सूत उवाच:
विलापो वीरपत्नीनां यत्रातिकरुणः स्मृतः |
१९१ ख
सूत उवाच:
क्रोधावेशः प्रसादश्च गान्धारीधृतराष्ट्रय़ोः ||
१९१ ग
सूत उवाच:
यत्र तान्क्षत्रिय़ाञ्शूरान्दिष्टान्ताननिवर्तिनः |
१९२ क
सूत उवाच:
पुत्रान्भ्रातृन्पितृंश्चैव ददृशुर्निहतान्रणे ||
१९२ ख
सूत उवाच:
यत्र राजा महाप्राज्ञः सर्वधर्मभृतां वरः |
१९३ क
सूत उवाच:
राज्ञां तानि शरीराणि दाहय़ामास शास्त्रतः ||
१९३ ख
सूत उवाच:
एतदेकादशं प्रोक्तं पर्वातिकरुणं महत् |
१९४ क
सूत उवाच:
सप्तविंशतिरध्याय़ाः पर्वण्यस्मिन्नुदाहृताः ||
१९४ ख
सूत उवाच:
श्लोकाः सप्तशतं चात्र पञ्चसप्ततिरुच्यते |
१९५ क
सूत उवाच:
सङ्ख्यया भारताख्यानं कर्त्रा ह्यत्र महात्मना |
१९५ ख
सूत उवाच:
प्रणीतं सज्जनमनोवैक्लव्याश्रुप्रवर्तकम् ||
१९५ ग
सूत उवाच:
अतः परं शान्तिपर्व द्वादशं वुद्धिवर्धनम् |
१९६ क
सूत उवाच:
यत्र निर्वेदमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
१९६ ख
सूत उवाच:
घातय़ित्वा पितृन्भ्रातृन्पुत्रान्सम्वन्धिवान्धवान् ||
१९६ ग
सूत उवाच:
शान्तिपर्वणि धर्माश्च व्याख्याताः शरतल्पिकाः |
१९७ क
सूत उवाच:
राजभिर्वेदितव्या ये सम्यङ्नय़वुभुत्सुभिः ||
१९७ ख
सूत उवाच:
आपद्धर्माश्च तत्रैव कालहेतुप्रदर्शकाः |
१९८ क
सूत उवाच:
यान्वुद्ध्वा पुरुषः सम्यक्सर्वज्ञत्वमवाप्नुय़ात् |
१९८ ख
सूत उवाच:
मोक्षधर्माश्च कथिता विचित्रा वहुविस्तराः ||
१९८ ग
सूत उवाच:
द्वादशं पर्व निर्दिष्टमेतत्प्राज्ञजनप्रिय़म् |
१९९ क
सूत उवाच:
पर्वण्यत्र परिज्ञेय़मध्याय़ानां शतत्रय़म् |
१९९ ख
सूत उवाच:
त्रिंशच्चैव तथाध्याय़ा नव चैव तपोधनाः ||
१९९ ग
सूत उवाच:
श्लोकानां तु सहस्राणि कीर्तितानि चतुर्दश |
२०० क
सूत उवाच:
पञ्च चैव शतान्याहुः पञ्चविंशतिसङ्ख्यया ||
२०० ख
सूत उवाच:
अत ऊर्ध्वं तु विज्ञेय़मानुशासनमुत्तमम् |
२०१ क
सूत उवाच:
यत्र प्रकृतिमापन्नः श्रुत्वा धर्मविनिश्चय़म् |
२०१ ख
सूत उवाच:
भीष्माद्भागीरथीपुत्रात्कुरुराजो युधिष्ठिरः ||
२०१ ग
सूत उवाच:
व्यवहारोऽत्र कार्त्स्न्येन धर्मार्थीय़ो निदर्शितः |
२०२ क
सूत उवाच:
विविधानां च दानानां फलय़ोगाः पृथग्विधाः ||
२०२ ख
सूत उवाच:
तथा पात्रविशेषाश्च दानानां च परो विधिः |
२०३ क
सूत उवाच:
आचारविधिय़ोगश्च सत्यस्य च परा गतिः ||
२०३ ख
सूत उवाच:
एतत्सुवहुवृत्तान्तमुत्तमं चानुशासनम् |
२०४ क
सूत उवाच:
भीष्मस्यात्रैव सम्प्राप्तिः स्वर्गस्य परिकीर्तिता ||
२०४ ख
सूत उवाच:
एतत्त्रय़ोदशं पर्व धर्मनिश्चय़कारकम् |
