्मृत्य भर्तुर्वचनं गृहस्थाश्रमकाङ्क्षिणः ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
अथेध्मान्समुपादाय़ स पावकिरुपागमत् |
५७ क
भीष्म उवाच:
मृत्युना रौद्रभावेन नित्यं वन्धुरिवान्वितः ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
ततस्त्वाश्रममागम्य स पावकसुतस्तदा |
५८ क
भीष्म उवाच:
तामाजुहावौघवतीं क्वासि यातेति चासकृत् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
तस्मै प्रतिवचः सा तु भर्त्रे न प्रददौ तदा |
५९ क
भीष्म उवाच:
कराभ्यां तेन विप्रेण स्पृष्टा भर्तृव्रता सती ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
उच्छिष्टास्मीति मन्वाना लज्जिता भर्तुरेव च |
६० क
भीष्म उवाच:
तूष्णीम्भूताभवत्साध्वी न चोवाचाथ किञ्चन ||
६० ख
भीष्म उवाच:
अथ तां पुनरेवेदं प्रोवाच स सुदर्शनः |
६१ क
भीष्म उवाच:
क्व सा साध्वी क्व सा याता गरीय़ः किमतो मम ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
पतिव्रता सत्यशीला नित्यं चैवार्जवे रता |
६२ क
भीष्म उवाच:
कथं न प्रत्युदेत्यद्य स्मय़माना यथा पुरा ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
उटजस्थस्तु तं विप्रः प्रत्युवाच सुदर्शनम् |
६३ क
भीष्म उवाच:
अतिथिं विद्धि सम्प्राप्तं पावके व्राह्मणं च माम् ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
अनय़ा छन्द्यमानोऽहं भार्यया तव सत्तम |
६४ क
भीष्म उवाच:
तैस्तैरतिथिसत्कारैरार्जवेऽस्या दृढं मनः ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
अनेन विधिना सेय़ं मामर्चति शुभानना |
६५ क
भीष्म उवाच:
अनुरूपं यदत्राद्य तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
कूटमुद्गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वय़ात् |
६६ क
भीष्म उवाच:
हीनप्रतिज्ञमत्रैनं वधिष्यामीति चिन्तय़न् ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
सुदर्शनस्तु मनसा कर्मणा चक्षुषा गिरा |
६७ क
भीष्म उवाच:
त्यक्तेर्ष्यस्त्यक्तमन्युश्च स्मय़मानोऽव्रवीदिदम् ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
सुरतं तेऽस्तु विप्राग्र्य प्रीतिर्हि परमा मम |
६८ क
भीष्म उवाच:
गृहस्थस्य हि धर्मोऽग्र्यः सम्प्राप्तातिथिपूजनम् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
अतिथिः पूजितो यस्य गृहस्थस्य तु गच्छति |
६९ क
भीष्म उवाच:
नान्यस्तस्मात्परो धर्म इति प्राहुर्मनीषिणः ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
प्राणा हि मम दाराश्च यच्चान्यद्विद्यते वसु |
७० क
भीष्म उवाच:
अतिथिभ्यो मय़ा देय़मिति मे व्रतमाहितम् ||
७० ख
भीष्म उवाच:
निःसन्दिग्धं मय़ा वाक्यमेतत्ते समुदाहृतम् |
७१ क
भीष्म उवाच:
तेनाहं विप्र सत्येन स्वय़मात्मानमालभे ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
पृथिवी वाय़ुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् |
७२ क
भीष्म उवाच:
वुद्धिरात्मा मनः कालो दिशश्चैव गुणा दश ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
नित्यमेते हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिताः |
७३ क
भीष्म उवाच:
सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म धर्मभृतां वर ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
यथैषा नानृता वाणी मय़ाद्य समुदाहृता |
७४ क
भीष्म उवाच:
तेन सत्येन मां देवाः पालय़न्तु दहन्तु वा ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
ततो नादः समभवद्दिक्षु सर्वासु भारत |
७५ क
भीष्म उवाच:
असकृत्सत्यमित्येव नैतन्मिथ्येति सर्वशः ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
