chevron_left आदि पर्व अध्याय २
सूत उवाच:
शमार्थं याचमानस्य पक्षय़ोरुभय़ोर्हितम् ||
१४६ ख
सूत उवाच:
कर्णदुर्योधनादीनां दुष्टं विज्ञाय़ मन्त्रितम् |
१४७ क
सूत उवाच:
योगेश्वरत्वं कृष्णेन यत्र राजसु दर्शितम् ||
१४७ ख
सूत उवाच:
रथमारोप्य कृष्णेन यत्र कर्णोऽनुमन्त्रितः |
१४८ क
सूत उवाच:
उपाय़पूर्वं शौण्डीर्यात्प्रत्याख्यातश्च तेन सः ||
१४८ ख
सूत उवाच:
ततश्चाप्यभिनिर्यात्रा रथाश्वनरदन्तिनाम् |
१४९ क
सूत उवाच:
नगराद्धास्तिनपुराद्वलसङ्ख्यानमेव च ||
१४९ ख
सूत उवाच:
यत्र राज्ञा उलूकस्य प्रेषणं पाण्डवान्प्रति |
१५० क
सूत उवाच:
श्वोभाविनि महाय़ुद्धे दूत्येन क्रूरवादिना |
१५० ख
सूत उवाच:
रथातिरथसङ्ख्यानमम्वोपाख्यानमेव च ||
१५० ग
सूत उवाच:
एतत्सुवहुवृत्तान्तं पञ्चमं पर्व भारते |
१५१ क
सूत उवाच:
उद्योगपर्व निर्दिष्टं सन्धिविग्रहसंश्रितम् ||
१५१ ख
सूत उवाच:
अध्याय़ाः सङ्ख्यया त्वत्र षडशीतिशतं स्मृतम् |
१५२ क
सूत उवाच:
श्लोकानां षट्सहस्राणि तावन्त्येव शतानि च ||
१५२ ख
सूत उवाच:
श्लोकाश्च नवतिः प्रोक्तास्तथैवाष्टौ महात्मना |
१५३ क
सूत उवाच:
व्यासेनोदारमतिना पर्वण्यस्मिंस्तपोधनाः ||
१५३ ख
सूत उवाच:
अत ऊर्ध्वं विचित्रार्थं भीष्मपर्व प्रचक्षते |
१५४ क
सूत उवाच:
जम्वूखण्डविनिर्माणं यत्रोक्तं सञ्जय़ेन ह ||
१५४ ख
सूत उवाच:
यत्र युद्धमभूद्घोरं दशाहान्यतिदारुणम् |
१५५ क
सूत उवाच:
यत्र यौधिष्ठिरं सैन्यं विषादमगमत्परम् ||
१५५ ख
सूत उवाच:
कश्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः |
१५६ क
सूत उवाच:
मोहजं नाशय़ामास हेतुभिर्मोक्षदर्शनैः ||
१५६ ख
सूत उवाच:
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य यत्र पार्थो महाधनुः |
१५७ क
सूत उवाच:
विनिघ्नन्निशितैर्वाणै रथाद्भीष्ममपातय़त् ||
१५७ ख
सूत उवाच:
षष्ठमेतन्महापर्व भारते परिकीर्तितम् |
१५८ क
सूत उवाच:
अध्याय़ानां शतं प्रोक्तं सप्तदश तथापरे ||
१५८ ख
सूत उवाच:
पञ्च श्लोकसहस्राणि सङ्ख्ययाष्टौ शतानि च |
१५९ क
सूत उवाच:
श्लोकाश्च चतुराशीतिः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः |
१५९ ख
सूत उवाच:
व्यासेन वेदविदुषा सङ्ख्याता भीष्मपर्वणि ||
१५९ ग
सूत उवाच:
द्रोणपर्व ततश्चित्रं वहुवृत्तान्तमुच्यते |
१६० क
सूत उवाच:
यत्र संशप्तकाः पार्थमपनिन्यू रणाजिरात् ||
१६० ख
सूत उवाच:
भगदत्तो महाराजो यत्र शक्रसमो युधि |
१६१ क
सूत उवाच:
