chevron_left सभा पर्व अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच:
एवं पुरुषशार्दूलो महावुद्धिर्जनार्दनः |
५१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
पाण्डवैर्घातय़ामास जरासन्धमरिं तदा ||
५१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
घातय़ित्वा जरासन्धं वुद्धिपूर्वमरिन्दमः |
५२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धर्मराजमनुज्ञाप्य पृथां कृष्णां च भारत ||
५२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सुभद्रां भीमसेनं च फल्गुनं यमजौ तथा |
५३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धौम्यमामन्त्रय़ित्वा च प्रय़यौ स्वां पुरीं प्रति ||
५३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तेनैव रथमुख्येन तरुणादित्यवर्चसा |
५४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धर्मराजविसृष्टेन दिव्येनानादय़न्दिशः ||
५४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो युधिष्ठिरमुखाः पाण्डवा भरतर्षभ |
५५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रदक्षिणमकुर्वन्त कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ||
५५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो गते भगवति कृष्णे देवकिनन्दने |
५६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
जय़ं लव्ध्वा सुविपुलं राज्ञामभय़दास्तदा ||
५६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
संवर्धितौजसो भूय़ः कर्मणा तेन भारत |
५७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
द्रौपद्याः पाण्डवा राजन्परां प्रीतिमवर्धय़न् ||
५७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तस्मिन्काले तु यद्युक्तं धर्मकामार्थसंहितम् |
५८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तद्राजा धर्मतश्चक्रे राज्यपालनकीर्तिमान् ||
५८ ख