chevron_left द्रोण पर्व अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच:
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्राधिरथिराय़स्तो नातरत्पाण्डवं रणे ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णः पार्थान्सगोविन्दाञ्जेतुमुत्सहते रणे |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न च कर्णसमं योधं लोके पश्यामि कञ्चन |
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इति दुर्योधनस्याहमश्रौषं जल्पतो मुहुः ||
२ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णो हि वलवाञ्शूरो दृढधन्वा जितक्लमः |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
इति मामव्रवीत्सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वसुषेणसहाय़ं मां नालं देवापि संय़ुगे |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
किमु पाण्डुसुता राजन्गतसत्त्वा विचेतसः ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्र तं निर्जितं दृष्ट्वा भुजङ्गमिव निर्विषम् |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
युद्धात्कर्णमपक्रान्तं किं स्विद्दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अहो दुर्मुखमेवैकं युद्धानामविशारदम् |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रावेशय़द्धुतवहं पतङ्गमिव मोहितः ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अश्वत्थामा मद्रराजः कृपः कर्णश्च सङ्गताः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न शक्ताः प्रमुखे स्थातुं नूनं भीमस्य सञ्जय़ ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तेऽपि चास्य महाघोरं वलं नागाय़ुतोपमम् |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जानन्तो व्यवसाय़ं च क्रूरं मारुततेजसः ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
किमर्थं क्रूरकर्माणं यमकालान्तकोपमम् |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वलसंरम्भवीर्यज्ञाः कोपय़िष्यन्ति संय़ुगे ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णस्त्वेको महावाहुः स्ववाहुवलमाश्रितः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमसेनमनादृत्य रणेऽय़ुध्यत सूतजः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
योऽजय़त्समरे कर्णं पुरन्दर इवासुरम् |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न स पाण्डुसुतो जेतुं शक्यः केनचिदाहवे ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणं यः सम्प्रमथ्यैकः प्रविष्टो मम वाहिनीम् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमो धनञ्जय़ान्वेषी कस्तमर्छेज्जिजीविषुः ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
को हि सञ्जय़ भीमस्य स्थातुमुत्सहतेऽग्रतः |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उद्यताशनिवज्रस्य महेन्द्रस्येव दानवः ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रेतराजपुरं प्राप्य निवर्तेतापि मानवः |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न भीमसेनं सम्प्राप्य निवर्तेत कदाचन ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पतङ्गा इव वह्निं ते प्राविशन्नल्पचेतसः |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ये भीमसेनं सङ्क्रुद्धमभ्यधावन्विमोहिताः ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्तत्सभाय़ां भीमेन मम पुत्रवधाश्रय़म् |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शप्तं संरम्भिणोग्रेण कुरूणां शृण्वतां तदा ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तन्नूनमभिसञ्चिन्त्य दृष्ट्वा कर्णं च निर्जितम् |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुःशासनः सह भ्रात्रा