अष्टावक्र उवाच:
तथास्तु साधय़िष्यामि तत्र यास्याम्यसंशय़म् |
१ क
अष्टावक्र उवाच:
यत्र त्वं वदसे साधो भवान्भवतु सत्यवाक् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
ततोऽगच्छत्स भगवानुत्तरामुत्तमां दिशम् |
२ क
भीष्म उवाच:
हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठं सिद्धचारणसेवितम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
स गत्वा द्विजशार्दूलो हिमवन्तं महागिरिम् |
३ क
भीष्म उवाच:
अभ्यगच्छन्नदीं पुण्यां वाहुदां धर्मदाय़िनीम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अशोके विमले तीर्थे स्नात्वा तर्प्य च देवताः |
४ क
भीष्म उवाच:
तत्र वासाय़ शय़ने कौश्ये सुखमुवास ह ||
४ ख
भीष्म उवाच:
ततो रात्र्यां व्यतीताय़ां प्रातरुत्थाय़ स द्विजः |
५ क
भीष्म उवाच:
स्नात्वा प्रादुश्चकाराग्निं हुत्वा चैव विधानतः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
रुद्राणीकूपमासाद्य ह्रदे तत्र समाश्वसत् |
६ क
भीष्म उवाच:
विश्रान्तश्च समुत्थाय़ कैलासमभितो यय़ौ ||
६ ख
भीष्म उवाच:
सोऽपश्यत्काञ्चनद्वारं दीप्यमानमिव श्रिय़ा |
७ क
भीष्म उवाच:
मन्दाकिनीं च नलिनीं धनदस्य महात्मनः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
अथ ते राक्षसाः सर्वे येऽभिरक्षन्ति पद्मिनीम् |
८ क
भीष्म उवाच:
प्रत्युत्थिता भगवन्तं मणिभद्रपुरोगमाः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स तान्प्रत्यर्चय़ामास राक्षसान्भीमविक्रमान् |
९ क
भीष्म उवाच:
निवेदय़त मां क्षिप्रं धनदाय़ेति चाव्रवीत् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ते राक्षसास्तदा राजन्भगवन्तमथाव्रुवन् |
१० क
भीष्म उवाच:
असौ वैश्रवणो राजा स्वय़माय़ाति तेऽन्तिकम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
विदितो भगवानस्य कार्यमागमने च यत् |
११ क
भीष्म उवाच:
पश्यैनं त्वं महाभागं ज्वलन्तमिव तेजसा ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततो वैश्रवणोऽभ्येत्य अष्टावक्रमनिन्दितम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
विधिवत्कुशलं पृष्ट्वा ततो व्रह्मर्षिमव्रवीत् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
सुखं प्राप्तो भवान्कच्चित्किं वा मत्तश्चिकीर्षसि |
१३ क
भीष्म उवाच:
व्रूहि सर्वं करिष्यामि यन्मां त्वं वक्ष्यसि द्विज ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
भवनं प्रविश त्वं मे यथाकामं द्विजोत्तम |
१४ क
भीष्म उवाच:
सत्कृतः कृतकार्यश्च भवान्यास्यत्यविघ्नतः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
प्राविशद्भवनं स्वं वै गृहीत्वा तं द्विजोत्तमम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
आसनं स्वं ददौ चैव पाद्यमर्घ्यं तथैव च ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
अथोपविष्टय़ोस्तत्र मणिभद्रपुरोगमाः |
१६ क
भीष्म उवाच:
निषेदुस्तत्र कौवेरा यक्षगन्धर्वराक्षसाः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तेषां निषण्णानां धनदो वाक्यमव्रवीत् |
१७ क
भीष्म उवाच:
भवच्छन्दं समाज्ञाय़ नृत्येरन्नप्सरोगणाः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
आतिथ्यं परमं कार्यं शुश्रूषा भवतस्तथा |
१८ क
भीष्म उवाच:
संवर्ततामित्युवाच मुनिर्मधुरय़ा गिरा ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अथोर्वरा मिश्रकेशी रम्भा चैवोर्वशी तथा |
१९ क
भीष्म उवाच:
अलम्वुसा घृताची च चित्रा चित्राङ्गदा रुचिः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
मनोहरा सुकेशी च सुमुखी हासिनी प्रभा |
२० क
भीष्म उवाच:
विद्युता प्रशमा दान्ता विद्योता रतिरेव च ||
२० ख
भीष्म उवाच:
एताश्चान्याश्च वै वह्व्यः प्रनृत्ताप्सरसः शुभाः |
२१ क
भीष्म उवाच:
अवादय़ंश्च गन्धर्वा वाद्यानि विविधानि च ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
अथ प्रवृत्ते गान्धर्वे दिव्ये ऋषिरुपावसत् |
२२ क
भीष्म उवाच:
दिव्यं संवत्सरं तत्र रमन्वै सुमहातपाः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
ततो वैश्रवणो राजा भगवन्तमुवाच ह |
२३ क
भीष्म उवाच:
साग्रः संवत्सरो यातस्तव विप्रेह पश्यतः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
हार्योऽय़ं विषय़ो व्रह्मन्गान्धर्वो नाम नामतः |
२४ क
भीष्म उवाच:
छन्दतो वर्ततां विप्र यथा वदति वा भवान् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