सुप्रतीकेन नागेन सह शस्तः किरीटिना ||
१६१ ख
सूत उवाच:
यत्राभिमन्युं वहवो जघ्नुर्लोकमहारथाः |
१६२ क
सूत उवाच:
जय़द्रथमुखा वालं शूरमप्राप्तय़ौवनम् ||
१६२ ख
सूत उवाच:
हतेऽभिमन्यौ क्रुद्धेन यत्र पार्थेन संय़ुगे |
१६३ क
सूत उवाच:
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जय़द्रथः |
१६३ ख
सूत उवाच:
संशप्तकावशेषं च कृतं निःशेषमाहवे ||
१६३ ग
सूत उवाच:
अलम्वुसः श्रुताय़ुश्च जलसन्धश्च वीर्यवान् |
१६४ क
सूत उवाच:
सौमदत्तिर्विराटश्च द्रुपदश्च महारथः |
१६४ ख
सूत उवाच:
घटोत्कचादय़श्चान्ये निहता द्रोणपर्वणि ||
१६४ ग
सूत उवाच:
अश्वत्थामापि चात्रैव द्रोणे युधि निपातिते |
१६५ क
सूत उवाच:
अस्त्रं प्रादुश्चकारोग्रं नाराय़णममर्षितः ||
१६५ ख
सूत उवाच:
सप्तमं भारते पर्व महदेतदुदाहृतम् |
१६६ क
सूत उवाच:
अत्र ते पृथिवीपालाः प्राय़शो निधनं गताः |
१६६ ख
सूत उवाच:
द्रोणपर्वणि ये शूरा निर्दिष्टाः पुरुषर्षभाः ||
१६६ ग
सूत उवाच:
अध्याय़ानां शतं प्रोक्तमध्याय़ाः सप्ततिस्तथा |
१६७ क
सूत उवाच:
अष्टौ श्लोकसहस्राणि तथा नव शतानि च ||
१६७ ख
सूत उवाच:
श्लोका नव तथैवात्र सङ्ख्यातास्तत्त्वदर्शिना |
१६८ क
सूत उवाच:
पाराशर्येण मुनिना सञ्चिन्त्य द्रोणपर्वणि ||
१६८ ख
सूत उवाच:
अतः परं कर्णपर्व प्रोच्यते परमाद्भुतम् |
१६९ क
सूत उवाच:
सारथ्ये विनिय़ोगश्च मद्रराजस्य धीमतः |
१६९ ख
सूत उवाच:
आख्यातं यत्र पौराणं त्रिपुरस्य निपातनम् ||
१६९ ग
सूत उवाच:
प्रय़ाणे परुषश्चात्र संवादः कर्णशल्ययोः |
१७० क
सूत उवाच:
हंसकाकीय़माख्यानमत्रैवाक्षेपसंहितम् ||
१७० ख
सूत उवाच:
अन्योन्यं प्रति च क्रोधो युधिष्ठिरकिरीटिनोः |
१७१ क
सूत उवाच:
द्वैरथे यत्र पार्थेन हतः कर्णो महारथः ||
१७१ ख
सूत उवाच:
अष्टमं पर्व निर्दिष्टमेतद्भारतचिन्तकैः |
१७२ क
सूत उवाच:
एकोनसप्ततिः प्रोक्ता अध्याय़ाः कर्णपर्वणि |
१७२ ख
सूत उवाच:
चत्वार्येव सहस्राणि नव श्लोकशतानि च ||
१७२ ग
सूत उवाच:
अतः परं विचित्रार्थं शल्यपर्व प्रकीर्तितम् |
१७३ क
सूत उवाच:
हतप्रवीरे सैन्ये तु नेता मद्रेश्वरोऽभवत् ||
१७३ ख
सूत उवाच:
वृत्तानि रथय़ुद्धानि कीर्त्यन्ते यत्र भागशः |
१७४ क
सूत उवाच:
विनाशः कुरुमुख्यानां शल्यपर्वणि कीर्त्यते ||
१७४ ख
सूत उवाच:
शल्यस्य निधनं चात्र धर्मराजान्महारथात् |
१७५ क
सूत उवाच:
गदाय़ुद्धं तु तुमुलमत्रैव परिकीर्तितम् |
१७५ ख
सूत उवाच:
