chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २००
युधिष्ठिर उवाच:
पितामह महाप्राज्ञ पुण्डरीकाक्षमच्युतम् |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
कर्तारमकृतं विष्णुं भूतानां प्रभवाप्ययम् ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
नाराय़णं हृषीकेशं गोविन्दमपराजितम् |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छामि केशवम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
श्रुतोऽय़मर्थो रामस्य जामदग्न्यस्य जल्पतः |
३ क
भीष्म उवाच:
नारदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वैपाय़नस्य च ||
३ ख
भीष्म उवाच:
असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः |
४ क
भीष्म उवाच:
मार्कण्डेय़श्च गोविन्दे कथय़त्यद्भुतं महत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
केशवो भरतश्रेष्ठ भगवानीश्वरः प्रभुः |
५ क
भीष्म उवाच:
पुरुषः सर्वमित्येव श्रूय़ते वहुधा विभुः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
किं तु यानि विदुर्लोके व्राह्मणाः शार्ङ्गधन्वनः |
६ क
भीष्म उवाच:
माहात्म्यानि महावाहो शृणु तानि युधिष्ठिर ||
६ ख
भीष्म उवाच:
यानि चाहुर्मनुष्येन्द्र ये पुराणविदो जनाः |
७ क
भीष्म उवाच:
अशेषेण हि गोविन्दे कीर्तय़िष्यामि तान्यहम् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
महाभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः |
८ क
भीष्म उवाच:
वाय़ुर्ज्योतिस्तथा चापः खं गां चैवान्वकल्पय़त् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स दृष्ट्वा पृथिवीं चैव सर्वभूतेश्वरः प्रभुः |
९ क
भीष्म उवाच:
अप्स्वेव शय़नं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
सर्वतेजोमय़स्तस्मिञ्शय़ानः शय़ने शुभे |
१० क
भीष्म उवाच:
सोऽग्रजं सर्वभूतानां सङ्कर्षणमचिन्तय़त् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
आश्रय़ं सर्वभूतानां मनसेति विशुश्रुम |
११ क
भीष्म उवाच:
स धारय़ति भूतात्मा उभे भूतभविष्यती ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तस्मिन्महावाहो प्रादुर्भूते महात्मनि |
१२ क
भीष्म उवाच:
भास्करप्रतिमं दिव्यं नाभ्यां पद्ममजाय़त ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
स तत्र भगवान्देवः पुष्करे भासय़न्दिशः |
१३ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मा समभवत्तात सर्वभूतपितामहः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
तस्मिन्नपि महावाहो प्रादुर्भूते महात्मनि |
१४ क
भीष्म उवाच:
तमसः पूर्वजो जज्ञे मधुर्नाम महासुरः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रां वुद्धिं समास्थितम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मणोपचितिं कुर्वञ्जघान पुरुषोत्तमः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
तस्य तात वधात्सर्वे देवदानवमानवाः |
१६ क
भीष्म उवाच:
मधुसूदनमित्याहुर्वृषभं सर्वसात्वताम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मा तु ससृजे पुत्रान्मानसान्दक्षसप्तमान् |
१७ क
भीष्म उवाच:
मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
मरीचिः कश्यपं तात पुत्रं चासृजदग्रजम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
मानसं जनय़ामास तैजसं व्रह्मसत्तमम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अङ्गुष्ठादसृजद्व्रह्मा मरीचेरपि पूर्वजम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
सोऽभवद्भरतश्रेष्ठ दक्षो नाम प्रजापतिः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
तस्य पूर्वमजाय़न्त दश तिस्रश्च भारत |
२० क
भीष्म उवाच:
प्रजापतेर्दुहितरस्तासां ज्येष्ठाभवद्दितिः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
सर्वधर्मविशेषज्ञः पुण्यकीर्तिर्महाय़शाः |
२१ क
भीष्म उवाच:
मारीचः कश्यपस्तात सर्वासामभवत्पतिः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
उत्पाद्य तु महाभागस्तासामवरजा दश |
२२ क
भीष्म उवाच:
ददौ धर्माय़ धर्मज्ञो दक्ष एव प्रजापतिः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
धर्मस्य वसवः पुत्रा रुद्राश्चामिततेजसः |
२३ क
भीष्म उवाच:
