chevron_left वन पर्व अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच:
मनस्तासु विनिक्षिप्य कामय़ानो वराङ्गनाः ||
४८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कामसन्तप्तहृदय़ो देहत्यागे सुनिश्चितः |
४९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अलाभे व्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागतः ||
४९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्वाहा तं दक्षदुहिता प्रथमं कामय़त्तदा |
५० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तस्य छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृति भामिनी |
५० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अप्रमत्तस्य देवस्य न चापश्यदनिन्दिता ||
५० ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तं ज्ञात्वा यथावत्तु वह्निं वनमुपागतम् |
५१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्त्वतः कामसन्तप्तं चिन्तय़ामास भामिनी ||
५१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् |
५२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कामय़िष्यामि कामार्तं तासां रूपेण मोहितम् |
५२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ||
५२ ग