chevron_left वन पर्व अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच:
गुरुभिर्निय़मैर्युक्तो भरतो नाम पावकः |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रय़च्छति |
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भरत्येष प्रजाः सर्वास्ततो भरत उच्यते ||
१ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निर्यस्तु शिवो नाम शक्तिपूजापरश्च सः |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दुःखार्तानां स सर्वेषां शिवकृत्सततं शिवः ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तपसस्तु फलं दृष्ट्वा सम्प्रवृद्धं तपो महत् |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उद्धर्तुकामो मतिमान्पुत्रो जज्ञे पुरन्दरः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोऽग्निर्भूतेषु लक्ष्यते |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारय़त् ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शम्भुमग्निमथ प्राहुर्व्राह्मणा वेदपारगाः |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आवसथ्यं द्विजाः प्राहुर्दीप्तमग्निं महाप्रभम् ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऊर्जस्करान्हव्यवाहान्सुवर्णसदृशप्रभान् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निस्तपो ह्यजनय़त्पञ्च यज्ञसुतानिह ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रशान्तेऽग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवाम्पतिः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
असुराञ्जनय़न्घोरान्मर्त्यांश्चैव पृथग्विधान् ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तपसश्च मनुं पुत्रं भानुं चाप्यङ्गिरासृजत् |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वृहद्भानुं तु तं प्राहुर्व्राह्मणा वेदपारगाः ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भानोर्भार्या सुप्रजा तु वृहद्भासा तु सोमजा |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
असृजेतां तु षट्पुत्राञ्शृणु तासां प्रजाविधिम् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दुर्वलानां तु भूतानां तनुं यः सम्प्रय़च्छति |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमग्निं वलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुणः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निः स मन्युमान्नाम द्वितीय़ो भानुतः सुतः ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विष्णुर्नामेह योऽग्निस्तु धृतिमान्नाम सोऽङ्गिराः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रय़णं स्मृतम् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निराग्रय़णो नाम भानोरेवान्वय़स्तु सः ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां यो निरग्रहः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चतुर्भिः सहितः पुत्रैर्भानोरेवान्वय़स्तु सः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निशां त्वजनय़त्कन्यामग्नीषोमावुभौ तथा |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मनोरेवाभवद्भार्या सुषुवे पञ्च पावकान् ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पूज्यते हविषाग्र्येण चातुर्मास्येषु पावकः |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पर्जन्यसहितः श्रीमानग्निर्वैश्वानरस्तु सः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अस्य लोकस्य सर्वस्य यः पतिः परिपठ्यते |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽग्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीय़ो वै मनोः सुतः |
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत्परमः स्मृतः ||
१७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपोः सुता |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कर्मणासौ वभौ भार्या स वह्निः स प्रजापतिः ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राणमाश्रित्य यो देहं प्रवर्तय़ति देहिनाम् |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य संनिहितो नाम शव्दरूपस्य साधनः ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो विभर्ति हुताशनम् |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अकल्मषः कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कपिलं परमर्षिं च यं प्राहुर्यतय़ः सदा |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निः स कपिलो नाम साङ्ख्ययोगप्रवर्तकः ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निर्यच्छति भूतानि येन भूतानि नित्यदा |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कर्मस्विह विचित्रेषु सोऽग्रणीर्वह्निरुच्यते ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इमानन्यान्समसृजत्पावकान्प्रथितान्भुवि |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्राय़श्चित्तार्थमुल्वणान् ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
संस्पृशेय़ुर्यदान्योन्यं कथञ्चिद्वाय़ुनाग्नय़ः |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचय़ेऽग्नय़े ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दक्षिणाग्निर्यदा द्वाभ्यां संसृजेत तदा किल |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतय़ेऽग्नय़े ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यद्यग्नय़ो हि स्पृश्येय़ुर्निवेशस्था दवाग्निना |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचय़ेऽग्नय़े ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अग्निं रजस्वला चेत्स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या दस्युमतेऽग्नय़े ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मृतः श्रूय़ेत यो जीवन्परेय़ुः पशवो यथा |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कर्तव्याभिमतेऽग्नय़े ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आर्तो न जुहुय़ादग्निं त्रिरात्रं यस्तु व्राह्मणः |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्यादुत्तराग्नय़े ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दर्शं च पौर्णमासं च यस्य तिष्ठेत्प्रतिष्ठितम् |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेऽग्नय़े ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेऽग्नय़े ||
३१ ख