chevron_left आदि पर्व अध्याय २
सूत उवाच:
यज्ञे विभूतिं तां दृष्ट्वा दुःखामर्षान्वितस्य च |
१०० क
सूत उवाच:
दुर्योधनस्यावहासो भीमेन च सभातले ||
१०० ख
सूत उवाच:
यत्रास्य मन्युरुद्भूतो येन द्यूतमकारय़त् |
१०१ क
सूत उवाच:
यत्र धर्मसुतं द्यूते शकुनिः कितवोऽजय़त् ||
१०१ ख
सूत उवाच:
यत्र द्यूतार्णवे मग्नान्द्रौपदी नौरिवार्णवात् |
१०२ क
सूत उवाच:
तारय़ामास तांस्तीर्णाञ्ज्ञात्वा दुर्योधनो नृपः |
१०२ ख
सूत उवाच:
पुनरेव ततो द्यूते समाह्वय़त पाण्डवान् ||
१०२ ग
सूत उवाच:
एतत्सर्वं सभापर्व समाख्यातं महात्मना |
१०३ क
सूत उवाच:
अध्याय़ाः सप्ततिर्ज्ञेय़ास्तथा द्वौ चात्र सङ्ख्यया ||
१०३ ख
सूत उवाच:
श्लोकानां द्वे सहस्रे तु पञ्च श्लोकशतानि च |
१०४ क
सूत उवाच:
श्लोकाश्चैकादश ज्ञेय़ाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः ||
१०४ ख
सूत उवाच:
अतः परं तृतीय़ं तु ज्ञेय़मारण्यकं महत् |
१०५ क
सूत उवाच:
पौरानुगमनं चैव धर्मपुत्रस्य धीमतः ||
१०५ ख
सूत उवाच:
वृष्णीनामागमो यत्र पाञ्चालानां च सर्वशः |
१०६ क
सूत उवाच:
यत्र सौभवधाख्यानं किर्मीरवध एव च |
१०६ ख
सूत उवाच:
अस्त्रहेतोर्विवासश्च पार्थस्यामिततेजसः ||
१०६ ग
सूत उवाच:
महादेवेन युद्धं च किरातवपुषा सह |
१०७ क
सूत उवाच:
दर्शनं लोकपालानां स्वर्गारोहणमेव च ||
१०७ ख
सूत उवाच:
दर्शनं वृहदश्वस्य महर्षेर्भावितात्मनः |
१०८ क
सूत उवाच:
युधिष्ठिरस्य चार्तस्य व्यसने परिदेवनम् ||
१०८ ख
सूत उवाच:
नलोपाख्यानमत्रैव धर्मिष्ठं करुणोदय़म् |
१०९ क
सूत उवाच:
दमय़न्त्याः स्थितिर्यत्र नलस्य व्यसनागमे ||
१०९ ख
सूत उवाच:
वनवासगतानां च पाण्डवानां महात्मनाम् |
११० क
सूत उवाच:
स्वर्गे प्रवृत्तिराख्याता लोमशेनार्जुनस्य वै ||
११० ख
सूत उवाच:
तीर्थय़ात्रा तथैवात्र पाण्डवानां महात्मनाम् |
१११ क
सूत उवाच:
जटासुरस्य तत्रैव वधः समुपवर्ण्यते ||
१११ ख
सूत उवाच:
निय़ुक्तो भीमसेनश्च द्रौपद्या गन्धमादने |
११२ क
सूत उवाच:
यत्र मन्दारपुष्पार्थं नलिनीं तामधर्षय़त् ||
११२ ख
सूत उवाच:
यत्रास्य सुमहद्युद्धमभवत्सह राक्षसैः |
११३ क
सूत उवाच:
यक्षैश्चापि महावीर्यैर्मणिमत्प्रमुखैस्तथा ||
११३ ख
सूत उवाच:
आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणम् |
११४ क
सूत उवाच:
लोपामुद्राभिगमनमपत्यार्थमृषेरपि ||
११४ ख
सूत उवाच:
ततः श्येनकपोतीय़मुपाख्यानमनन्तरम् |
११५ क
सूत उवाच:
इन्द्रोऽग्निर्यत्र धर्मश्च अजिज्ञासञ्शिविं नृपम् ||