सरस्वत्याश्च तीर्थानां पुण्यता परिकीर्तिता ||
१७५ ग
सूत उवाच:
नवमं पर्व निर्दिष्टमेतदद्भुतमर्थवत् |
१७६ क
सूत उवाच:
एकोनषष्टिरध्याय़ास्तत्र सङ्ख्याविशारदैः ||
१७६ ख
सूत उवाच:
सङ्ख्याता वहुवृत्तान्ताः श्लोकाग्रं चात्र शस्यते |
१७७ क
सूत उवाच:
त्रीणि श्लोकसहस्राणि द्वे शते विंशतिस्तथा |
१७७ ख
सूत उवाच:
मुनिना सम्प्रणीतानि कौरवाणां यशोभृताम् ||
१७७ ग
सूत उवाच:
अतः परं प्रवक्ष्यामि सौप्तिकं पर्व दारुणम् |
१७८ क
सूत उवाच:
भग्नोरुं यत्र राजानं दुर्योधनममर्षणम् ||
१७८ ख
सूत उवाच:
व्यपय़ातेषु पार्थेषु त्रय़स्तेऽभ्याय़यू रथाः |
१७९ क
सूत उवाच:
कृतवर्मा कृपो द्रौणिः साय़ाह्ने रुधिरोक्षिताः ||
१७९ ख
सूत उवाच:
प्रतिजज्ञे दृढक्रोधो द्रौणिर्यत्र महारथः |
१८० क
सूत उवाच:
अहत्वा सर्वपाञ्चालान्धृष्टद्युम्नपुरोगमान् |
१८० ख
सूत उवाच:
पाण्डवांश्च सहामात्यान्न विमोक्ष्यामि दंशनम् ||
१८० ग
सूत उवाच:
प्रसुप्तान्निशि विश्वस्तान्यत्र ते पुरुषर्षभाः |
१८१ क
सूत उवाच:
पाञ्चालान्सपरीवाराञ्जघ्नुर्द्रौणिपुरोगमाः ||
१८१ ख
सूत उवाच:
यत्रामुच्यन्त पार्थास्ते पञ्च कृष्णवलाश्रय़ात् |
१८२ क
सूत उवाच:
सात्यकिश्च महेष्वासः शेषाश्च निधनं गताः ||
१८२ ख
सूत उवाच:
द्रौपदी पुत्रशोकार्ता पितृभ्रातृवधार्दिता |
१८३ क
सूत उवाच:
कृतानशनसङ्कल्पा यत्र भर्तृनुपाविशत् ||
१८३ ख
सूत उवाच:
द्रौपदीवचनाद्यत्र भीमो भीमपराक्रमः |
१८४ क
सूत उवाच:
अन्वधावत सङ्क्रुद्धो भारद्वाजं गुरोः सुतम् ||
१८४ ख
सूत उवाच:
भीमसेनभय़ाद्यत्र दैवेनाभिप्रचोदितः |
१८५ क
सूत उवाच:
अपाण्डवाय़ेति रुषा द्रौणिरस्त्रमवासृजत् ||
१८५ ख
सूत उवाच:
मैवमित्यव्रवीत्कृष्णः शमय़ंस्तस्य तद्वचः |
१८६ क
सूत उवाच:
यत्रास्त्रमस्त्रेण च तच्छमय़ामास फाल्गुनः ||
१८६ ख
सूत उवाच:
द्रौणिद्वैपाय़नादीनां शापाश्चान्योन्यकारिताः |
१८७ क
सूत उवाच:
तोय़कर्मणि सर्वेषां राज्ञामुदकदानिके ||
१८७ ख
सूत उवाच:
गूढोत्पन्नस्य चाख्यानं कर्णस्य पृथय़ात्मनः |
१८८ क
सूत उवाच:
सुतस्यैतदिह प्रोक्तं दशमं पर्व सौप्तिकम् ||
१८८ ख
सूत उवाच:
अष्टादशास्मिन्नध्याय़ाः पर्वण्युक्ता महात्मना |
१८९ क
सूत उवाच:
श्लोकाग्रमत्र कथितं शतान्यष्टौ तथैव च ||
१८९ ख
सूत उवाच:
श्लोकाश्च सप्ततिः प्रोक्ता यथावदभिसङ्ख्यया |
१९० क
सूत उवाच:
सौप्तिकैषीकसम्वन्धे पर्वण्यमितवुद्धिना ||
१९० ख
सूत उवाच:
अत ऊर्ध्वमिदं प्राहुः स्त्रीपर्व करुणोदय़म् |
१९१ क