वैशम्पाय़न उवाच:
ततः स पाण्डवो भूय़ो मार्कण्डेय़मुवाच ह |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
कथय़स्वेह चरितं मनोर्वैवस्वतस्य मे ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विवस्वतः सुतो राजन्परमर्षिः प्रतापवान् |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ओजसा तेजसा लक्ष्म्या तपसा च विशेषतः |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं च पितामहम् ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ऊर्ध्ववाहुर्विशालाय़ां वदर्यां स नराधिपः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
एकपादस्थितस्तीव्रं चचार सुमहत्तपः ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवाक्षिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामय़ुतं तदा ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं कदाचित्तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमव्रवीत् ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भगवन्क्षुद्रमत्स्योऽस्मि वलवद्भ्यो भय़ं मम |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दुर्वलं वलवन्तो हि मत्स्यं मत्स्या विशेषतः |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भक्षय़न्ति यथा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्माद्भय़ौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृते प्रतिकृतं तव ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपय़ाभिपरिप्लुतः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात्तं मत्स्यं पाणिना स्वय़म् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उदकान्तमुपानीय़ मत्स्यं वैवस्वतो मनुः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अलिञ्जरे प्राक्षिपत्स चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तत्र ववृधे राजन्मत्स्यः परमसत्कृतः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुत्रवच्चाकरोत्तस्मिन्मनुर्भावं विशेषतः ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथ कालेन महता स मत्स्यः सुमहानभूत् |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अलिञ्जरे जले चैव नासौ समभवत्किल ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भगवन्साधु मेऽद्यान्यत्स्थानं सम्प्रतिपादय़ ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उद्धृत्यालिञ्जरात्तस्मात्ततः स भगवान्मुनिः |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं मत्स्यमनय़द्वापीं महतीं स मनुस्तदा ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरञ्जय़ |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान्वहून् ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्विय़ोजनाय़ता वापी विस्तृता चापि योजनम् |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन |
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचेष्टितुं वा कौन्तेय़ मत्स्यो वाप्यां विशां पते ||
१७ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नय़ मां भगवन्साधो समुद्रमहिषीं प्रभो |
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ||
१८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनय़द्भगवान्वशी |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वय़ं प्राक्षिपदच्युतः ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तत्र ववृधे मत्स्यः किञ्चित्कालमरिन्दम |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमव्रवीत् ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गङ्गाय़ां हि न शक्नोमि वृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समुद्रं नय़ मामाशु प्रसीद भगवन्निति ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उद्धृत्य गङ्गासलिलात्ततो मत्स्यं मनुः स्वय़म् |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समुद्रमनय़त्पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुमहानपि मत्स्यः सन्स मनोर्मनसस्तदा |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आसीद्यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखश्च वै ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत एनमिदं वाक्यं स्मय़मान इवाव्रवीत् ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भगवन्कृता हि मे रक्षा त्वय़ा सर्वा विशेषतः |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राप्तकालं तु यत्कार्यं त्वय़ा तच्छ्रूय़तां मम ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अचिराद्भगवन्भौममिदं स्थावरजङ्गमम् |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वमेव महाभाग प्रलय़ं वै गमिष्यति ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सम्प्रक्षालनकालोऽय़ं लोकानां समुपस्थितः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मात्त्वां वोधय़ाम्यद्य यत्ते हितमनुत्तमम् ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य सर्वस्य सम्प्राप्तः कालः परमदारुणः ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नौश्च कारय़ितव्या ते दृढा युक्तवटाकरा |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि मय़ा पुरा |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्यामारोहय़ेर्नावि सुसङ्गुप्तानि भागशः ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्तदा मुनिजनप्रिय़ |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेय़स्तेन तापस ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवमेतत्त्वय़ा कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम् |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नातिशङ्क्यमिदं चापि वचनं ते ममाभिभो ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वीजान्यादाय़ सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा |
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नावा तु शुभय़ा वीर महोर्मिणमरिन्दम ||
३४ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
चिन्तय़ामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरञ्जय़ |
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम ||
३५ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं दृष्ट्वा मनुजेन्द्रेन्द्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम् ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वटाकरमय़ं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिञ्शृङ्गे न्यवेशय़त् ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
संय़तस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरञ्जय़ |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स ततार तय़ा नावा समुद्रं मनुजेश्वर |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नृत्यमानमिवोर्मीभिर्गर्जमानमिवाम्भसा ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन्महोदधौ |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरञ्जय़ ||
४० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे |
४१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वमाम्भसमेवासीत्खं द्यौश्च नरपुङ्गव ||
४१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवम्भूते तदा लोके सङ्कुले भरतर्षभ |
४२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अदृश्यन्त सप्तर्षय़ो मनुर्मत्स्यः सहैव ह ||
४२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवं वहून्वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः |
४३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन्सलिलसञ्चय़े ||
४३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो हिमवतः शृङ्गं यत्परं पुरुषर्षभ |
४४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्राकर्षत्ततो नावं स मत्स्यः कुरुनन्दन ||
४४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽव्रवीत्तदा मत्स्यस्तानृषीन्प्रहसञ्शनैः |
४५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अस्मिन्हिमवतः शृङ्गे नावं वध्नीत माचिरम् ||
४५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा वद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ |
४६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा ||
४६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तच्च नौवन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् |
४७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ख्यातमद्यापि कौन्तेय़ तद्विद्धि भरतर्षभ ||
४७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथाव्रवीदनिमिषस्तानृषीन्सहितांस्तदा |
४८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अहं प्रजापतिर्व्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते |
४८ ख