भीमसेन उवाच:
धिगस्तु मे वाहुवलं गाण्डीवं फल्गुनस्य च |
१ क
भीमसेन उवाच:
यत्ते रक्तौ पुरा भूत्वा पाणी कृतकिणावुभौ ||
१ ख
भीमसेन उवाच:
सभाय़ां स्म विराटस्य करोमि कदनं महत् |
२ क
भीमसेन उवाच:
तत्र मां धर्मराजस्तु कटाक्षेण न्यवारय़त् |
२ ख
भीमसेन उवाच:
तदहं तस्य विज्ञाय़ स्थित एवास्मि भामिनि ||
२ ग
भीमसेन उवाच:
यच्च राष्ट्रात्प्रच्यवनं कुरूणामवधश्च यः |
३ क
भीमसेन उवाच:
सुय़ोधनस्य कर्णस्य शकुनेः सौवलस्य च ||
३ ख
भीमसेन उवाच:
दुःशासनस्य पापस्य यन्मय़ा न हृतं शिरः |
४ क
भीमसेन उवाच:
तन्मे दहति कल्याणि हृदि शल्यमिवार्पितम् |
४ ख
भीमसेन उवाच:
मा धर्मं जहि सुश्रोणि क्रोधं जहि महामते ||
४ ग
भीमसेन उवाच:
इमं च समुपालम्भं त्वत्तो राजा युधिष्ठिरः |
५ क
भीमसेन उवाच:
शृणुय़ाद्यदि कल्याणि कृत्स्नं जह्यात्स जीवितम् ||
५ ख
भीमसेन उवाच:
धनञ्जय़ो वा सुश्रोणि यमौ वा तनुमध्यमे |
६ क
भीमसेन उवाच:
लोकान्तरगतेष्वेषु नाहं शक्ष्यामि जीवितुम् ||
६ ख
भीमसेन उवाच:
सुकन्या नाम शार्याती भार्गवं च्यवनं वने |
७ क
भीमसेन उवाच:
वल्मीकभूतं शाम्यन्तमन्वपद्यत भामिनी ||
७ ख
भीमसेन उवाच:
नाडाय़नी चेन्द्रसेना रूपेण यदि ते श्रुता |
८ क
भीमसेन उवाच:
पतिमन्वचरद्वृद्धं पुरा वर्षसहस्रिणम् ||
८ ख
भीमसेन उवाच:
दुहिता जनकस्यापि वैदेही यदि ते श्रुता |
९ क
भीमसेन उवाच:
पतिमन्वचरत्सीता महारण्यनिवासिनम् ||
९ ख
भीमसेन उवाच:
रक्षसा निग्रहं प्राप्य रामस्य महिषी प्रिय़ा |
१० क
भीमसेन उवाच:
क्लिश्यमानापि सुश्रोणी राममेवान्वपद्यत ||
१० ख
भीमसेन उवाच:
लोपामुद्रा तथा भीरु वय़ोरूपसमन्विता |
११ क
भीमसेन उवाच:
अगस्त्यमन्वय़ाद्धित्वा कामान्सर्वानमानुषान् ||
११ ख
भीमसेन उवाच:
यथैताः कीर्तिता नार्यो रूपवत्यः पतिव्रताः |
१२ क
भीमसेन उवाच:
तथा त्वमपि कल्याणि सर्वैः समुदिता गुणैः ||
१२ ख
भीमसेन उवाच:
मादीर्घं क्षम कालं त्वं मासमध्यर्धसंमितम् |
१३ क
भीमसेन उवाच:
पूर्णे त्रय़ोदशे वर्षे राज्ञो राज्ञी भविष्यसि ||
१३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आर्तय़ैतन्मय़ा भीम कृतं वाष्पविमोक्षणम् |
१४ क
द्रौपद्यु उवाच:
अपारय़न्त्या दुःखानि न राजानमुपालभे ||
१४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
विमुक्तेन व्यतीतेन भीमसेन महावल |
१५ क
द्रौपद्यु उवाच:
प्रत्युपस्थितकालस्य कार्यस्यानन्तरो भव ||
१५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
ममेह भीम कैकेय़ी रूपाभिभवशङ्कय़ा |
१६ क
द्रौपद्यु उवाच:
नित्यमुद्विजते राजा कथं नेय़ादिमामिति ||
१६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तस्या विदित्वा तं भावं स्वय़ं चानृतदर्शनः |
१७ क
द्रौपद्यु उवाच:
कीचकोऽय़ं सुदुष्टात्मा सदा प्रार्थय़ते हि माम् ||
१७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तमहं कुपिता भीम पुनः कोपं निय़म्य च |
१८ क
द्रौपद्यु उवाच:
अव्रुवं कामसंमूढमात्मानं रक्ष कीचक ||
१८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
गन्धर्वाणामहं भार्या पञ्चानां महिषी प्रिय़ा |
१९ क
द्रौपद्यु उवाच:
ते त्वां निहन्युर्दुर्धर्षाः शूराः साहसकारिणः ||