२०५ क
सूत उवाच:
अध्याय़ानां शतं चात्र षट्चत्वारिंशदेव च |
२०५ ख
सूत उवाच:
श्लोकानां तु सहस्राणि षट्सप्तैव शतानि च ||
२०५ ग
सूत उवाच:
ततोऽश्वमेधिकं नाम पर्व प्रोक्तं चतुर्दशम् |
२०६ क
सूत उवाच:
तत्संवर्तमरुत्तीय़ं यत्राख्यानमनुत्तमम् ||
२०६ ख
सूत उवाच:
सुवर्णकोशसम्प्राप्तिर्जन्म चोक्तं परिक्षितः |
२०७ क
सूत उवाच:
दग्धस्यास्त्राग्निना पूर्वं कृष्णात्सञ्जीवनं पुनः ||
२०७ ख
सूत उवाच:
चर्याय़ां हय़मुत्सृष्टं पाण्डवस्यानुगच्छतः |
२०८ क
सूत उवाच:
तत्र तत्र च युद्धानि राजपुत्रैरमर्षणैः ||
२०८ ख
सूत उवाच:
चित्राङ्गदाय़ाः पुत्रेण पुत्रिकाय़ा धनञ्जय़ः |
२०९ क
सूत उवाच:
सङ्ग्रामे वभ्रुवाहेन संशय़ं चात्र दर्शितः |
२०९ ख
सूत उवाच:
अश्वमेधे महाय़ज्ञे नकुलाख्यानमेव च ||
२०९ ग
सूत उवाच:
इत्याश्वमेधिकं पर्व प्रोक्तमेतन्महाद्भुतम् |
२१० क
सूत उवाच:
अत्राध्याय़शतं त्रिंशत्त्रय़ोऽध्याय़ाश्च शव्दिताः ||
२१० ख
सूत उवाच:
त्रीणि श्लोकसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च |
२११ क
सूत उवाच:
विंशतिश्च तथा श्लोकाः सङ्ख्यातास्तत्त्वदर्शिना ||
२११ ख
सूत उवाच:
तत आश्रमवासाक्यं पर्व पञ्चदशं स्मृतम् |
२१२ क
सूत उवाच:
यत्र राज्यं परित्यज्य गान्धारीसहितो नृपः |
२१२ ख
सूत उवाच:
धृतराष्ट्राश्रमपदं विदुरश्च जगाम ह ||
२१२ ग
सूत उवाच:
यं दृष्ट्वा प्रस्थितं साध्वी पृथाप्यनुय़यौ तदा |
२१३ क
सूत उवाच:
पुत्रराज्यं परित्यज्य गुरुशुश्रूषणे रता ||
२१३ ख
सूत उवाच:
यत्र राजा हतान्पुत्रान्पौत्रानन्यांश्च पार्थिवान् |
२१४ क
सूत उवाच:
लोकान्तरगतान्वीरानपश्यत्पुनरागतान् ||
२१४ ख
सूत उवाच:
ऋषेः प्रसादात्कृष्णस्य दृष्ट्वाश्चर्यमनुत्तमम् |
२१५ क
सूत उवाच:
त्यक्त्वा शोकं सदारश्च सिद्धिं परमिकां गतः ||
२१५ ख
सूत उवाच:
यत्र धर्मं समाश्रित्य विदुरः सुगतिं गतः |
२१६ क
सूत उवाच:
सञ्जय़श्च महामात्रो विद्वान्गावल्गणिर्वशी ||
२१६ ख
सूत उवाच:
ददर्श नारदं यत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः |
२१७ क
सूत उवाच:
नारदाच्चैव शुश्राव वृष्णीनां कदनं महत् ||
२१७ ख
सूत उवाच:
एतदाश्रमवासाख्यं पूर्वोक्तं सुमहाद्भुतम् |
२१८ क
सूत उवाच:
द्विचत्वारिंशदध्याय़ाः पर्वैतदभिसङ्ख्यया ||
२१८ ख
सूत उवाच:
सहस्रमेकं श्लोकानां पञ्च श्लोकशतानि च |
२१९ क
सूत उवाच:
षडेव च तथा श्लोकाः सङ्ख्यातास्तत्त्वदर्शिना ||
२१९ ख
सूत उवाच:
अतः परं निवोधेदं मौसलं पर्व दारुणम् |
२२० क
सूत उवाच:
यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शस्त्रस्पर्शसहा युधि |
२२० ख
सूत उवाच:
व्रह्मदण्डविनिष्पिष्टाः समीपे लवणाम्भसः ||
२२० ग
सूत उवाच:
आपाने पानगलिता दैवेनाभिप्रचोदिताः |
२२१ क
सूत उवाच:
एरकारूपिभिर्वज्रैर्निजघ्नुरितरेतरम् ||
२२१ ख
सूत उवाच:
यत्र सर्वक्षय़ं कृत्वा तावुभौ रामकेशवौ |
२२२ क
सूत उवाच:
नातिचक्रमतुः कालं प्राप्तं सर्वहरं समम् ||
२२२ ख
सूत उवाच:
यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविनाकृताम् |
२२३ क
सूत उवाच:
दृष्ट्वा विषादमगमत्परां चार्तिं नरर्षभः ||
२२३ ख
सूत उवाच:
स सत्कृत्य यदुश्रेष्ठं मातुलं शौरिमात्मनः |
२२४ क
सूत उवाच:
ददर्श यदुवीराणामापाने वैशसं महत् ||
२२४ ख
सूत उवाच:
शरीरं वासुदेवस्य रामस्य च महात्मनः |
२२५ क
सूत उवाच:
संस्कारं लम्भय़ामास वृष्णीनां च प्रधानतः ||
२२५ ख
सूत उवाच:
स वृद्धवालमादाय़ द्वारवत्यास्ततो जनम् |
२२६ क
सूत उवाच:
ददर्शापदि कष्टाय़ां गाण्डीवस्य पराभवम् ||
२२६ ख
सूत उवाच:
सर्वेषां चैव दिव्यानामस्त्राणामप्रसन्नताम् |
२२७ क
सूत उवाच:
नाशं वृष्णिकलत्राणां प्रभावानामनित्यताम् ||
२२७ ख
सूत उवाच:
दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नो व्यासवाक्यप्रचोदितः |
२२८ क
सूत उवाच:
धर्मराजं समासाद्य संन्यासं समरोचय़ेत् ||
२२८ ख
सूत उवाच:
इत्येतन्मौसलं पर्व षोडशं परिकीर्तितम् |
२२९ क
सूत उवाच:
अध्याय़ाष्टौ समाख्याताः श्लोकानां च शतत्रय़म् ||
२२९ ख
सूत उवाच:
महाप्रस्थानिकं तस्मादूर्ध्वं सप्तदशं स्मृतम् |
२३० क
सूत उवाच:
यत्र राज्यं परित्यज्य पाण्डवाः पुरुषर्षभाः |
२३० ख
सूत उवाच:
द्रौपद्या सहिता देव्या सिद्धिं परमिकां गताः ||
२३० ग
सूत उवाच:
अत्राध्याय़ास्त्रय़ः प्रोक्ताः श्लोकानां च शतं तथा |
२३१ क
सूत उवाच:
विंशतिश्च तथा श्लोकाः सङ्ख्यातास्तत्त्वदर्शिना ||
२३१ ख
सूत उवाच:
स्वर्गपर्व ततो ज्ञेय़ं दिव्यं यत्तदमानुषम् |
२३२ क
सूत उवाच:
अध्याय़ाः पञ्च सङ्ख्याताः पर्वैतदभिसङ्ख्यया |
२३२ ख
सूत उवाच:
श्लोकानां द्वे शते चैव प्रसङ्ख्याते तपोधनाः ||
२३२ ग
सूत उवाच:
अष्टादशैवमेतानि पर्वाण्युक्तान्यशेषतः |
२३३ क
सूत उवाच:
खिलेषु हरिवंशश्च भविष्यच्च प्रकीर्तितम् ||
२३३ ख
सूत उवाच:
एतदखिलमाख्यातं भारतं पर्वसङ्ग्रहात् |
२३४ क
सूत उवाच:
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युय़ुत्सय़ा |
२३४ ख
सूत उवाच:
तन्महद्दारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ||
२३४ ग