उटजात्तु ततस्तस्मान्निश्चक्राम स वै द्विजः |
७६ क
भीष्म उवाच:
वपुषा खं च भूमिं च व्याप्य वाय़ुरिवोद्यतः ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
स्वरेण विप्रः शैक्षेण त्रीँल्लोकाननुनादय़न् |
७७ क
भीष्म उवाच:
उवाच चैनं धर्मज्ञं पूर्वमामन्त्र्य नामतः ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
धर्मोऽहमस्मि भद्रं ते जिज्ञासार्थं तवानघ |
७८ क
भीष्म उवाच:
प्राप्तः सत्यं च ते ज्ञात्वा प्रीतिर्मे परमा त्वय़ि ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
विजितश्च त्वय़ा मृत्युर्योऽय़ं त्वामनुगच्छति |
७९ क
भीष्म उवाच:
रन्ध्रान्वेषी तव सदा त्वय़ा धृत्या वशीकृतः ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
न चास्ति शक्तिस्त्रैलोक्ये कस्यचित्पुरुषोत्तम |
८० क
भीष्म उवाच:
पतिव्रतामिमां साध्वीं तवोद्वीक्षितुमप्युत ||
८० ख
भीष्म उवाच:
रक्षिता त्वद्गुणैरेषा पतिव्रतगुणैस्तथा |
८१ क
भीष्म उवाच:
अधृष्या यदिय़ं व्रूय़ात्तथा तन्नान्यथा भवेत् ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
एषा हि तपसा स्वेन संय़ुक्ता व्रह्मवादिनी |
८२ क
भीष्म उवाच:
पावनार्थं च लोकस्य सरिच्छ्रेष्ठा भविष्यति ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
अर्धेनौघवती नाम त्वामर्धेनानुय़ास्यति |
८३ क
भीष्म उवाच:
शरीरेण महाभागा योगो ह्यस्या वशे स्थितः ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
अनय़ा सह लोकांश्च गन्तासि तपसार्जितान् |
८४ क
भीष्म उवाच:
यत्र नावृत्तिमभ्येति शाश्वतांस्तान्सनातनान् ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
अनेन चैव देहेन लोकांस्त्वमभिपत्स्यसे |
८५ क
भीष्म उवाच:
निर्जितश्च त्वय़ा मृत्युरैश्वर्यं च तवोत्तमम् ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
पञ्च भूतान्यतिक्रान्तः स्ववीर्याच्च मनोभवः |
८६ क
भीष्म उवाच:
गृहस्थधर्मेणानेन कामक्रोधौ च ते जितौ ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
स्नेहो रागश्च तन्द्री च मोहो द्रोहश्च केवलः |
८७ क
भीष्म उवाच:
तव शुश्रूषय़ा राजन्राजपुत्र्या विनिर्जिताः ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
शुक्लानां तु सहस्रेण वाजिनां रथमुत्तमम् |
८८ क
भीष्म उवाच:
युक्तं प्रगृह्य भगवान्व्यवसाय़ो जगाम तम् ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
मृत्युरात्मा च लोकाश्च जिता भूतानि पञ्च च |
८९ क
भीष्म उवाच:
वुद्धिः कालो मनो व्योम कामक्रोधौ तथैव च ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
तस्माद्गृहाश्रमस्थस्य नान्यद्दैवतमस्ति वै |
९० क
भीष्म उवाच:
ऋतेऽतिथिं नरव्याघ्र मनसैतद्विचारय़ ||
९० ख
भीष्म उवाच:
अतिथिः पूजितो यस्य ध्याय़ते मनसा शुभम् |
९१ क
भीष्म उवाच:
न तत्क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिणः ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
पात्रं त्वतिथिमासाद्य शीलाढ्यं यो न पूजय़ेत् |
९२ क
भीष्म उवाच:
स दत्त्वा सुकृतं तस्य क्षपय़ेत ह्यनर्चितः ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
एतत्ते कथितं पुत्र मय़ाख्यानमनुत्तमम् |
९३ क
भीष्म उवाच:
यथा हि विजितो मृत्युर्गृहस्थेन पुराभवत् ||
९३ ख
भीष्म उवाच:
धन्यं यशस्यमाय़ुष्यमिदमाख्यानमुत्तमम् |
९४ क
भीष्म उवाच:
वुभूषताभिमन्तव्यं सर्वदुश्चरितापहम् ||
९४ ख
भीष्म उवाच:
य इदं कथय़ेद्विद्वानहन्यहनि भारत |
९५ क
भीष्म उवाच:
सुदर्शनस्य चरितं पुण्याँल्लोकानवाप्नुय़ात् ||
९५ ख