शुक उवाच:
यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च |
१ क
शुक उवाच:
कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा ||
१ ख
शुक उवाच:
एतद्वै श्रोतुमिच्छामि तद्भवान्प्रव्रवीतु मे |
२ क
शुक उवाच:
एतत्त्वन्योन्यवैरूप्ये वर्तते प्रतिकूलतः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं पराशरसुतः सुतम् |
३ क
भीष्म उवाच:
कर्मविद्यामय़ावेतौ व्याख्यास्यामि क्षराक्षरौ ||
३ ख
भीष्म उवाच:
यां दिशं विद्यया यान्ति यां च गच्छन्ति कर्मणा |
४ क
भीष्म उवाच:
शृणुष्वैकमनाः पुत्र गह्वरं ह्येतदन्तरम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
अस्ति धर्म इति प्रोक्तं नास्तीत्यत्रैव यो वदेत् |
५ क
भीष्म उवाच:
तस्य पक्षस्य सदृशमिदं मम भवेदथ ||
५ ख
भीष्म उवाच:
द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः |
६ क
भीष्म उवाच:
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तौ च सुभाषितः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
कर्मणा वध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते |
७ क
भीष्म उवाच:
तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतय़ः पारदर्शिनः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
कर्मणा जाय़ते प्रेत्य मूर्तिमान्षोडशात्मकः |
८ क
भीष्म उवाच:
विद्यया जाय़ते नित्यमव्ययो ह्यव्ययात्मकः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
कर्म त्वेके प्रशंसन्ति स्वल्पवुद्धितरा नराः |
९ क
भीष्म उवाच:
तेन ते देहजालानि रमय़न्त उपासते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ये तु वुद्धिं परां प्राप्ता धर्मनैपुण्यदर्शिनः |
१० क
भीष्म उवाच:
न ते कर्म प्रशंसन्ति कूपं नद्यां पिवन्निव ||
१० ख
भीष्म उवाच:
कर्मणः फलमाप्नोति सुखदुःखे भवाभवौ |
११ क
भीष्म उवाच:
विद्यया तदवाप्नोति यत्र गत्वा न शोचति ||
११ ख
भीष्म उवाच:
यत्र गत्वा न म्रिय़ते यत्र गत्वा न जाय़ते |
१२ क
भीष्म उवाच:
न जीर्यते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
यत्र तद्व्रह्म परममव्यक्तमजरं ध्रुवम् |
१३ क
भीष्म उवाच:
अव्याहतमनाय़ासममृतं चाविय़ोगि च ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
द्वन्द्वैर्यत्र न वाध्यन्ते मानसेन च कर्मणा |
१४ क
भीष्म उवाच:
समाः सर्वत्र मैत्राश्च सर्वभूतहिते रताः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
विद्यामय़ोऽन्यः पुरुषस्तात कर्ममय़ोऽपरः |
१५ क
भीष्म उवाच:
विद्धि चन्द्रमसं दर्शे सूक्ष्मय़ा कलय़ा स्थितम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
तदेतदृषिणा प्रोक्तं विस्तरेणानुमीय़ते |
१६ क
भीष्म उवाच:
नवजं शशिनं दृष्ट्वा वक्रं तन्तुमिवाम्वरे ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः |
१७ क
भीष्म उवाच:
मूर्तिमानिति तं विद्धि तात कर्मगुणात्मकम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
देवो यः संश्रितस्तस्मिन्नव्विन्दुरिव पुष्करे |
१८ क
भीष्म उवाच:
क्षेत्रज्ञं तं विजानीय़ान्नित्यं त्यागजितात्मकम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् |
१९ क
भीष्म उवाच:
जीवमात्मगुणं विद्यादात्मानं परमात्मनः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
सचेतनं जीवगुणं वदन्ति; स चेष्टते चेष्टय़ते च सर्वम् |
२० क
भीष्म उवाच:
ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति; प्रावर्तय़द्यो भुवनानि सप्त ||
२० ख