भय़ाद्भीमादुपारमत् ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यश्च सञ्जय़ दुर्वुद्धिरव्रवीत्समितौ मुहुः |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णो दुःशासनोऽहं च जेष्यामो युधि पाण्डवान् ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स नूनं विरथं दृष्ट्वा कर्णं भीमेन निर्जितम् |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रत्याख्यानाच्च कृष्णस्य भृशं तप्यति सञ्जय़ ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दृष्ट्वा भ्रातॄन्हतान्युद्धे भीमसेनेन दंशितान् |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
आत्मापराधात्सुमहन्नूनं तप्यति पुत्रकः ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
को हि जीवितमन्विच्छन्प्रतीपं पाण्डवं व्रजेत् |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमं भीमाय़ुधं क्रुद्धं साक्षात्कालमिव स्थितम् ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वडवामुखमध्यस्थो मुच्येतापि हि मानवः |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न भीममुखसम्प्राप्तो मुच्येतेति मतिर्मम ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न पाण्डवा न पाञ्चाला न च केशवसात्यकी |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जानन्ति युधि संरव्धा जीवितं परिरक्षितुम् ||
२३ ख
सञ्जय़ उवाच:
यत्संशोचसि कौरव्य वर्तमाने जनक्षय़े |
२४ क
सञ्जय़ उवाच:
त्वमस्य जगतो मूलं विनाशस्य न संशय़ः ||
२४ ख
सञ्जय़ उवाच:
स्वय़ं वैरं महत्कृत्वा पुत्राणां वचने स्थितः |
२५ क
सञ्जय़ उवाच:
उच्यमानो न गृह्णीषे मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् ||
२५ ख
सञ्जय़ उवाच:
स्वय़ं पीत्वा महाराज कालकूटं सुदुर्जरम् |
२६ क
सञ्जय़ उवाच:
तस्येदानीं फलं कृत्स्नमवाप्नुहि नरोत्तम ||
२६ ख
सञ्जय़ उवाच:
यत्तु कुत्सय़से योधान्युध्यमानान्यथावलम् |
२७ क
सञ्जय़ उवाच:
अत्र ते वर्णय़िष्यामि यथा युद्धमवर्तत ||
२७ ख
सञ्जय़ उवाच:
दृष्ट्वा कर्णं तु पुत्रास्ते भीमसेनपराजितम् |
२८ क
सञ्जय़ उवाच:
नामृष्यन्त महेष्वासाः सोदर्याः पञ्च मारिष ||
२८ ख
सञ्जय़ उवाच:
दुर्मर्षणो दुःसहश्च दुर्मदो दुर्धरो जय़ः |
२९ क
सञ्जय़ उवाच:
पाण्डवं चित्रसंनाहास्तं प्रतीपमुपाद्रवन् ||
२९ ख
सञ्जय़ उवाच:
ते समन्तान्महावाहुं परिवार्य वृकोदरम् |
३० क
सञ्जय़ उवाच:
दिशः शरैः समावृण्वञ्शलभानामिव व्रजैः ||
३० ख
सञ्जय़ उवाच:
आगच्छतस्तान्सहसा कुमारान्देवरूपिणः |
३१ क
सञ्जय़ उवाच:
प्रतिजग्राह समरे भीमसेनो हसन्निव ||
३१ ख
सञ्जय़ उवाच:
तव दृष्ट्वा तु तनय़ान्भीमसेनसमीपगान् |
३२ क
सञ्जय़ उवाच:
अभ्यवर्तत राधेय़ो भीमसेनं महावलम् ||
३२ ख
सञ्जय़ उवाच:
विसृजन्विशिखान्राजन्स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् |
३३ क
सञ्जय़ उवाच:
तं तु भीमोऽभ्ययात्तूर्णं वार्यमाणः सुतैस्तव ||
३३ ख
सञ्जय़ उवाच:
कुरवस्तु ततः कर्णं परिवार्य समन्ततः |
३४ क
सञ्जय़ उवाच:
अवाकिरन्भीमसेनं शरैः संनतपर्वभिः ||
३४ ख
सञ्जय़ उवाच:
तान्वाणैः पञ्चविंशत्या साश्वान्राजन्नरर्षभान् |
३५ क
सञ्जय़ उवाच:
ससूतान्भीमधनुषो भीमो निन्ये यमक्षय़म् ||
३५ ख
सञ्जय़ उवाच:
प्रापतन्स्यन्दनेभ्यस्ते सार्धं सूतैर्गतासवः |
३६ क
सञ्जय़ उवाच:
चित्रपुष्पधरा भग्ना वातेनेव महाद्रुमाः ||
३६ ख
सञ्जय़ उवाच:
तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् |
३७ क
सञ्जय़ उवाच:
संवार्याधिरथिं वाणैर्यज्जघान तवात्मजान् ||
३७ ख
सञ्जय़ उवाच:
स वार्यमाणो भीमेन शितैर्वाणैः समन्ततः |
३८ क
सञ्जय़ उवाच:
सूतपुत्रो महाराज भीमसेनमवैक्षत ||
३८ ख
सञ्जय़ उवाच:
तं भीमसेनः संरम्भात्क्रोधसंरक्तलोचनः |
३९ क
सञ्जय़ उवाच:
विस्फार्य सुमहच्चापं मुहुः कर्णमवैक्षत ||
३९ ख