युधिष्ठिर उवाच:
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेय़ः पुरुषस्य हि |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
वन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽपि वा पुनः ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
त्वं हि नः परमो वक्ता लोकेऽस्मिन्भरतर्षभ |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
एतद्भवन्तं पृच्छामि तन्मे वक्तुमिहार्हसि ||
२ ख
भीष्म उवाच:
पुत्रदारैः सुखैश्चैव विय़ुक्तस्य धनेन च |
३ क
भीष्म उवाच:
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे धृतिः श्रेय़स्करी नृप ||
३ ख
भीष्म उवाच:
धैर्येण युक्तस्य सतः शरीरं न विशीर्यते |
४ क
भीष्म उवाच:
आरोग्याच्च शरीरस्य स पुनर्विन्दते श्रिय़म् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
यस्य राज्ञो नरास्तात सात्त्विकीं वृत्तिमास्थिताः |
५ क
भीष्म उवाच:
तस्य स्थैर्यं च धैर्यं च व्यवसाय़श्च कर्मसु ||
५ ख
भीष्म उवाच:
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
६ क
भीष्म उवाच:
वलिवासवसंवादं पुनरेव युधिष्ठिर ||
६ ख
भीष्म उवाच:
वृत्ते देवासुरे युद्धे दैत्यदानवसङ्क्षय़े |
७ क
भीष्म उवाच:
विष्णुक्रान्तेषु लोकेषु देवराजे शतक्रतौ ||
७ ख
भीष्म उवाच:
इज्यमानेषु देवेषु चातुर्वर्ण्ये व्यवस्थिते |
८ क
भीष्म उवाच:
समृध्यमाने त्रैलोक्ये प्रीतिय़ुक्ते स्वय़म्भुवि ||
८ ख
भीष्म उवाच:
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यामपि चर्षिभिः |
९ क
भीष्म उवाच:
गन्धर्वैर्भुजगेन्द्रैश्च सिद्धैश्चान्यैर्वृतः प्रभुः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
चतुर्दन्तं सुदान्तं च वारणेन्द्रं श्रिय़ा वृतम् |
१० क
भीष्म उवाच:
आरुह्यैरावतं शक्रस्त्रैलोक्यमनुसंय़यौ ||
१० ख
भीष्म उवाच:
स कदाचित्समुद्रान्ते कस्मिंश्चिद्गिरिगह्वरे |
११ क
भीष्म उवाच:
वलिं वैरोचनिं वज्री ददर्शोपससर्प च ||
११ ख
भीष्म उवाच:
तमैरावतमूर्धस्थं प्रेक्ष्य देवगणैर्वृतम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
सुरेन्द्रमिन्द्रं दैत्येन्द्रो न शुशोच न विव्यथे ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा तमविकारस्थं तिष्ठन्तं निर्भय़ं वलिम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
अधिरूढो द्विपश्रेष्ठमित्युवाच शतक्रतुः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
दैत्य न व्यथसे शौर्यादथ वा वृद्धसेवय़ा |
१४ क
भीष्म उवाच:
तपसा भावितत्वाद्वा सर्वथैतत्सुदुष्करम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
शत्रुभिर्वशमानीतो हीनः स्थानादनुत्तमात् |
१५ क
भीष्म उवाच:
वैरोचने किमाश्रित्य शोचितव्ये न शोचसि ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
श्रैष्ठ्यं प्राप्य स्वजातीनां भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् |
१६ क
भीष्म उवाच:
हृतस्ववलराज्यस्त्वं व्रूहि कस्मान्न शोचसि ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ईश्वरो हि पुरा भूत्वा पितृपैतामहे पदे |
१७ क
भीष्म उवाच:
तत्त्वमद्य हृतं दृष्ट्वा सपत्नैः किं न शोचसि ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
वद्धश्च वारुणैः पाशैर्वज्रेण च समाहतः |
१८ क
भीष्म उवाच:
हृतदारो हृतधनो व्रूहि कस्मान्न शोचसि ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
भ्रष्टश्रीर्विभवभ्रष्टो यन्न शोचसि दुष्करम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
त्रैलोक्यराज्यनाशे हि कोऽन्यो जीवितुमुत्सहेत् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
एतच्चान्यच्च परुषं व्रुवन्तं परिभूय़ तम् |
२० क
भीष्म उवाच:
श्रुत्वा सुखमसम्भ्रान्तो वलिर्वैरोचनोऽव्रवीत् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
निगृहीते मय़ि भृशं शक्र किं कत्थितेन ते |
२१ क
भीष्म उवाच:
वज्रमुद्यम्य तिष्ठन्तं पश्यामि त्वां पुरन्दर ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
अशक्तः पूर्वमासीस्त्वं कथञ्चिच्छक्ततां गतः |
२२ क
भीष्म उवाच:
कस्त्वदन्य इमा वाचः सुक्रूरा वक्तुमर्हति ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
यस्तु शत्रोर्वशस्थस्य शक्तोऽपि कुरुते दय़ाम् |
२३ क
भीष्म उवाच:
हस्तप्राप्तस्य वीरस्य तं चैव पुरुषं विदुः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
अनिश्चय़ो हि युद्धेषु द्वय़ोर्विवदमानय़ोः |
२४ क
भीष्म उवाच:
एकः प्राप्नोति विजय़मेकश्चैव पराभवम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
मा च ते भूत्स्वभावोऽय़ं मय़ा दैवतपुङ्गव |
