chevron_left आदि पर्व अध्याय २
ऋषय़ ऊचुः:
समन्तपञ्चकमिति यदुक्तं सूतनन्दन |
१ क
ऋषय़ ऊचुः:
एतत्सर्वं यथान्याय़ं श्रोतुमिच्छामहे वय़म् ||
१ ख
सूत उवाच:
शुश्रूषा यदि वो विप्रा व्रुवतश्च कथाः शुभाः |
२ क
सूत उवाच:
समन्तपञ्चकाख्यं च श्रोतुमर्हथ सत्तमाः ||
२ ख
सूत उवाच:
त्रेताद्वापरय़ोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतां वरः |
३ क
सूत उवाच:
असकृत्पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ||
३ ख
सूत उवाच:
स सर्वं क्षत्रमुत्साद्य स्ववीर्येणानलद्युतिः |
४ क
सूत उवाच:
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ||
४ ख
सूत उवाच:
स तेषु रुधिराम्भस्सु ह्रदेषु क्रोधमूर्च्छितः |
५ क
सूत उवाच:
पितृन्सन्तर्पय़ामास रुधिरेणेति नः श्रुतम् ||
५ ख
सूत उवाच:
अथर्चीकादय़ोऽभ्येत्य पितरो व्राह्मणर्षभम् |
६ क
सूत उवाच:
तं क्षमस्वेति सिषिधुस्ततः स विरराम ह ||
६ ख
सूत उवाच:
तेषां समीपे यो देशो ह्रदानां रुधिराम्भसाम् |
७ क
सूत उवाच:
समन्तपञ्चकमिति पुण्यं तत्परिकीर्तितम् ||
७ ख
सूत उवाच:
येन लिङ्गेन यो देशो युक्तः समुपलक्ष्यते |
८ क
सूत उवाच:
तेनैव नाम्ना तं देशं वाच्यमाहुर्मनीषिणः ||
८ ख
सूत उवाच:
अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरय़ोरभूत् |
९ क
सूत उवाच:
समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनय़ोः ||
९ ख
सूत उवाच:
तस्मिन्परमधर्मिष्ठे देशे भूदोषवर्जिते |
१० क
सूत उवाच:
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युय़ुत्सय़ा ||
१० ख
सूत उवाच:
एवं नामाभिनिर्वृत्तं तस्य देशस्य वै द्विजाः |
११ क
सूत उवाच:
पुण्यश्च रमणीय़श्च स देशो वः प्रकीर्तितः ||
११ ख
सूत उवाच:
तदेतत्कथितं सर्वं मय़ा वो मुनिसत्तमाः |
१२ क
सूत उवाच:
यथा देशः स विख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ||
१२ ख
ऋषय़ ऊचुः:
अक्षौहिण्य इति प्रोक्तं यत्त्वय़ा सूतनन्दन |
१३ क
ऋषय़ ऊचुः:
एतदिच्छामहे श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ||
१३ ख
ऋषय़ ऊचुः:
अक्षौहिण्याः परीमाणं रथाश्वनरदन्तिनाम् |
१४ क
ऋषय़ ऊचुः:
यथावच्चैव नो व्रूहि सर्वं हि विदितं तव ||
१४ ख
सूत उवाच:
एको रथो गजश्चैको नराः पञ्च पदातय़ः |
१५ क
सूत उवाच:
त्रय़श्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्यभिधीय़ते ||
१५ ख
सूत उवाच:
पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं वुधाः |
