chevron_left आदि पर्व अध्याय २३
सूत उवाच:
सुपर्णेनोह्यमानास्ते जग्मुस्तं देशमाशु वै |
१ क
सूत उवाच:
सागराम्वुपरिक्षिप्तं पक्षिसङ्घनिनादितम् ||
१ ख
सूत उवाच:
विचित्रफलपुष्पाभिर्वनराजिभिरावृतम् |
२ क
सूत उवाच:
भवनैरावृतं रम्यैस्तथा पद्माकरैरपि ||
२ ख
सूत उवाच:
प्रसन्नसलिलैश्चापि ह्रदैश्चित्रैर्विभूषितम् |
३ क
सूत उवाच:
दिव्यगन्धवहैः पुण्यैर्मारुतैरुपवीजितम् ||
३ ख
सूत उवाच:
उपजिघ्रद्भिराकाशं वृक्षैर्मलय़जैरपि |
४ क
सूत उवाच:
शोभितं पुष्पवर्षाणि मुञ्चद्भिर्मारुतोद्धुतैः ||
४ ख
सूत उवाच:
किरद्भिरिव तत्रस्थान्नागान्पुष्पाम्वुवृष्टिभिः |
५ क
सूत उवाच:
मनःसंहर्षणं पुण्यं गन्धर्वाप्सरसां प्रिय़म् |
५ ख
सूत उवाच:
नानापक्षिरुतं रम्यं कद्रूपुत्रप्रहर्षणम् ||
५ ग
सूत उवाच:
तत्ते वनं समासाद्य विजह्रुः पन्नगा मुदा |
६ क
सूत उवाच:
अव्रुवंश्च महावीर्यं सुपर्णं पतगोत्तमम् ||
६ ख
सूत उवाच:
वहास्मानपरं द्वीपं सुरम्यं विपुलोदकम् |
७ क
सूत उवाच:
त्वं हि देशान्वहून्रम्यान्पतन्पश्यसि खेचर ||
७ ख
सूत उवाच:
स विचिन्त्याव्रवीत्पक्षी मातरं विनतां तदा |
८ क
सूत उवाच:
किं कारणं मय़ा मातः कर्तव्यं सर्पभाषितम् ||
८ ख
विनतो उवाच:
दासीभूतास्म्यनार्याय़ा भगिन्याः पतगोत्तम |
९ क
विनतो उवाच:
पणं वितथमास्थाय़ सर्पैरुपधिना कृतम् ||
९ ख
सूत उवाच:
तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेचरः |
१० क
सूत उवाच:
उवाच वचनं सर्पांस्तेन दुःखेन दुःखितः ||
१० ख
सूत उवाच:
किमाहृत्य विदित्वा वा किं वा कृत्वेह पौरुषम् |
११ क
सूत उवाच:
दास्याद्वो विप्रमुच्येय़ं सत्यं शंसत लेलिहाः ||
११ ख
सूत उवाच:
श्रुत्वा तमव्रुवन्सर्पा आहरामृतमोजसा |
१२ क
सूत उवाच:
ततो दास्याद्विप्रमोक्षो भविता तव खेचर ||
१२ ख