मार्कण्डेय़ उवाच:
अथोत्क्रुष्टं तदा हृष्टैः सर्वैर्देवैरुदाय़ुधैः |
४८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
संहतानि च तूर्याणि तदा सर्वाण्यनेकशः ||
४८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवमन्योन्यसंय़ुक्तं युद्धमासीत्सुदारुणम् |
४९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम् ||
४९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अनय़ो देवलोकस्य सहसैव व्यदृश्यत |
५० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथा हि दानवा घोरा विनिघ्नन्ति दिवौकसः ||
५० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनाः |
५१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्च दारुणाः ||
५१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथ दैत्यवलाद्घोरान्निष्पपात महावलः |
५२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम् ||
५२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ते तं घनैरिवादित्यं दृष्ट्वा सम्परिवारितम् |
५३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समुद्यतगिरिं राजन्व्यद्रवन्त दिवौकसः ||
५३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्चिक्षेप तं गिरिम् |
५४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव |
५४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भीमरूपेण निहतमय़ुतं प्रापतद्भुवि ||
५४ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथ तैर्दानवैः सार्धं महिषस्त्रासय़न्सुरान् |
५५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभ्यद्रवद्रणे तूर्णं सिंहः क्षुद्रमृगानिव ||
५५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमापतन्तं महिषं दृष्ट्वा सेन्द्रा दिवौकसः |
५६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्यद्रवन्त रणे भीता विशीर्णाय़ुधकेतनाः ||
५६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः स महिषः क्रुद्धस्तूर्णं रुद्ररथं यय़ौ |
५७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिद्रुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूवरम् ||
५७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिषः सहसा गतः |
५८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षय़ः ||
५८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्यनदंश्च महाकाय़ा दैत्या जलधरोपमाः |
५९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आसीच्च निश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत ||
५९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथाभूते तु भगवान्नावधीन्महिषं रणे |
६० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सस्मार च तदा स्कन्दं मृत्युं तस्य दुरात्मनः ||
६० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
महिषोऽपि रथं दृष्ट्वा रौद्रं रुद्रस्य नानदत् |
६१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवान्सन्त्रासय़ंश्चापि दैत्यांश्चापि प्रहर्षय़न् ||
६१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तस्मिन्भय़े घोरे देवानां समुपस्थिते |
६२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आजगाम महासेनः क्रोधात्सूर्य इव ज्वलन् ||
६२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोहिताम्वरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषणः |
६३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोहितास्यो महावाहुर्हिरण्यकवचः प्रभुः ||
६३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रथमादित्यसङ्काशमास्थितः कनकप्रभम् |
६४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं दृष्ट्वा दैत्यसेना सा व्यद्रवत्सहसा रणे ||
६४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स चापि तां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम् |
६५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुमोच शक्तिं राजेन्द्र महासेनो महावलः ||
६५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा मुक्ताभ्यहनच्छक्तिर्महिषस्य शिरो महत् |
६६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवितः ||
६६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्तिर्हत्वा शत्रून्सहस्रशः |
६७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवैः ||
६७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्राय़ः शरैर्विनिहता महासेनेन धीमता |
६८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः |
६८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्कन्दस्य पार्षदैर्हत्वा भक्षिताः शतसङ्घशः ||
६८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
दानवान्भक्षय़न्तस्ते प्रपिवन्तश्च शोणितम् |
६९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षणान्निर्दानवं सर्वमकार्षुर्भृशहर्षिताः ||
६९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमांसीव यथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान्खगः |
७० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तथा स्कन्दोऽजय़च्छत्रून्स्वेन वीर्येण कीर्तिमान् ||
७० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सम्पूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम् |
७१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शुशुभे कृत्तिकापुत्रः प्रकीर्णांशुरिवांशुमान् ||
७१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नष्टशत्रुर्यदा स्कन्दः प्रय़ातश्च महेश्वरम् |
७२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथाव्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरन्दरः ||
७२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वय़ाय़ं महिषो हतः |
७३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवास्तृणमय़ा यस्य वभूवुर्जय़तां वर |
७३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽय़ं त्वय़ा महावाहो शमितो देवकण्टकः ||
७३ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वय़ा रणे |
७४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निहतं देवशत्रूणां यैर्वय़ं पूर्वतापिताः ||
७४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तावकैर्भक्षिताश्चान्ये दानवाः शतसङ्घशः |
७५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अजेय़स्त्वं रणेऽरीणामुमापतिरिव प्रभुः ||
७५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतत्ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति |
७६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय़्या भविष्यति |
७६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव सुरात्मज ||
७६ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
महासेनेत्येवमुक्त्वा निवृत्तः सह दैवतैः |
७७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्वकेन शचीपतिः ||
७७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतो भद्रवटं रुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः |
७८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उक्ताश्च देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव ||
७८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स हत्वा दानवगणान्पूज्यमानो महर्षिभिः |
७९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
एकाह्नैवाजय़त्सर्वं त्रैलोक्यं वह्निनन्दनः ||
७९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स्कन्दस्य य इदं जन्म पठते सुसमाहितः |
८० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स पुष्टिमिह सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यतामिय़ात् ||
८० ख