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च मरुत्वन्तश्च भारत ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अपरास्तु यवीय़स्यस्ताभ्योऽन्याः सप्तविंशतिः |
२४ क
भीष्म उवाच:
सोमस्तासां महाभागः सर्वासामभवत्पतिः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
इतरास्तु व्यजाय़न्त गन्धर्वांस्तुरगान्द्विजान् |
२५ क
भीष्म उवाच:
गाश्च किम्पुरुषान्मत्स्यानौद्भिदांश्च वनस्पतीन् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
आदित्यानदितिर्जज्ञे देवश्रेष्ठान्महावलान् |
२६ क
भीष्म उवाच:
तेषां विष्णुर्वामनोऽभूद्गोविन्दश्चाभवत्प्रभुः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तस्य विक्रमणादेव देवानां श्रीर्व्यवर्धत |
२७ क
भीष्म उवाच:
दानवाश्च पराभूता दैतेय़ी चासुरी प्रजा ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
विप्रचित्तिप्रधानांश्च दानवानसृजद्दनुः |
२८ क
भीष्म उवाच:
दितिस्तु सर्वानसुरान्महासत्त्वान्व्यजाय़त ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
अहोरात्रं च कालं च यथर्तु मधुसूदनः |
२९ क
भीष्म उवाच:
पूर्वाह्णं चापराह्णं च सर्वमेवान्वकल्पय़त् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
वुद्द्यापः सोऽसृजन्मेघांस्तथा स्थावरजङ्गमान् |
३० क
भीष्म उवाच:
पृथिवीं सोऽसृजद्विश्वां सहितां भूरितेजसा ||
३० ख
भीष्म उवाच:
ततः कृष्णो महावाहुः पुनरेव युधिष्ठिर |
३१ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणानां शतं श्रेष्ठं मुखादसृजत प्रभुः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
वाहुभ्यां क्षत्रिय़शतं वैश्यानामूरुतः शतम् |
३२ क
भीष्म उवाच:
पद्भ्यां शूद्रशतं चैव केशवो भरतर्षभ ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
स एवं चतुरो वर्णान्समुत्पाद्य महाय़शाः |
३३ क
भीष्म उवाच:
अध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत्प्रभुः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
यावद्यावदभूच्छ्रद्धा देहं धारय़ितुं नृणाम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
तावत्तावदजीवंस्ते नासीद्यमकृतं भय़म् ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
न चैषां मैथुनो धर्मो वभूव भरतर्षभ |
३५ क
भीष्म उवाच:
सङ्कल्पादेव चैतेषामपत्यमुदपद्यत ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
तत्र त्रेताय़ुगे काले सङ्कल्पाज्जाय़ते प्रजा |
३६ क
भीष्म उवाच:
न ह्यभून्मैथुनो धर्मस्तेषामपि जनाधिप ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
द्वापरे मैथुनो धर्मः प्रजानामभवन्नृप |
३७ क
भीष्म उवाच:
तथा कलिय़ुगे राजन्द्वन्द्वमापेदिरे जनाः ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
एष भूतपतिस्तात स्वध्यक्षश्च प्रकीर्तितः |
३८ क
भीष्म उवाच:
निरध्यक्षांस्तु कौन्तेय़ कीर्तय़िष्यामि तानपि ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
दक्षिणापथजन्मानः सर्वे तलवरान्ध्रकाः |
३९ क
भीष्म उवाच:
उत्साः पुलिन्दाः शवराश्चूचुपा मण्डपैः सह ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
उत्तरापथजन्मानः कीर्तय़िष्यामि तानपि |
४० क
भीष्म उवाच:
यौनकाम्वोजगान्धाराः किराता वर्वरैः सह ||
४० ख
भीष्म उवाच:
एते पापकृतस्तात चरन्ति पृथिवीमिमाम् |
४१ क
भीष्म उवाच:
श्वकाकवलगृध्राणां सधर्माणो नराधिप ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
नैते कृतय़ुगे तात चरन्ति पृथिवीमिमाम् |
४२ क
भीष्म उवाच:
त्रेताप्रभृति वर्तन्ते ते जना भरतर्षभ ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तस्मिन्महाघोरे सन्ध्याकाले युगान्तिके |
४३ क
भीष्म उवाच:
राजानः समसज्जन्त समासाद्येतरेतरम् ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
एवमेष कुरुश्रेष्ठ प्रादुर्भावो महात्मनः |
४४ क
भीष्म उवाच:
देवदेवर्षिराचष्ट नारदः सर्वलोकदृक् ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
नारदोऽप्यथ कृष्णस्य परं मेने नराधिप |
४५ क
भीष्म उवाच:
शाश्वतत्वं महावाहो यथावद्भरतर्षभ ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
एवमेष महावाहुः केशवः सत्यविक्रमः |
४६ क
भीष्म उवाच:
अचिन्त्यः पुण्डरीकाक्षो नैष केवलमानुषः ||
४६ ख