१६ क
सूत उवाच:
त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीय़ते ||
१६ ख
सूत उवाच:
त्रय़ो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रय़ः |
१७ क
सूत उवाच:
स्मृतास्तिस्रस्तु वाहिन्यः पृतनेति विचक्षणैः ||
१७ ख
सूत उवाच:
चमूस्तु पृतनास्तिस्रस्तिस्रश्चम्वस्त्वनीकिनी |
१८ क
सूत उवाच:
अनीकिनीं दशगुणां प्राहुरक्षौहिणीं वुधाः ||
१८ ख
सूत उवाच:
अक्षौहिण्याः प्रसङ्ख्यानं रथानां द्विजसत्तमाः |
१९ क
सूत उवाच:
सङ्ख्यागणिततत्त्वज्ञैः सहस्राण्येकविंशतिः ||
१९ ख
सूत उवाच:
शतान्युपरि चैवाष्टौ तथा भूय़श्च सप्ततिः |
२० क
सूत उवाच:
गजानां तु परीमाणमेतदेवात्र निर्दिशेत् ||
२० ख
सूत उवाच:
ज्ञेय़ं शतसहस्रं तु सहस्राणि तथा नव |
२१ क
सूत उवाच:
नराणामपि पञ्चाशच्छतानि त्रीणि चानघाः ||
२१ ख
सूत उवाच:
पञ्चषष्टिसहस्राणि तथाश्वानां शतानि च |
२२ क
सूत उवाच:
दशोत्तराणि षट्प्राहुर्यथावदिह सङ्ख्यया ||
२२ ख
सूत उवाच:
एतामक्षौहिणीं प्राहुः सङ्ख्यातत्त्वविदो जनाः |
२३ क
सूत उवाच:
यां वः कथितवानस्मि विस्तरेण द्विजोत्तमाः ||
२३ ख
सूत उवाच:
एतय़ा सङ्ख्यया ह्यासन्कुरुपाण्डवसेनय़ोः |
२४ क
सूत उवाच:
अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठाः पिण्डेनाष्टादशैव ताः ||
२४ ख
सूत उवाच:
समेतास्तत्र वै देशे तत्रैव निधनं गताः |
२५ क
सूत उवाच:
कौरवान्कारणं कृत्वा कालेनाद्भुतकर्मणा ||
२५ ख
सूत उवाच:
अहानि युय़ुधे भीष्मो दशैव परमास्त्रवित् |
२६ क
सूत उवाच:
अहानि पञ्च द्रोणस्तु ररक्ष कुरुवाहिनीम् ||
२६ ख
सूत उवाच:
अहनी युय़ुधे द्वे तु कर्णः परवलार्दनः |
२७ क
सूत उवाच:
शल्योऽर्धदिवसं त्वासीद्गदाय़ुद्धमतः परम् ||
२७ ख
सूत उवाच:
तस्यैव तु दिनस्यान्ते हार्दिक्यद्रौणिगौतमाः |
२८ क
सूत उवाच:
प्रसुप्तं निशि विश्वस्तं जघ्नुर्यौधिष्ठिरं वलम् ||
२८ ख
सूत उवाच:
यत्तु शौनकसत्रे ते भारताख्यानविस्तरम् |
२९ क
सूत उवाच:
आख्यास्ये तत्र पौलोममाख्यानं चादितः परम् ||
२९ ख
सूत उवाच:
विचित्रार्थपदाख्यानमनेकसमय़ान्वितम् |
३० क
सूत उवाच:
अभिपन्नं नरैः प्राज्ञैर्वैराग्यमिव मोक्षिभिः ||
३० ख
सूत उवाच:
आत्मेव वेदितव्येषु प्रिय़ेष्विव च जीवितम् |
३१ क
सूत उवाच:
इतिहासः प्रधानार्थः श्रेष्ठः सर्वागमेष्वय़म् ||
३१ ख
सूत उवाच:
इतिहासोत्तमे ह्यस्मिन्नर्पिता वुद्धिरुत्तमा |
३२ क
सूत उवाच:
स्वरव्यञ्जनय़ोः कृत्स्ना लोकवेदाश्रय़ेव वाक् ||
