युधिष्ठिर उवाच:
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
श्रुतं मे महदाख्यानमिदं मतिमतां वर ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
भूय़स्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मार्थसहितं नृप |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
कथ्यमानं त्वय़ा किञ्चित्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
२ ख
युधिष्ठिर उवाच:
केन मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः |
३ क
युधिष्ठिर उवाच:
इत्येतत्सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेन मम पार्थिव ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
४ क
भीष्म उवाच:
यथा मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
मनोः प्रजापते राजन्निक्ष्वाकुरभवत्सुतः |
५ क
भीष्म उवाच:
तस्य पुत्रशतं जज्ञे नृपतेः सूर्यवर्चसः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
दशमस्तस्य पुत्रस्तु दशाश्वो नाम भारत |
६ क
भीष्म उवाच:
माहिष्मत्यामभूद्राजा धर्मात्मा सत्यविक्रमः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
दशाश्वस्य सुतस्त्वासीद्राजा परमधार्मिकः |
७ क
भीष्म उवाच:
सत्ये तपसि दाने च यस्य नित्यं रतं मनः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
मदिराश्व इति ख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपतिः |
८ क
भीष्म उवाच:
धनुर्वेदे च वेदे च निरतो योऽभवत्सदा ||
८ ख
भीष्म उवाच:
मदिराश्वस्य पुत्रस्तु द्युतिमान्नाम पार्थिवः |
९ क
भीष्म उवाच:
महाभागो महातेजा महासत्त्वो महावलः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
पुत्रो द्युतिमतस्त्वासीत्सुवीरो नाम पार्थिवः |
१० क
भीष्म उवाच:
धर्मात्मा कोशवांश्चापि देवराज इवापरः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
सुवीरस्य तु पुत्रोऽभूत्सर्वसङ्ग्रामदुर्जय़ः |
११ क
भीष्म उवाच:
दुर्जय़ेत्यभिविख्यातः सर्वशास्त्रविशारदः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
दुर्जय़स्येन्द्रवपुषः पुत्रोऽग्निसदृशद्युतिः |
१२ क
भीष्म उवाच:
दुर्योधनो नाम महान्राजासीद्राजसत्तम ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
तस्येन्द्रसमवीर्यस्य सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनः |
१३ क
भीष्म उवाच:
विषय़श्च प्रभावश्च तुल्यमेवाभ्यवर्तत ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
रत्नैर्धनैश्च पशुभिः सस्यैश्चापि पृथग्विधैः |
१४ क
भीष्म उवाच:
नगरं विषय़श्चास्य प्रतिपूर्णं तदाभवत् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
न तस्य विषय़े चाभूत्कृपणो नापि दुर्गतः |
१५ क
भीष्म उवाच:
व्याधितो वा कृशो वापि तस्मिन्नाभून्नरः क्वचित् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
सुदक्षिणो मधुरवागनसूय़ुर्जितेन्द्रिय़ः |
१६ क
भीष्म उवाच:
धर्मात्मा चानृशंसश्च विक्रान्तोऽथाविकत्थनः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
यज्वा वदान्यो मेधावी व्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः |
१७ क
भीष्म उवाच:
न चावमन्ता दाता च वेदवेदाङ्गपारगः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तं नर्मदा देवनदी पुण्या शीतजला शिवा |
१८ क
भीष्म उवाच:
चकमे पुरुषश्रेष्ठं स्वेन भावेन भारत ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
तस्य जज्ञे तदा नद्यां कन्या राजीवलोचना |
१९ क
भीष्म उवाच:
नाम्ना सुदर्शना राजन्रूपेण च सुदर्शना ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
तादृग्रूपा न नारीषु भूतपूर्वा युधिष्ठिर |
२० क
भीष्म उवाच:
दुर्योधनसुता यादृगभवद्वरवर्णिनी ||
२० ख
भीष्म उवाच:
तामग्निश्चकमे साक्षाद्राजकन्यां सुदर्शनाम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
भूत्वा च व्राह्मणः साक्षाद्वरय़ामास तं नृपम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
दरिद्रश्चासवर्णश्च ममाय़मिति पार्थिवः |
२२ क
भीष्म उवाच:
न दित्सति सुतां तस्मै तां विप्राय़ सुदर्शनाम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽस्य वितते यज्ञे नष्टोऽभूद्धव्यवाहनः |
२३ क
भीष्म उवाच:
ततो दुर्योधनो राजा वाक्यमाहर्त्विजस्तदा ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
दुष्कृतं मम किं नु स्याद्भवतां वा द्विजर्षभाः |
२४ क
भीष्म उवाच:
येन नाशं जगामाग्निः कृतं कुपुरुषेष्विव ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
न ह्यल्पं दुष्कृतं नोऽस्ति येनाग्निर्नाशमागतः |
२५ क
भीष्म उवाच:
भवतां वाथ वा मह्यं तत्त्वेनैतद्विमृश्यताम् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
एतद्राज्ञो वचः श्रुत्वा विप्रास्ते भरतर्षभ |
२६ क
भीष्म उवाच:
निय़ता वाग्यताश्चैव पावकं शरणं यय़ुः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तान्दर्शय़ामास तदा भगवान्हव्यवाहनः |
२७ क
भीष्म उवाच:
स्वं रूपं दीप्तिमत्कृत्वा शरदर्कसमद्युतिः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
ततो महात्मा तानाह दहनो व्राह्मणर्षभान् |
२८ क
भीष्म उवाच:
वरय़ाम्यात्मनोऽर्थाय़ दुर्योधनसुतामिति ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते काल्यमुत्थाय़ तस्मै राज्ञे न्यवेदय़न् |
२९ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणा विस्मिताः सर्वे यदुक्तं चित्रभानुना ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
ततः स राजा तच्छ्रुत्वा वचनं व्रह्मवादिनाम् |
३० क
भीष्म उवाच:
अवाप्य परमं हर्षं तथेति प्राह वुद्धिमान् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
प्राय़ाचत नृपः शुल्कं भगवन्तं विभावसुम् |
३१ क
भीष्म उवाच:
नित्यं सांनिध्यमिह ते चित्रभानो भवेदिति |
३१ ख
भीष्म उवाच:
तमाह भगवानग्निरेवमस्त्विति पार्थिवम् ||
३१ ग
भीष्म उवाच:
ततः सांनिध्यमध्यापि माहिष्मत्यां विभावसोः |
३२ क
भीष्म उवाच:
दृष्टं हि सहदेवेन दिशो विजय़ता तदा ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तां समलङ्कृत्य कन्यामहतवाससम् |
३३ क
भीष्म उवाच:
ददौ दुर्योधनो राजा पावकाय़ महात्मने ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिजग्राह चाग्निस्तां राजपुत्रीं सुदर्शनाम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
विधिना वेददृष्टेन वसोर्धारामिवाध्वरे ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
तस्या रूपेण शीलेन कुलेन वपुषा श्रिय़ा |
३५ क
भीष्म उवाच:
अभवत्प्रीतिमानग्निर्गर्भं तस्यां समादधे ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
तस्यां समभवत्पुत्रो नाम्नाग्नेय़ः सुदर्शनः |
३६ क
भीष्म उवाच:
शिशुरेवाध्यगात्सर्वं स च व्रह्म सनातनम् ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
अथौघवान्नाम नृपो नृगस्यासीत्पितामहः |
३७ क
भीष्म उवाच:
तस्याप्योघवती कन्या पुत्रश्चौघरथोऽभवत् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
तामोघवान्ददौ तस्मै स्वय़मोघवतीं सुताम् |
३८ क
भीष्म उवाच:
सुदर्शनाय़ विदुषे भार्यार्थे देवरूपिणीम् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
स गृहस्थाश्रमरतस्तय़ा सह सुदर्शनः |
३९ क
भीष्म उवाच:
कुरुक्षेत्रेऽवसद्राजन्नोघवत्या समन्वितः ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
गृहस्थश्चावजेष्यामि मृत्युमित्येव स प्रभो |
४० क
भीष्म उवाच:
प्रतिज्ञामकरोद्धीमान्दीप्ततेजा विशां पते ||
४० ख
भीष्म उवाच:
तामथौघवतीं राजन्स पावकसुतोऽव्रवीत् |
४१ क
भीष्म उवाच:
अतिथेः प्रतिकूलं ते न कर्तव्यं कथञ्चन ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
येन येन च तुष्येत नित्यमेव त्वय़ातिथिः |
४२ क
भीष्म उवाच:
अप्यात्मनः प्रदानेन न ते कार्या विचारणा ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
एतद्व्रतं मम सदा हृदि सम्परिवर्तते |
४३ क
भीष्म उवाच:
गृहस्थानां हि सुश्रोणि नातिथेर्विद्यते परम् ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
प्रमाणं यदि वामोरु वचस्ते मम शोभने |
४४ क
भीष्म उवाच:
इदं वचनमव्यग्रा हृदि त्वं धारय़ेः सदा ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
निष्क्रान्ते मय़ि कल्याणि तथा संनिहितेऽनघे |
४५ क
भीष्म उवाच:
नातिथिस्तेऽवमन्तव्यः प्रमाणं यद्यहं तव ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
तमव्रवीदोघवती यता मूर्ध्नि कृताञ्जलिः |
४६ क
भीष्म उवाच:
न मे त्वद्वचनात्किञ्चिदकर्तव्यं कथञ्चन ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
जिगीषमाणं तु गृहे तदा मृत्युः सुदर्शनम् |
४७ क
भीष्म उवाच:
पृष्ठतोऽन्वगमद्राजन्रन्ध्रान्वेषी तदा सदा ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
इध्मार्थं तु गते तस्मिन्नग्निपुत्रे सुदर्शने |
४८ क
भीष्म उवाच:
अतिथिर्व्राह्मणः श्रीमांस्तामाहौघवतीं तदा ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
आतिथ्यं दत्तमिच्छामि त्वय़ाद्य वरवर्णिनि |
४९ क
भीष्म उवाच:
प्रमाणं यदि धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसंमतः ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्ता तेन विप्रेण राजपुत्री यशस्विनी |
५० क