chevron_left आश्रमवासिक पर्व अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच:
एवमेतन्महावाहो यथा वदसि पाण्डव |
१ क
कुन्त्यु उवाच:
कृतमुद्धर्षणं पूर्वं मय़ा वः सीदतां नृप ||
१ ख
कुन्त्यु उवाच:
द्यूतापहृतराज्यानां पतितानां सुखादपि |
२ क
कुन्त्यु उवाच:
ज्ञातिभिः परिभूतानां कृतमुद्धर्षणं मय़ा ||
२ ख
कुन्त्यु उवाच:
कथं पाण्डोर्न नश्येत सन्ततिः पुरुषर्षभाः |
३ क
कुन्त्यु उवाच:
यशश्च वो न नश्येत इति चोद्धर्षणं कृतम् ||
३ ख
कुन्त्यु उवाच:
यूय़मिन्द्रसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः |
४ क
कुन्त्यु उवाच:
मा परेषां मुखप्रेक्षाः स्थेत्येवं तत्कृतं मय़ा ||
४ ख
कुन्त्यु उवाच:
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपमः |
५ क
कुन्त्यु उवाच:
पुनर्वने न दुःखी स्या इति चोद्धर्षणं कृतम् ||
५ ख
कुन्त्यु उवाच:
नागाय़ुतसमप्राणः ख्यातविक्रमपौरुषः |
६ क
कुन्त्यु उवाच:
नाय़ं भीमोऽत्ययं गच्छेदिति चोद्धर्षणं कृतम् ||
६ ख
कुन्त्यु उवाच:
भीमसेनादवरजस्तथाय़ं वासवोपमः |
७ क
कुन्त्यु उवाच:
विजय़ो नावसीदेत इति चोद्धर्षणं कृतम् ||
७ ख
कुन्त्यु उवाच:
नकुलः सहदेवश्च तथेमौ गुरुवर्तिनौ |
८ क
कुन्त्यु उवाच:
क्षुधा कथं न सीदेतामिति चोद्धर्षणं कृतम् ||
८ ख
कुन्त्यु उवाच:
इय़ं च वृहती श्यामा श्रीमत्याय़तलोचना |
९ क
कुन्त्यु उवाच:
वृथा सभातले क्लिष्टा मा भूदिति च तत्कृतम् ||
९ ख
कुन्त्यु उवाच:
प्रेक्षन्त्या मे तदा हीमां वेपन्तीं कदलीमिव |
१० क
कुन्त्यु उवाच:
स्त्रीधर्मिणीमनिन्द्याङ्गीं तथा द्यूतपराजिताम् ||
१० ख
कुन्त्यु उवाच:
दुःशासनो यदा मौढ्याद्दासीवत्पर्यकर्षत |
११ क
कुन्त्यु उवाच:
तदैव विदितं मह्यं पराभूतमिदं कुलम् ||
११ ख
कुन्त्यु उवाच:
विषण्णाः कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादय़ः |
१२ क
कुन्त्यु उवाच:
यदैषा नाथमिच्छन्ती व्यलपत्कुररी यथा ||
१२ ख
कुन्त्यु उवाच:
केशपक्षे परामृष्टा पापेन हतवुद्धिना |
१३ क
कुन्त्यु उवाच:
यदा दुःशासनेनैषा तदा मुह्याम्यहं नृप ||
१३ ख
कुन्त्यु उवाच:
युष्मत्तेजोविवृद्ध्यर्थं मय़ा ह्युद्धर्षणं कृतम् |
१४ क
कुन्त्यु उवाच:
तदानीं विदुरावाक्यैरिति तद्वित्त पुत्रकाः ||
१४ ख
कुन्त्यु उवाच:
कथं न राजवंशोऽय़ं नश्येत्प्राप्य सुतान्मम |
१५ क
कुन्त्यु उवाच:
पाण्डोरिति मय़ा पुत्र तस्मादुद्धर्षणं कृतम् ||
१५ ख
कुन्त्यु उवाच:
न तस्य पुत्रः पौत्रौ वा कुत एव स पार्थिव |
१६ क
कुन्त्यु उवाच:
लभते सुकृताँल्लोकान्यस्माद्वंशः प्रणश्यति ||
१६ ख
कुन्त्यु उवाच:
भुक्तं राज्यफलं पुत्रा भर्तुर्मे विपुलं पुरा |
१७ क
कुन्त्यु उवाच:
महादानानि दत्तानि पीतः सोमो यथाविधि ||
१७ ख
कुन्त्यु उवाच:
साहं नात्मफलार्थं वै वासुदेवमचूचुदम् |
१८ क
कुन्त्यु उवाच:
विदुराय़ाः प्रलापैस्तैः प्लावनार्थं तु तत्कृतम् ||
१८ ख
कुन्त्यु उवाच:
नाहं राज्यफलं पुत्र कामय़े पुत्रनिर्जितम् |
१९ क
कुन्त्यु उवाच:
पतिलोकानहं पुण्यान्कामय़े तपसा विभो ||
१९ ख
कुन्त्यु उवाच:
श्वश्रूश्वशुरय़ोः कृत्वा शुश्रूषां वनवासिनोः |
२० क
कुन्त्यु उवाच:
तपसा शोषय़िष्यामि युधिष्ठिर कलेवरम् ||
२० ख
कुन्त्यु उवाच:
निवर्तस्व कुरुश्रेष्ठ भीमसेनादिभिः सह |
२१ क
कुन्त्यु उवाच:
धर्मे ते धीय़तां वुद्धिर्मनस्ते महदस्तु च ||
२१ ख