३२ ख
सूत उवाच:
अस्य प्रज्ञाभिपन्नस्य विचित्रपदपर्वणः |
३३ क
सूत उवाच:
भारतस्येतिहासस्य श्रूय़तां पर्वसङ्ग्रहः ||
३३ ख
सूत उवाच:
पर्वानुक्रमणी पूर्वं द्वितीय़ं पर्वसङ्ग्रहः |
३४ क
सूत उवाच:
पौष्यं पौलोममास्तीकमादिवंशावतारणम् ||
३४ ख
सूत उवाच:
ततः सम्भवपर्वोक्तमद्भुतं देवनिर्मितम् |
३५ क
सूत उवाच:
दाहो जतुगृहस्यात्र हैडिम्वं पर्व चोच्यते ||
३५ ख
सूत उवाच:
ततो वकवधः पर्व पर्व चैत्ररथं ततः |
३६ क
सूत उवाच:
ततः स्वय़ंवरं देव्याः पाञ्चाल्याः पर्व चोच्यते ||
३६ ख
सूत उवाच:
क्षत्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् |
३७ क
सूत उवाच:
विदुरागमनं पर्व राज्यलम्भस्तथैव च ||
३७ ख
सूत उवाच:
अर्जुनस्य वने वासः सुभद्राहरणं ततः |
३८ क
सूत उवाच:
सुभद्राहरणादूर्ध्वं ज्ञेय़ं हरणहारिकम् ||
३८ ख
सूत उवाच:
ततः खाण्डवदाहाख्यं तत्रैव मय़दर्शनम् |
३९ क
सूत उवाच:
सभापर्व ततः प्रोक्तं मन्त्रपर्व ततः परम् ||
३९ ख
सूत उवाच:
जरासन्धवधः पर्व पर्व दिग्विजय़स्तथा |
४० क
सूत उवाच:
पर्व दिग्विजय़ादूर्ध्वं राजसूय़िकमुच्यते ||
४० ख
सूत उवाच:
ततश्चार्घाभिहरणं शिशुपालवधस्ततः |
४१ क
सूत उवाच:
द्यूतपर्व ततः प्रोक्तमनुद्यूतमतः परम् ||
४१ ख
सूत उवाच:
तत आरण्यकं पर्व किर्मीरवध एव च |
४२ क
सूत उवाच:
ईश्वरार्जुनय़ोर्युद्धं पर्व कैरातसञ्ज्ञितम् ||
४२ ख
सूत उवाच:
इन्द्रलोकाभिगमनं पर्व ज्ञेय़मतः परम् |
४३ क
सूत उवाच:
तीर्थय़ात्रा ततः पर्व कुरुराजस्य धीमतः ||
४३ ख
सूत उवाच:
जटासुरवधः पर्व यक्षय़ुद्धमतः परम् |
४४ क
सूत उवाच:
तथैवाजगरं पर्व विज्ञेय़ं तदनन्तरम् ||
४४ ख
सूत उवाच:
मार्कण्डेय़समस्या च पर्वोक्तं तदनन्तरम् |
४५ क
सूत उवाच:
संवादश्च ततः पर्व द्रौपदीसत्यभामय़ोः ||
४५ ख
सूत उवाच:
घोषय़ात्रा ततः पर्व मृगस्वप्नभय़ं ततः |
४६ क
सूत उवाच:
व्रीहिद्रौणिकमाख्यानं ततोऽनन्तरमुच्यते ||
४६ ख
सूत उवाच:
द्रौपदीहरणं पर्व सैन्धवेन वनात्ततः |
४७ क
सूत उवाच:
कुण्डलाहरणं पर्व ततः परमिहोच्यते ||
४७ ख
सूत उवाच:
आरणेय़ं ततः पर्व वैराटं तदनन्तरम् |
४८ क
सूत उवाच:
कीचकानां वधः पर्व पर्व गोग्रहणं ततः ||
४८ ख
सूत उवाच:
अभिमन्युना च वैराट्याः पर्व वैवाहिकं स्मृतम् |
४९ क
सूत उवाच:
उद्योगपर्व विज्ञेय़मत ऊर्ध्वं महाद्भुतम् ||
४९ ख
सूत उवाच:
ततः सञ्जय़यानाख्यं पर्व ज्ञेय़मतः परम् |
५० क
सूत उवाच:
प्रजागरं ततः पर्व धृतराष्ट्रस्य चिन्तय़ा ||
५० ख