११५ ख
सूत उवाच:
ऋश्यशृङ्गस्य चरितं कौमारव्रह्मचारिणः |
११६ क
सूत उवाच:
जामदग्न्यस्य रामस्य चरितं भूरितेजसः ||
११६ ख
सूत उवाच:
कार्तवीर्यवधो यत्र हैहय़ानां च वर्ण्यते |
११७ क
सूत उवाच:
सौकन्यमपि चाख्यानं च्यवनो यत्र भार्गवः ||
११७ ख
सूत उवाच:
शर्यातिय़ज्ञे नासत्यौ कृतवान्सोमपीथिनौ |
११८ क
सूत उवाच:
ताभ्यां च यत्र स मुनिर्यौवनं प्रतिपादितः ||
११८ ख
सूत उवाच:
जन्तूपाख्यानमत्रैव यत्र पुत्रेण सोमकः |
११९ क
सूत उवाच:
पुत्रार्थमय़जद्राजा लेभे पुत्रशतं च सः ||
११९ ख
सूत उवाच:
अष्टावक्रीय़मत्रैव विवादे यत्र वन्दिनम् |
१२० क
सूत उवाच:
विजित्य सागरं प्राप्तं पितरं लव्धवानृषिः ||
१२० ख
सूत उवाच:
अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि गुर्वर्थे सव्यसाचिना |
१२१ क
सूत उवाच:
निवातकवचैर्युद्धं हिरण्यपुरवासिभिः ||
१२१ ख
सूत उवाच:
समागमश्च पार्थस्य भ्रातृभिर्गन्धमादने |
१२२ क
सूत उवाच:
घोषय़ात्रा च गन्धर्वैर्यत्र युद्धं किरीटिनः ||
१२२ ख
सूत उवाच:
पुनरागमनं चैव तेषां द्वैतवनं सरः |
१२३ क
सूत उवाच:
जय़द्रथेनापहारो द्रौपद्याश्चाश्रमान्तरात् ||
१२३ ख
सूत उवाच:
यत्रैनमन्वय़ाद्भीमो वाय़ुवेगसमो जवे |
१२४ क
सूत उवाच:
मार्कण्डेय़समस्याय़ामुपाख्यानानि भागशः ||
१२४ ख
सूत उवाच:
सन्दर्शनं च कृष्णस्य संवादश्चैव सत्यया |
१२५ क
सूत उवाच:
व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमैन्द्रद्युम्नं तथैव च ||
१२५ ख
सूत उवाच:
सावित्र्यौद्दालकीय़ं च वैन्योपाख्यानमेव च |
१२६ क
सूत उवाच:
रामाय़णमुपाख्यानमत्रैव वहुविस्तरम् ||
१२६ ख
सूत उवाच:
कर्णस्य परिमोषोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् |
१२७ क
सूत उवाच:
आरणेय़मुपाख्यानं यत्र धर्मोऽन्वशात्सुतम् |
१२७ ख
सूत उवाच:
जग्मुर्लव्धवरा यत्र पाण्डवाः पश्चिमां दिशम् ||
१२७ ग
सूत उवाच:
एतदारण्यकं पर्व तृतीय़ं परिकीर्तितम् |
१२८ क
सूत उवाच:
अत्राध्याय़शते द्वे तु सङ्ख्याते परमर्षिणा |
१२८ ख
सूत उवाच:
एकोनसप्ततिश्चैव तथाध्याय़ाः प्रकीर्तिताः ||
१२८ ग
सूत उवाच:
एकादश सहस्राणि श्लोकानां षट्शतानि च |
१२९ क
सूत उवाच:
चतुःषष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वैतत्परिकीर्तितम् ||
१२९ ख
सूत उवाच:
अतः परं निवोधेदं वैराटं पर्वविस्तरम् |
१३० क
सूत उवाच:
विराटनगरं गत्वा श्मशाने विपुलां शमीम् |
१३० ख
सूत उवाच:
दृष्ट्वा संनिदधुस्तत्र पाण्डवा आय़ुधान्युत ||