१९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एवमुक्तः स दुष्टात्मा कीचकः प्रत्युवाच ह |
२० क
द्रौपद्यु उवाच:
नाहं विभेमि सैरन्ध्रि गन्धर्वाणां शुचिस्मिते ||
२० ख
द्रौपद्यु उवाच:
शतं सहस्रमपि वा गन्धर्वाणामहं रणे |
२१ क
द्रौपद्यु उवाच:
समागतं हनिष्यामि त्वं भीरु कुरु मे क्षणम् ||
२१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
इत्युक्ते चाव्रुवं सूतं कामातुरमहं पुनः |
२२ क
द्रौपद्यु उवाच:
न त्वं प्रतिवलस्तेषां गन्धर्वाणां यशस्विनाम् ||
२२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
धर्मे स्थितास्मि सततं कुलशीलसमन्विता |
२३ क
द्रौपद्यु उवाच:
नेच्छामि कञ्चिद्वध्यन्तं तेन जीवसि कीचक ||
२३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एवमुक्तः स दुष्टात्मा प्रहस्य स्वनवत्तदा |
२४ क
द्रौपद्यु उवाच:
न तिष्ठति स्म सन्मार्गे न च धर्मं वुभूषति ||
२४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पापात्मा पापभावश्च कामरागवशानुगः |
२५ क
द्रौपद्यु उवाच:
अविनीतश्च दुष्टात्मा प्रत्याख्यातः पुनः पुनः |
२५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
दर्शने दर्शने हन्यात्तथा जह्यां च जीवितम् ||
२५ ग
द्रौपद्यु उवाच:
तद्धर्मे यतमानानां महान्धर्मो नशिष्यति |
२६ क
द्रौपद्यु उवाच:
समय़ं रक्षमाणानां भार्या वो न भविष्यति ||
२६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
भार्याय़ां रक्ष्यमाणाय़ां प्रजा भवति रक्षिता |
२७ क
द्रौपद्यु उवाच:
प्रजाय़ां रक्ष्यमाणाय़ामात्मा भवति रक्षितः ||
२७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
वदतां वर्णधर्मांश्च व्राह्मणानां हि मे श्रुतम् |
२८ क
द्रौपद्यु उवाच:
क्षत्रिय़स्य सदा धर्मो नान्यः शत्रुनिवर्हणात् ||
२८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पश्यतो धर्मराजस्य कीचको मां पदावधीत् |
२९ क
द्रौपद्यु उवाच:
तव चैव समक्षं वै भीमसेन महावल ||
२९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
त्वय़ा ह्यहं परित्राता तस्माद्घोराज्जटासुरात् |
३० क
द्रौपद्यु उवाच:
जय़द्रथं तथैव त्वमजैषीर्भ्रातृभिः सह ||
३० ख
द्रौपद्यु उवाच:
जहीममपि पापं त्वं योऽय़ं मामवमन्यते |
३१ क
द्रौपद्यु उवाच:
कीचको राजवाल्लभ्याच्छोककृन्मम भारत ||
३१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तमेवं कामसंमत्तं भिन्धि कुम्भमिवाश्मनि |
३२ क
द्रौपद्यु उवाच:
यो निमित्तमनर्थानां वहूनां मम भारत ||
३२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तं चेज्जीवन्तमादित्यः प्रातरभ्युदय़िष्यति |
३३ क
द्रौपद्यु उवाच:
विषमालोड्य पास्यामि मा कीचकवशं गमम् |
३३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
श्रेय़ो हि मरणं मह्यं भीमसेन तवाग्रतः ||
३३ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
इत्युक्त्वा प्रारुदत्कृष्णा भीमस्योरः समाश्रिता |
३४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
भीमश्च तां परिष्वज्य महत्सान्त्वं प्रय़ुज्य च |
३४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
कीचकं मनसागच्छत्सृक्किणी परिसंलिहन् ||
३४ ग