chevron_left आदि पर्व अध्याय २२
सूत उवाच:
एवं स्तुतस्तदा कद्र्वा भगवान्हरिवाहनः |
१ क
सूत उवाच:
नीलजीमूतसङ्घातैर्व्योम सर्वं समावृणोत् ||
१ ख
सूत उवाच:
ते मेघा मुमुचुस्तोय़ं प्रभूतं विद्युदुज्ज्वलाः |
२ क
सूत उवाच:
परस्परमिवात्यर्थं गर्जन्तः सततं दिवि ||
२ ख
सूत उवाच:
सङ्घातितमिवाकाशं जलदैः सुमहाद्भुतैः |
३ क
सूत उवाच:
सृजद्भिरतुलं तोय़मजस्रं सुमहारवैः ||
३ ख
सूत उवाच:
सम्प्रनृत्तमिवाकाशं धारोर्मिभिरनेकशः |
४ क
सूत उवाच:
मेघस्तनितनिर्घोषमम्वरं समपद्यत ||
४ ख
सूत उवाच:
नागानामुत्तमो हर्शस्तदा वर्षति वासवे |
५ क
सूत उवाच:
आपूर्यत मही चापि सलिलेन समन्ततः ||
५ ख