अतिथिः पूजनीय़स्त्वमिदं च भवतो गृहम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
सर्वमाज्ञाप्यतामाशु परवन्तो वय़ं त्वय़ि ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अथ वैश्रवणं प्रीतो भगवान्प्रत्यभाषत |
२६ क
भीष्म उवाच:
अर्चितोऽस्मि यथान्याय़ं गमिष्यामि धनेश्वर ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
प्रीतोऽस्मि सदृशं चैव तव सर्वं धनाधिप |
२७ क
भीष्म उवाच:
तव प्रसादाद्भगवन्महर्षेश्च महात्मनः |
२७ ख
भीष्म उवाच:
निय़ोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान्भव ||
२७ ग
भीष्म उवाच:
अथ निष्क्रम्य भगवान्प्रय़यावुत्तरामुखः |
२८ क
भीष्म उवाच:
कैलासं मन्दरं हैमं सर्वाननुचचार ह ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
तानतीत्य महाशैलान्कैरातं स्थानमुत्तमम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
प्रदक्षिणं ततश्चक्रे प्रय़तः शिरसा नमन् |
२९ ख
भीष्म उवाच:
धरणीमवतीर्याथ पूतात्मासौ तदाभवत् ||
२९ ग
भीष्म उवाच:
स तं प्रदक्षिणं कृत्वा त्रिः शैलं चोत्तरामुखः |
३० क
भीष्म उवाच:
समेन भूमिभागेन यय़ौ प्रीतिपुरस्कृतः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
ततोऽपरं वनोद्देशं रमणीय़मपश्यत |
३१ क
भीष्म उवाच:
सर्वर्तुभिर्मूलफलैः पक्षिभिश्च समन्वितम् |
३१ ख
भीष्म उवाच:
रमणीय़ैर्वनोद्देशैस्तत्र तत्र विभूषितम् ||
३१ ग
भीष्म उवाच:
तत्राश्रमपदं दिव्यं ददर्श भगवानथ |
३२ क
भीष्म उवाच:
शैलांश्च विविधाकारान्काञ्चनान्रत्नभूषितान् |
३२ ख
भीष्म उवाच:
मणिभूमौ निविष्टाश्च पुष्करिण्यस्तथैव च ||
३२ ग
भीष्म उवाच:
अन्यान्यपि सुरम्याणि ददर्श सुवहून्यथ |
३३ क
भीष्म उवाच:
भृशं तस्य मनो रेमे महर्षेर्भावितात्मनः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
स तत्र काञ्चनं दिव्यं सर्वरत्नमय़ं गृहम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
ददर्शाद्भुतसङ्काशं धनदस्य गृहाद्वरम् ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
महान्तो यत्र विविधाः प्रासादाः पर्वतोपमाः |
३५ क
भीष्म उवाच:
विमानानि च रम्याणि रत्नानि विविधानि च ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
मन्दारपुष्पैः सङ्कीर्णा तथा मन्दाकिनी नदी |
३६ क
भीष्म उवाच:
स्वय़म्प्रभाश्च मणय़ो वज्रैर्भूमिश्च भूषिता ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
नानाविधैश्च भवनैर्विचित्रमणितोरणैः |
३७ क
भीष्म उवाच:
मुक्ताजालपरिक्षिप्तैर्मणिरत्नविभूषितैः |
३७ ख
भीष्म उवाच:
मनोदृष्टिहरै रम्यैः सर्वतः संवृतं शुभैः ||
३७ ग
भीष्म उवाच:
ऋषिः समन्ततोऽपश्यत्तत्र तत्र मनोरमम् |
३८ क
भीष्म उवाच:
ततोऽभवत्तस्य चिन्ता क्व मे वासो भवेदिति ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
अथ द्वारं समभितो गत्वा स्थित्वा ततोऽव्रवीत् |
३९ क
भीष्म उवाच:
अतिथिं मामनुप्राप्तमनुजानन्तु येऽत्र वै ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
अथ कन्यापरिवृता गृहात्तस्माद्विनिःसृताः |
४० क
भीष्म उवाच:
नानारूपाः सप्त विभो कन्याः सर्वा मनोहराः ||
४० ख
भीष्म उवाच:
यां यामपश्यत्कन्यां स सा सा तस्य मनोऽहरत् |
४१ क
भीष्म उवाच:
नाशक्नुवद्धारय़ितुं मनोऽथास्यावसीदति ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
ततो धृतिः समुत्पन्ना तस्य विप्रस्य धीमतः |
४२ क
भीष्म उवाच:
अथ तं प्रमदाः प्राहुर्भगवान्प्रविशत्विति ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
स च तासां सुरूपाणां तस्यैव भवनस्य च |
४३ क
भीष्म उवाच:
कौतूहलसमाविष्टः प्रविवेश गृहं द्विजः ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
तत्रापश्यज्जराय़ुक्तामरजोम्वरधारिणीम् |
४४ क
भीष्म उवाच:
वृद्धां पर्यङ्कमासीनां सर्वाभरणभूषिताम् ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
स्वस्तीति चाथ तेनोक्ता सा स्त्री प्रत्यवदत्तदा |
४५ क
भीष्म उवाच:
प्रत्युत्थाय़ च तं विप्रमास्यतामित्युवाच ह ||
४५ ख
अष्टावक्र उवाच:
सर्वाः स्वानालय़ान्यान्तु एका मामुपतिष्ठतु |
४६ क
अष्टावक्र उवाच:
सुप्रज्ञाता सुप्रशान्ता शेषा गच्छन्तु च्छन्दतः ||
४६ ख
अष्टावक्र उवाच:
ततः प्रदक्षिणीकृत्य कन्यास्तास्तमृषिं तदा |
४७ क
अष्टावक्र उवाच:
निराक्रामन्गृहात्तस्मात्सा वृद्धाथ व्यतिष्ठत ||
४७ ख
अष्टावक्र उवाच:
अथ तां संविशन्प्राह शय़ने भास्वरे तदा |
४८ क