१३० ग
सूत उवाच:
यत्र प्रविश्य नगरं छद्मभिर्न्यवसन्त ते |
१३१ क
सूत उवाच:
दुरात्मनो वधो यत्र कीचकस्य वृकोदरात् ||
१३१ ख
सूत उवाच:
गोग्रहे यत्र पार्थेन निर्जिताः कुरवो युधि |
१३२ क
सूत उवाच:
गोधनं च विराटस्य मोक्षितं यत्र पाण्डवैः ||
१३२ ख
सूत उवाच:
विराटेनोत्तरा दत्ता स्नुषा यत्र किरीटिनः |
१३३ क
सूत उवाच:
अभिमन्युं समुद्दिश्य सौभद्रमरिघातिनम् ||
१३३ ख
सूत उवाच:
चतुर्थमेतद्विपुलं वैराटं पर्व वर्णितम् |
१३४ क
सूत उवाच:
अत्रापि परिसङ्ख्यातमध्याय़ानां महात्मना ||
१३४ ख
सूत उवाच:
सप्तषष्टिरथो पूर्णा श्लोकाग्रमपि मे शृणु |
१३५ क
सूत उवाच:
श्लोकानां द्वे सहस्रे तु श्लोकाः पञ्चाशदेव तु |
१३५ ख
सूत उवाच:
पर्वण्यस्मिन्समाख्याताः सङ्ख्यया परमर्षिणा ||
१३५ ग
सूत उवाच:
उद्योगपर्व विज्ञेय़ं पञ्चमं शृण्वतः परम् |
१३६ क
सूत उवाच:
उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु जिगीषय़ा |
१३६ ख
सूत उवाच:
दुर्योधनोऽर्जुनश्चैव वासुदेवमुपस्थितौ ||
१३६ ग
सूत उवाच:
साहाय़्यमस्मिन्समरे भवान्नौ कर्तुमर्हति |
१३७ क
सूत उवाच:
इत्युक्ते वचने कृष्णो यत्रोवाच महामतिः ||
१३७ ख
सूत उवाच:
अय़ुध्यमानमात्मानं मन्त्रिणं पुरुषर्षभौ |
१३८ क
सूत उवाच:
अक्षौहिणीं वा सैन्यस्य कस्य वा किं ददाम्यहम् ||
१३८ ख
सूत उवाच:
वव्रे दुर्योधनः सैन्यं मन्दात्मा यत्र दुर्मतिः |
१३९ क
सूत उवाच:
अय़ुध्यमानं सचिवं वव्रे कृष्णं धनञ्जय़ः ||
१३९ ख
सूत उवाच:
सञ्जय़ं प्रेषय़ामास शमार्थं पाण्डवान्प्रति |
१४० क
सूत उवाच:
यत्र दूतं महाराजो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ||
१४० ख
सूत उवाच:
श्रुत्वा च पाण्डवान्यत्र वासुदेवपुरोगमान् |
१४१ क
सूत उवाच:
प्रजागरः सम्प्रजज्ञे धृतराष्ट्रस्य चिन्तय़ा ||
१४१ ख
सूत उवाच:
विदुरो यत्र वाक्यानि विचित्राणि हितानि च |
१४२ क
सूत उवाच:
श्रावय़ामास राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ||
१४२ ख
सूत उवाच:
तथा सनत्सुजातेन यत्राध्यात्ममनुत्तमम् |
१४३ क
सूत उवाच:
मनस्तापान्वितो राजा श्रावितः शोकलालसः ||
१४३ ख
सूत उवाच:
प्रभाते राजसमितौ सञ्जय़ो यत्र चाभिभोः |
१४४ क
सूत उवाच:
ऐकात्म्यं वासुदेवस्य प्रोक्तवानर्जुनस्य च ||
१४४ ख
सूत उवाच:
यत्र कृष्णो दय़ापन्नः सन्धिमिच्छन्महाय़शाः |
१४५ क
सूत उवाच:
स्वय़मागाच्छमं कर्तुं नगरं नागसाह्वय़म् ||
१४५ ख
सूत उवाच:
प्रत्याख्यानं च कृष्णस्य राज्ञा दुर्योधनेन वै |
१४६ क