२५ क
भीष्म उवाच:
ईश्वरः सर्वभूतानां विक्रमेण जितो वलात् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वय़ा कृतम् |
२६ क
भीष्म उवाच:
यत्त्वमेवङ्गतो वज्रिन्यद्वाप्येवङ्गता वय़म् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
अहमासं यथाद्य त्वं भविता त्वं यथा वय़म् |
२७ क
भीष्म उवाच:
मावमंस्था मय़ा कर्म दुष्कृतं कृतमित्युत ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
सुखदुःखे हि पुरुषः पर्याय़ेणाधिगच्छति |
२८ क
भीष्म उवाच:
पर्याय़ेणासि शक्रत्वं प्राप्तः शक्र न कर्मणा ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
कालः काले नय़ति मां त्वां च कालो नय़त्ययम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
तेनाहं त्वं यथा नाद्य त्वं चापि न यथा वय़म् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
न मातृपितृशुश्रूषा न च दैवतपूजनम् |
३० क
भीष्म उवाच:
नान्यो गुणसमाचारः पुरुषस्य सुखावहः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न वान्धवाः |
३१ क
भीष्म उवाच:
शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
नागामिनमनर्थं हि प्रतिघातशतैरपि |
३२ क
भीष्म उवाच:
शक्नुवन्ति प्रतिव्योढुमृते वुद्धिवलान्नराः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
पर्याय़ैर्हन्यमानानां परित्राता न विद्यते |
३३ क
भीष्म उवाच:
इदं तु दुःखं यच्छक्र कर्ताहमिति मन्यते ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
यदि कर्ता भवेत्कर्ता न क्रिय़ेत कदाचन |
३४ क
भीष्म उवाच:
यस्मात्तु क्रिय़ते कर्ता तस्मात्कर्ताप्यनीश्वरः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
कालेन त्वाहमजय़ं कालेनाहं जितस्त्वय़ा |
३५ क
भीष्म उवाच:
गन्ता गतिमतां कालः कालः कलय़ति प्रजाः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
इन्द्र प्राकृतय़ा वुद्ध्या प्रलपन्नाववुध्यसे |
३६ क
भीष्म उवाच:
केचित्त्वां वहु मन्यन्ते श्रैष्ठ्यं प्राप्तं स्वकर्मणा ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
कथमस्मद्विधो नाम जानँल्लोकप्रवृत्तय़ः |
३७ क
भीष्म उवाच:
कालेनाभ्याहतः शोचेन्मुह्येद्वाप्यर्थसम्भ्रमे ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
नित्यं कालपरीतस्य मम वा मद्विधस्य वा |
३८ क
भीष्म उवाच:
वुद्धिर्व्यसनमासाद्य भिन्ना नौरिव सीदति ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
अहं च त्वं च ये चान्ये भविष्यन्ति सुराधिपाः |
३९ क
भीष्म उवाच:
ते सर्वे शक्र यास्यन्ति मार्गमिन्द्रशतैर्गतम् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
त्वामप्येवं सुदुर्धर्षं ज्वलन्तं परय़ा श्रिय़ा |
४० क
भीष्म उवाच:
काले परिणते कालः कालय़िष्यति मामिव ||
४० ख
भीष्म उवाच:
वहूनीन्द्रसहस्राणि दैतेय़ानां युगे युगे |
४१ क
भीष्म उवाच:
अभ्यतीतानि कालेन कालो हि दुरतिक्रमः ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
इदं तु लव्ध्वा त्वं स्थानमात्मानं वहु मन्यसे |
४२ क
भीष्म उवाच:
सर्वभूतभवं देवं व्रह्माणमिव शाश्वतम् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
न चेदमचलं स्थानमनन्तं वापि कस्यचित् |
४३ क
भीष्म उवाच:
त्वं तु वालिशय़ा वुद्ध्या ममेदमिति मन्यसे ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
अविश्वास्ये विश्वसिषि मन्यसे चाध्रुवं ध्रुवम् |
४४ क
भीष्म उवाच:
ममेय़मिति मोहात्त्वं राजश्रिय़मभीप्ससि ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
नेय़ं तव न चास्माकं न चान्येषां स्थिरा मता |
४५ क
भीष्म उवाच:
अतिक्रम्य वहूनन्यांस्त्वय़ि तावदिय़ं स्थिता ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
कञ्चित्कालमिय़ं स्थित्वा त्वय़ि वासव चञ्चला |
४६ क
भीष्म उवाच:
गौर्निपानमिवोत्सृज्य पुनरन्यं गमिष्यति ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
राजलोका ह्यतिक्रान्ता यान्न सङ्ख्यातुमुत्सहे |
४७ क
भीष्म उवाच:
त्वत्तो वहुतराश्चान्ये भविष्यन्ति पुरन्दर ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
सवृक्षौषधिरत्नेय़ं ससरित्पर्वताकरा |
४८ क
भीष्म उवाच:
तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेय़ं पुरा मही ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
पृथुरैलो मय़ो भौमो नरकः शम्वरस्तथा |
४९ क
भीष्म उवाच:
अश्वग्रीवः पुलोमा च स्वर्भानुरमितध्वजः ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
प्रह्रादो नमुचिर्दक्षो विप्रचित्तिर्विरोचनः |
५० क
भीष्म उवाच:
ह्रीनिषेधः सुहोत्रश्च भूरिहा पुष्पवान्वृषः ||
५० ख